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Saturday, May 9, 2015

जाने जठराग्नि क्या है : What is digestive fire of the stomach

मित्रो !
भोजन में पाये जाने वाले प्रोटीन, फैट, कार्बोहाइड्रेट्स, विटामिन और मिनरल्स हमारे शरीर के लिए पोषक तत्व होते हैं। भोजन में इन पोषक तत्वों (nutrients) के अतिरिक्त शरीर के लिए अनुप्रयोज्य अपशिष्ट पदार्थ (waste materials) उपलब्ध रहते हैं। पाचन क्रिया के अंतर्गत पोषक पदार्थ और अपशिष्ट पदार्थ अलग किये जाते हैं और शरीर की विभिन्न ग्रंथियों से मिलने वाले एन्जाइम्स की सहायता से पोषक तत्व ऐसी अवस्था में परिवर्तित किये जाते हैं कि वे पाचन तंत्र द्वारा अवशोषित कर शरीर की कोशिकाओं तक पहुँचाये जा सकें। भोजन को अत्यंत छोटे कणों (fine particles) में बदलने और उससे पोषक तत्वों और अपशिष्ट पदार्थों के अलग करने का कार्य आमाशय में होता है। यध्यपि आमाशय में क्रिया के उपरांत भोजन का स्वरुप अर्ध द्रव (semi liquid) हो जाता है किन्तु उसमें पोषक तत्व और अपशिष्ट पदार्थ के कण अलग-अलग होते हैं।

संस्कृत भाषा में आमाशय को जठर कहते हैं। आयुर्वेद चिकित्सा पद्यति के अनुसार हमारे आमाशय में हमारे द्वारा भोजन के रूप में ग्रहण किये जाने वाले पदार्थों को पचाने के लिए एक प्रकार की अग्नि होती है जिसे जठराग्नि कहा जाता है। जैसे ही भोजन ग्रास नाली से होकर आमाशय में पहुंचता है जठराग्नि इस पर अपना कार्य करना प्रारम्भ कर देती है। आमाशय में उपलब्ध जठराग्नि में उपलब्ध जठरीय रस की भोजन पर क्रिया द्वारा प्रोटीन अंततः पेप्टोन (peptone) में बदल जाते हैं। जठरीय रस में उपलब्ध तीन एंज़ाइम में से एक एंज़ाइम कारबोहाइड्रेट को गलाता है, दूसरा एंज़ाइम वसा को गला देता है तथा तीसरा एंज़ाइम, जिसमें जीवाणुनाशक शक्ति भी होती है, दूध को फाड़ (curding of milk) देता है।
आमाशय में होने वाली पाचन क्रिया के फलस्वरूप आहार अर्ध द्रव (semi liquid) रूप में परिवर्तित हो जाता है। इसी रूप में यह एक छिद्र द्वारा होते हुए ग्रहणी में पहुंचता है जहां पर अग्नाशय से आने रस जिसमें एंजाइम होते हैं तथा यकृत से आने वाला पित्त पाचन क्रिया में भाग लेते हैं। ग्रहणी से पाचित (digested) भोजन जिसका स्वरुप गाढ़े शहद के समान होता है क्षुद्रांत्र (small intestine) में जाता है। क्षुद्रांत्र का कार्य विशेषतया अवशोषण (absorption) का है। इस भाग में पोषक पदार्थ अवशोषित कर लिए जाते हैं। शेष बचा तरल पदार्थ जिसमें अपशिष्ट पदार्थ और पानी होता है आगे बृहदान्त्र (large intestine) में चला जाता है जहां इससे पाने अवशोषित कर अलग कर दिया जाता है और मल आगे धकेल दिया जाता है। हमारे शरीर में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है कि हमारे द्वारा लिए गए भोज्य पदार्थ (eadibles) पर जठराग्नि के द्वारा की जाने वाली क्रिया (process) के बिना हमारा शरीर खाए गए पदार्थ से पोषक तत्व शरीर में अवशोषित कर सके। इससे यह निष्कर्ष निकालता है कि यदि हमारे शरीर में जठराग्नि न हो तब कुछ भी खाने पर हमारे शरीर को पोषक तत्व नहीं मिल सकते।
जठराग्नि के अभाव में आमाशय में भोजन पचता नहीं है बल्कि भोजन के सड़ने (fermentation) की क्रिया प्रारम्भ हो जाती है। परिणामतः शरीर को पोषक तत्व तो नहीं ही मिलते, उल्टे भोजन के सड़ने के फलस्वरूप गैस, कब्ज, अम्लता, उलटी, सिर दर्द, शरीर में बेचैनी, आलस्य, काम में अरुचि होने, आदि की शिकायतों के साथ शरीर के लिए हानिकारक अनेक प्रकार के विषैले पदार्थ (toxins) बन जाते हैं। यह विषैले पदार्थ शरीर में अवशोषित होकर शरीर के अन्य भागों में फ़ैल कर अन्य बीमारियों को जन्म देते हैं।
वास्तव में जठराग्नि शरीर में उत्पन्न होने वाले हाइड्रोक्लोरिक एसिड और विभिन्न प्रकार के एन्जाइम्स से मिलकर बनती है। इसका प्रभाव ऊष्मा (Heat) का होता है। जिस प्रकार प्रज्वलित अग्नि पर पानी डालने से अग्नि बुझकर शान्त हो जाती है उसी प्रकार जठराग्नि पर पानी, आइसक्रीम, कोल्ड ड्रिंक्स, शरबत, आदि डालने से जठराग्नि मन्द पड़ जाती है और भोजन पचाने का कार्य नहीं कर पाती। जठराग्नि संतुलित होने पर कोई भी भोज्य पदार्थ आमाशय में पहुचने के लगभग पौने दो घंटे में खाये गए पदार्थ पर जठराग्नि अपनी क्रिया पूर्ण कर लेती है। क्रिया ठीक तरह से संपन्न हो जाय, इसके लिए जरूरी हो जाता है कि क्रिया के जारी रहते पानी, आइसक्रीम, कोल्ड ड्रिंक्स, शरबत, आदि न लिए जांय। खाने का तापमान शरीर के तापमान से कुछ अधिक होना चाहिए। खाने के साथ चाय या कॉफी लेने में कोई हानि नहीं है। यदि खाने के दौरान भोजन को ग्रास नली में आगे बढ़ाने में कठिनाई हो रही हो तब अल्प मात्रा में सामान्य तापक्रम का पानी या गुनगुना पानी लिया जा सकता है। खाना खाने के लगभग डेढ़ घंटे बाद पानी पीना उपयोगी माना गया है। यदि पानी खाना खाने के एक घंटे बाद भी लिया जाय तब भी जठराग्नि पर कोई विशेष प्रतिकूल प्रभाव नहीं होता।
जठराग्नि ही हमें भूखे होने का अहसास दिलाती है। यदि जठराग्नि कमजोर पड़ जाय तब हमें भूख कम लगने लगती है और स्वास्थ्य ख़राब होने लगता है। खाने की इच्छा नहीं होती, यदि कुछ खा भी लिया जाय तब वह पचता नहीं है। ऐसी स्थिति में यह सुझाव दिया जाता है कि या तो उपवास रखा जाय या ऐसे फल या खाद्य पदार्थ लिए जांय जो आसानी से पच सकें। जठराग्नि को संतुलित करने के लिए आयुर्वेदा में ताजा अदरक के छोटे-छोटे चिप्स नीबू के रस में डुबोकर, काली मिर्च और काला नमक छिड़क कर चूसना या खाना उपयोगी पाया गया है। खाने के बाद सौंफ चबाना भी पाचन क्रिया में सहायक होता है। अजवायन से भी जठराग्नि में सुधार होता है।
एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह हो सकता है कि जठराग्नि के संतुलित होने अथवा असंतुलित होने की पहचान क्या है? मेरे विचार से संतुलित और असंतुलित जठराग्नि के निम्नलिखित प्रभाव या लक्षण होते हैं :
स्वस्थ अग्नि (जठराग्नि) के लक्षण
जीभ गुलाबी है।
अगले भोजन के लिए भूख लगी है।
नियमित रूप से मल त्याग होना।
बिना किसी आतंरिक दवाव के मल त्याग होना।
मल पानी पर तैरता हुआ केले की तरह मुलायम है।
मन की स्पष्टता।
चुस्ती -फुर्ती, त्वचा में कांति।
अच्छी ऊर्जा।

खराब अग्नि (जठराग्नि) के लक्षण
जीभ पर सफेद कोटिंग। 
कमजोर या भूख की कमी।
मल त्याग में कठिनाई, मल त्याग के लिए आंतरिक दवाव लगाने की आवश्यकता। 
मल त्याग टुकड़ों-टुकड़ों में होना तथा पानी में मल का डूब जाना। 
धूमिल सोच।
सूजन, गैस, कब्ज, खट्टी डकार, मिचली आदि की शिकायत होना।
सुस्ती, कार्य के प्रति अनिच्छा।
ऊर्जा में कमी।

जठराग्नि को संतुलित बनाये रखने के लिए क्या करें? (विस्तृत जानकारी के लिए कृपया मेरे द्वारा लिखित अन्य पोस्ट्स, जिनका उल्लेख इस पोस्ट के अंत में किया गया है, पढ़ने का कष्ट करें)
1. किसी भी प्रकार के तनाव पर शरीर की विभिन्न क्रियाओं और हार्मोन्स तथा एन्जाइम्स उत्पन्न करने वाली ग्रंथियों पर भी पड़ता है। फलस्वरूप जठराग्नि मंद हो जाती है और भूख मर जाती है तथा जठराग्नि कमजोर पड़ जाती है। अतः भोजन करने से पूर्व या खाना खाने के दौरान तनाव नहीं होना चाहिए। 
2. सूर्योदय के समय से लगभग ढाई घंटे तक, मध्यान्ह में और सूर्यास्त के समय जठराग्नि संतुलित रहती है। मध्यान्ह में इसकी तीब्रता सबसे अधिक होती है। अतः सुबह का नास्ता सूर्योदय के ढाई घंटे के अंदर, दोपहर का भोजन 1 बजे से 3 बजे के बीच और शाम का भोजन सूर्यास्त के पूर्व करना उपयुक्त रहता है। अगर शाम का भोजन सूर्यास्त के समय करना संभव न हो तब रात्रि में सोने के दो-ढाई घंटे पूर्व भोजन अवश्य कर लेना चाहिए। भूख न हो तब खाना नहीं लेना चाहिए। 
3. भोजन रसमय, स्निग्ध, स्वास्थ्यप्रद तथा ह्रदय को भाने वाला होना चाहिए। अत्यधिक तिक्त (कड़ुए), खट्टे, नमकीन, गरम, चटपटे, शुष्क, तथा जलन उत्पन्न करने वाले भोजन नहीं करने चाहिए। भोजन के साथ घी के प्रयोग से जठराग्नि प्रबल हो जाती है। यदि शाम को दूध पीते हैं तब गरम दूध शाम का खाना खाने के एक घण्टे बाद पीना चाहिए। मात्रा में खाना इतना खाना चाहिए जिससे आपको आवश्यक ऊर्जा मिल सके और खाना खाने के बाद आपको भारीपन न लगे। आहार पदार्थों की सुंगध नाक से सूँघने और उनको नेत्रों से देखने से रस का स्राव होने लगता है। यही कारण है कि उत्तम आहार पदार्थों के बनने की गंध से ही भूख मालूम होने लगती है तथा उनको देखने से क्षुधा बढ़ जाती है।
4. खाना खड़े होकर अथवा कोई अन्य काम करते हुए भोजन नहीं करना चाहिए। खाना हमेशा बैठकर खाना चाहिए। वातावरण अधिक शोर-गुल वाला नहीं होना चाहिए, पास में ऐसी कोई वस्तुएं न हों जिनसे भोजन करने वाले को अरुचि हो। खाना प्रसन्नचित कर देने वाले वातावरण में खाना चाहिए।

विस्तृत जानकारी के लिए निम्नलिखित शीर्षकों के अंतर्गत पोस्ट्स  इसी ब्लॉग पर पढ़ीं जा सकतीं हैं :
1. भोजनान्ते विषम वारी 
2. खाने के समय तनाव रहित रहें
3. भोजन कैसा हो
4. भोजन का उपयुक्त समय
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विशेष : इस पोस्ट में शरीर में होने वाली पाचन क्रिया, पाचन तंत्र और पाचन क्रिया में भाग लेने वाले रसों के सम्पूर्ण विवरण नहीं हैं। एक आम आदमी के समझने के उद्देश्य से केवल विषय वस्तु से सम्बंधित मोटे-मोटे विवरण ही दिए गए हैं। इसी कारण पाचन क्रिया के अंतर्गत आने वाली कुछ क्रियाओं का उल्लेख भी नहीं हुआ है।


Wednesday, April 29, 2015

भोजनान्ते विषम वारी : खाने के तुरंत बाद पानी न पियें


मित्रो !
हमारे शरीर, मन तथा बुद्धि को ऊर्जा (energy) हमारे द्वारा लिए जाने वाले भोजन (food) से प्राप्त होती है किन्तु हमारे शरीर के अंग सीधे भोजन से ऊर्जा प्राप्त नहीं कर सकते। इसके अतिरिक्त हमारे द्वारा लिए जाने वाले भोजन में शरीर को ऊर्जा देने वाले पदार्थ भोजन में एक अंश के रूप में विद्यमान रहते हैं, भोजन का शेष भाग अनुपयोगी होता है। जो कुछ हम भोजन के रूप में खाते हैं उसके साथ हमारे आमाशय में दो क्रियाएँ हो सकती हैं। यदि हमारी पाचन शक्ति ठीक है तब आमाशय में भोजन पर पाचन क्रिया (Digestion) होती है और इस क्रिया द्वारा पोषक तत्व और पदार्थ तथा अनुपयोगी तत्व और पदार्थ अलग-अलग हो जाते हैं। पोषक तत्व और पदार्थ शरीर में अवशोषित कर लिए जाते हैं और अनुपयोगी एवं त्याज्य तत्व और पदार्थ मल-मूत्र के रूप में शरीर के बाहर निकल जाते हैं। यदि पाचन शक्ति ठीक नहीं है तब आमाशय में भोजन पचने के बजाय सड़ता (fermentation) है। सड़ने की स्थिति में अनेक विषाक्त पदार्थ (toxins) उत्पन्न होते हैं। यह विषाक्त पदार्थ शरीर में विभिन्न प्रकार की बीमारियां और अवरोध उत्पन्न करते हैं। ऐसी स्थिति में शरीर नीरोग नहीं रह पाता, शरीर को आवश्यक ऊर्जा प्राप्त नहीं हो पाती। इसका प्रतिकूल प्रभाव हमारे शरीर के विकास, कार्य क्षमता, मन तथा बुद्धि पर पड़ता है। शरीर के अंदर हानिकारक गैसें उत्पन हो जाती हैं। दिन भर आलस्य रहता है, किसी कार्य के करने में मन नहीं लगता। आमाशय में भोजन के सड़ने की क्रिया न हो, इसके लिए आवश्यक है कि हमारी पाचन शक्ति ठीक रहे। 
आयुर्वेद चिकित्सा पद्यति के अनुसार हमारे आमाशय में भोजन पचाने का कार्य जठराग्नि (digestive fire) करती है। जैसे ही हम कुछ भी खाते है यह अग्नि प्रदीप्त हो जाती है। यह अग्नि भोजन से पोषक तत्वों और त्याज्य पदार्थों को अलग कर देती है। इस अग्नि के कमजोर होने पर पाचन क्रिया मंद पड़ जाती है और भोजन अधपचा रह जाता है जिसमें विषाक्त पदार्थ (toxins) होते हैं। यह विषाक्त पदार्थ अनेक बीमारियों को जन्म देते हैं। भोजन करने के बाद पानी पीने से यह अग्नि कमजोर पड़ जाती है और भोजन पच नहीं पाता। इस कारण खाना खाने के तुरंत बाद पानी पीना बर्जित (prohibit) किया गया है।
जठराग्नि मंद या ख़राब होने के लक्षणों में जीभ पर सफेद कोटिंग हो जाना, भूख का कमजोर होना या भूख न लगना, मल त्याग का नियमित न होना, मल त्याग के लिए अंदर से जोर लगाने की आवश्यकता का होना, मल का पानी में डूब जाना, अस्पष्ट सोच, सूजन, गैस, कब्ज का होना, सुस्ती रहना, कार्य में अरुचि का होना, आदि होते हैं।
वैसे तो पूर्णरूपेण स्वस्थ शरीर में भी भोजन से पोषक तत्वों और पदार्थों का शत-प्रतिशत निष्कर्षण व्यवहारिक रूप में संभव नहीं होता किन्तु जठराग्नि के अभाव में भोजन से कोई भी पोषक तत्व और पदार्थ प्राप्त नहीं होते। जठराग्नि से हमें भूख होने का भी आभाष होता है। हमारे शरीर की जठराग्नि मंद न पड़े, इसके लिए भोजन में लिए जाने वाले पदार्थों, भोजन करने का समय, भोजन करने के समय वातावरण, भोजन करने के समय हमारे शरीर का आसान या मुद्रा (posture) आदि का भी ध्यान रखना होता। मंद पडी जठराग्नि को भी भोजन में कुछ विशिष्ट पदार्थ शामिल करके अथवा कुछ पदार्थों को छोड़ कर अथवा उनकी मात्रा कम करके ठीक किया जा सकता है।
 यहॉं यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि यदि खाना खाने के तुरंत पानी नहीं पीना है तब खाना खाने के कितने समय बाद पानी पिया जाय? इस सम्बन्ध में यह मानना है कि खाना खाने के एक घंटा और अड़तालीस मिनट बाद खाने पर जठराग्नि का काम समाप्त हो जाता है अतः आदर्श रूप में खाना खाने के 1 घंटा और 48 मिनट बाद पानी पिया जाय किन्तु खाना खाने के 1 घंटे बाद भी पानी पिया जा सकता है। एक प्रश्न यह भी उठता है कि कभी - कभी खाना खाने के दौरान खाना गले या ग्रास नाली में फंस जाता है, क्या तब भी पानी न पिया जाय? इस सम्बन्ध में दो बातें करनी होतीं हैं, एक तो पानी अल्प मात्रा में इतना लिया जाय कि खाना ग्रास नली में आगे बढ़ जाय, दूसरे यह कि ठंडा पानी न पिया जाय, पानी का तापक्रम सामान्य हो या सामान्य से कुछ अधिक हो। यदि खाना खाने से पूर्व पानी पीना है तब खाने से लगभग 45 मिनट पूर्व पानी पिया जाना चाहिए। इतने समय बाद पानी आमाशय में नहीं रहता।
 मित्रो !
हमारे शरीर, मन तथा बुद्धि को ऊर्जा (energy) हमारे द्वारा लिए जाने वाले भोजन (food) से प्राप्त होती है किन्तु हमारे शरीर के अंग सीधे भोजन से ऊर्जा प्राप्त नहीं कर सकते। इसके अतिरिक्त हमारे द्वारा लिए जाने वाले भोजन में शरीर को ऊर्जा देने वाले पदार्थ भोजन में एक अंश के रूप में विद्यमान रहते हैं, भोजन का शेष भाग अनुपयोगी होता है। जो कुछ हम भोजन के रूप में खाते हैं उसके साथ हमारे आमाशय में दो क्रियाएँ हो सकती हैं। यदि हमारी पाचन शक्ति ठीक है तब आमाशय में भोजन पर पाचन क्रिया (Digestion) होती है और इस क्रिया द्वारा पोषक तत्व और पदार्थ तथा अनुपयोगी तत्व और पदार्थ अलग-अलग हो जाते हैं। पोषक तत्व और पदार्थ शरीर में अवशोषित कर लिए जाते हैं और अनुपयोगी एवं त्याज्य तत्व और पदार्थ मल-मूत्र के रूप में शरीर के बाहर निकल जाते हैं। यदि पाचन शक्ति ठीक नहीं है तब आमाशय में भोजन पचने के बजाय सड़ता (fermentation) है। सड़ने की स्थिति में अनेक विषाक्त पदार्थ (toxins) उत्पन्न होते हैं। यह विषाक्त पदार्थ शरीर में विभिन्न प्रकार की बीमारियां और अवरोध उत्पन्न करते हैं। ऐसी स्थिति में शरीर नीरोग नहीं रह पाता, शरीर को आवश्यक ऊर्जा प्राप्त नहीं हो पाती। इसका प्रतिकूल प्रभाव हमारे शरीर के विकास, कार्य क्षमता, मन तथा बुद्धि पर पड़ता है। शरीर के अंदर हानिकारक गैसें उत्पन हो जाती हैं। दिन भर आलस्य रहता है, किसी कार्य के करने में मन नहीं लगता। आमाशय में भोजन के सड़ने की क्रिया न हो, इसके लिए आवश्यक है कि हमारी पाचन शक्ति ठीक रहे।

आयुर्वेद चिकित्सा पद्यति के अनुसार हमारे आमाशय में भोजन पचाने का कार्य जठराग्नि (digestive fire) करती है। जैसे ही हम कुछ भी खाते है यह अग्नि प्रदीप्त हो जाती है। यह अग्नि भोजन से पोषक तत्वों और त्याज्य पदार्थों को अलग कर देती है। इस अग्नि के कमजोर होने पर पाचन क्रिया मंद पड़ जाती है और भोजन अधपचा रह जाता है जिसमें विषाक्त पदार्थ (toxins) होते हैं। यह विषाक्त पदार्थ अनेक बीमारियों को जन्म देते हैं। भोजन करने के बाद पानी पीने से यह अग्नि कमजोर पड़ जाती है और भोजन पच नहीं पाता। इस कारण खाना खाने के तुरंत बाद पानी पीना बर्जित (prohibit) किया गया है।
जठराग्नि मंद या ख़राब होने के लक्षणों में जीभ पर सफेद कोटिंग हो जाना, भूख का कमजोर होना या भूख न लगना, मल त्याग का नियमित न होना, मल त्याग के लिए अंदर से जोर लगाने की आवश्यकता का होना, मल का पानी में डूब जाना, अस्पष्ट सोच, सूजन, गैस, कब्ज का होना, सुस्ती रहना, कार्य में अरुचि का होना, आदि होते हैं।
वैसे तो पूर्णरूपेण स्वस्थ शरीर में भी भोजन से पोषक तत्वों और पदार्थों का शत-प्रतिशत निष्कर्षण व्यवहारिक रूप में संभव नहीं होता किन्तु जठराग्नि के अभाव में भोजन से कोई भी पोषक तत्व और पदार्थ प्राप्त नहीं होते। जठराग्नि से हमें भूख होने का भी आभाष होता है। हमारे शरीर की जठराग्नि मंद न पड़े, इसके लिए भोजन में लिए जाने वाले पदार्थों, भोजन करने का समय, भोजन करने के समय वातावरण, भोजन करने के समय हमारे शरीर का आसान या मुद्रा (posture) आदि का भी ध्यान रखना होता। मंद पडी जठराग्नि को भी भोजन में कुछ विशिष्ट पदार्थ शामिल करके अथवा कुछ पदार्थों को छोड़ कर अथवा उनकी मात्रा कम करके ठीक किया जा सकता है।

यहॉं यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि यदि खाना खाने के तुरंत पानी नहीं पीना है तब खाना खाने के कितने समय बाद पानी पिया जाय? इस सम्बन्ध में यह मानना है कि खाना खाने के एक घंटा और अड़तालीस मिनट बाद खाने पर जठराग्नि का काम समाप्त हो जाता है अतः आदर्श रूप में खाना खाने के 1 घंटा और 48 मिनट बाद पानी पिया जाय किन्तु खाना खाने के 1 घंटे बाद भी पानी पिया जा सकता है। एक प्रश्न यह भी उठता है कि कभी - कभी खाना खाने के दौरान खाना गले या ग्रास नाली में फंस जाता है, क्या तब भी पानी न पिया जाय? इस सम्बन्ध में दो बातें करनी होतीं हैं, एक तो पानी अल्प मात्रा में इतना लिया जाय कि खाना ग्रास नली में आगे बढ़ जाय, दूसरे यह कि ठंडा पानी न पिया जाय, पानी का तापक्रम सामान्य हो या सामान्य से कुछ अधिक हो। यदि खाना खाने से पूर्व पानी पीना है तब खाने से लगभग 45 मिनट पूर्व पानी पिया जाना चाहिए। इतने समय बाद पानी आमाशय में नहीं रहता।
खाने के तुरंत बाद पानी न पियें