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Monday, January 30, 2017

आत्मा की आवाज क्यों सुने

मित्रो !

श्रीमद भगवद गीता के अध्याय 3 (Chapter 3) का श्लोक 42 (Verse 42) निम्नप्रकार है:
इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्य: परं मन: ।
मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धे: परतस्तु सः ।।
शब्दार्थ : इन्द्रियाणि = इन्द्रियों को; पराणि = परे (श्रेष्ठ); आहु: = कहते हैं (और); इन्द्रियेभ्य; = इन्द्रियों से; परम् = परे (श्रेष्ठ); मन: = मन है; तु = और; मनस: = मन से; परा = परे (श्रेष्ठ); बुद्धि: = बुद्धि है; तु = और; य: = जो; बुद्धे: = बुद्धि से (भी); परत: =अत्यन्त परे है; स: =वह (आत्मा है)

भावार्थ: इन्द्रियों को श्रेष्ठ कहा जाता है, इन्द्रियों से भी श्रेष्ठ मन होता है, मन से श्रेष्ठ बुद्धि होती है और बुद्धि से भी श्रेष्ठ आत्मा है।
The senses are superior but more than senses the mind is superior but more than mind the intellect is superior and the soul is superior the intellect.
मनुष्य की आत्मा जागृत होने पर आत्मा का नियंत्रण बुद्धि पर होता है और बुद्धि निष्क्रिय नहीं होने पाती, बुद्धि के सक्रिय होने पर बुद्धि का नियंत्रण मन पर होता है, मन पर पर नियंत्रण होने से मन का नियंत्रण इन्द्रियों पर होता है। ऐसा होने से जिस व्यक्ति की आत्मा जागृत नहीं रहती उसकी बुद्धि निष्क्रिय होने से व्यक्ति के विचारों और इन्द्रियों पर नियंत्रण नहीं रहने से मन और इन्द्रियाँ मनमानी करते हैं।



Saturday, December 31, 2016

स्व-नियंत्रण का एक ही रास्ता


मित्रो !
यह मन (mind) बहुत ही चंचल और जिद्दी /अड़ियल है और क्षण भर में कहीं भी पहुँच जाता है। यदि आप व्यवहारिक होना चाहते हैं तब मन पर नियंत्रण करना नितांत आवश्यक है।
हम सभी को नव वर्ष मंगलमय हो ! हम सब नए वर्ष में सर्वोत्तम की आशा करें।