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Tuesday, June 28, 2016

Petition Before God : ईश्वर के सामने याचना

Oh God !
            Give us the knowledge to identify the vices and sinful deeds; Let a feeling of hatred be developed  within us for them. Give us the power and the strength so that we can own the virtues and can save ourselves from doing sinful acts.

हे ईश्वर !
हमें ऐसा ज्ञान दो जिससे हम अवगुणों तथा पाप कर्मों को पहचान सकें, हमारे अन्दर उनके प्रति घृणा का भाव उत्पन्न हो; हमें ऐसी शक्ति और सामर्थ्य दो जिससे हम सदगुणों को धारण करें और पाप कर्मों के करने से बचें।






Wednesday, June 3, 2015

इच्छा का महत्व


मित्रो !

किसी कार्य को संपादित करने के लिए, कार्य के अनुसार अपेक्षित साधनों, उपयुक्त शक्ति, अपेक्षित श्रम और कार्य सम्पादित करने की इच्छा का होना आवश्यक होता है। यदि अपेक्षित साधनों में ही उपयुक्त शक्ति और अपेक्षित श्रम को शामिल मान लिया जाय तब हम कह सकते हैं कि किसी कार्य को सम्पादित करने के लिए संसाधनों और कार्य सम्पादन की इच्छा की आवश्यकता होती है। 
जिस व्यक्ति द्वारा कार्य का सम्पादित किया जाना अपेक्षित होता है उसके लिए, कार्य की प्रकृति को देखते हुए, संसाधनों के तीन स्त्रोत हो सकते हैं। सभी संसाधन उसके शरीर से ही प्राप्त हो जांय अथवा सभी संसाधन उसके शरीर के बाहर से प्राप्त हों अथवा कुछ संसाधन उसके शरीर से प्राप्त हों और शेष संसाधन उसके शरीर के बाहर से। संसाधन किसी भी स्त्रोत से प्राप्त हों, कार्य करने की इच्छा कार्य करने वाले की अपनी होती है। जहां कार्य करने वाला किसी अन्य व्यक्ति के निर्देश पर करता है वहाँ पर भी कार्य करने की इच्छा उसकी अपनी होती है। 
कार्य करने की इच्छा के अभाव में न तो सक्रियता आती है और न ही कार्य प्रारम्भ किया जा सकता है। कार्य करने की इच्छा ही कार्य संपादन के दौरान निरंतरता बनाये रखती है। संसाधनों के अभाव में कार्य करने की इच्छा एक कल्पना, स्वप्न, सोच या योजना ही कही जा सकती है, कार्य का प्रारम्भ होना नहीं माना जा सकता। 
इन्ही विचारों ने मुझे यह कहने के लिए प्रेरित किया है कि :
किसी कार्य के सम्पादन के लिए साधन, शक्ति, श्रम और कार्य करने की इच्छा की आवश्यकता होती है। इनमें कार्य करने की इच्छा का विशिष्ट स्थान होता है। इच्छा के अभाव में किसी कार्य का प्रारम्भ किया जाना भी संभव नहीं है। इच्छा के अभाव में मुंह में उंडेला गया पानी भी हलक के नीचे नहीं उतर सकता।


Wednesday, April 29, 2015

भोजनान्ते विषम वारी : खाने के तुरंत बाद पानी न पियें


मित्रो !
हमारे शरीर, मन तथा बुद्धि को ऊर्जा (energy) हमारे द्वारा लिए जाने वाले भोजन (food) से प्राप्त होती है किन्तु हमारे शरीर के अंग सीधे भोजन से ऊर्जा प्राप्त नहीं कर सकते। इसके अतिरिक्त हमारे द्वारा लिए जाने वाले भोजन में शरीर को ऊर्जा देने वाले पदार्थ भोजन में एक अंश के रूप में विद्यमान रहते हैं, भोजन का शेष भाग अनुपयोगी होता है। जो कुछ हम भोजन के रूप में खाते हैं उसके साथ हमारे आमाशय में दो क्रियाएँ हो सकती हैं। यदि हमारी पाचन शक्ति ठीक है तब आमाशय में भोजन पर पाचन क्रिया (Digestion) होती है और इस क्रिया द्वारा पोषक तत्व और पदार्थ तथा अनुपयोगी तत्व और पदार्थ अलग-अलग हो जाते हैं। पोषक तत्व और पदार्थ शरीर में अवशोषित कर लिए जाते हैं और अनुपयोगी एवं त्याज्य तत्व और पदार्थ मल-मूत्र के रूप में शरीर के बाहर निकल जाते हैं। यदि पाचन शक्ति ठीक नहीं है तब आमाशय में भोजन पचने के बजाय सड़ता (fermentation) है। सड़ने की स्थिति में अनेक विषाक्त पदार्थ (toxins) उत्पन्न होते हैं। यह विषाक्त पदार्थ शरीर में विभिन्न प्रकार की बीमारियां और अवरोध उत्पन्न करते हैं। ऐसी स्थिति में शरीर नीरोग नहीं रह पाता, शरीर को आवश्यक ऊर्जा प्राप्त नहीं हो पाती। इसका प्रतिकूल प्रभाव हमारे शरीर के विकास, कार्य क्षमता, मन तथा बुद्धि पर पड़ता है। शरीर के अंदर हानिकारक गैसें उत्पन हो जाती हैं। दिन भर आलस्य रहता है, किसी कार्य के करने में मन नहीं लगता। आमाशय में भोजन के सड़ने की क्रिया न हो, इसके लिए आवश्यक है कि हमारी पाचन शक्ति ठीक रहे। 
आयुर्वेद चिकित्सा पद्यति के अनुसार हमारे आमाशय में भोजन पचाने का कार्य जठराग्नि (digestive fire) करती है। जैसे ही हम कुछ भी खाते है यह अग्नि प्रदीप्त हो जाती है। यह अग्नि भोजन से पोषक तत्वों और त्याज्य पदार्थों को अलग कर देती है। इस अग्नि के कमजोर होने पर पाचन क्रिया मंद पड़ जाती है और भोजन अधपचा रह जाता है जिसमें विषाक्त पदार्थ (toxins) होते हैं। यह विषाक्त पदार्थ अनेक बीमारियों को जन्म देते हैं। भोजन करने के बाद पानी पीने से यह अग्नि कमजोर पड़ जाती है और भोजन पच नहीं पाता। इस कारण खाना खाने के तुरंत बाद पानी पीना बर्जित (prohibit) किया गया है।
जठराग्नि मंद या ख़राब होने के लक्षणों में जीभ पर सफेद कोटिंग हो जाना, भूख का कमजोर होना या भूख न लगना, मल त्याग का नियमित न होना, मल त्याग के लिए अंदर से जोर लगाने की आवश्यकता का होना, मल का पानी में डूब जाना, अस्पष्ट सोच, सूजन, गैस, कब्ज का होना, सुस्ती रहना, कार्य में अरुचि का होना, आदि होते हैं।
वैसे तो पूर्णरूपेण स्वस्थ शरीर में भी भोजन से पोषक तत्वों और पदार्थों का शत-प्रतिशत निष्कर्षण व्यवहारिक रूप में संभव नहीं होता किन्तु जठराग्नि के अभाव में भोजन से कोई भी पोषक तत्व और पदार्थ प्राप्त नहीं होते। जठराग्नि से हमें भूख होने का भी आभाष होता है। हमारे शरीर की जठराग्नि मंद न पड़े, इसके लिए भोजन में लिए जाने वाले पदार्थों, भोजन करने का समय, भोजन करने के समय वातावरण, भोजन करने के समय हमारे शरीर का आसान या मुद्रा (posture) आदि का भी ध्यान रखना होता। मंद पडी जठराग्नि को भी भोजन में कुछ विशिष्ट पदार्थ शामिल करके अथवा कुछ पदार्थों को छोड़ कर अथवा उनकी मात्रा कम करके ठीक किया जा सकता है।
 यहॉं यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि यदि खाना खाने के तुरंत पानी नहीं पीना है तब खाना खाने के कितने समय बाद पानी पिया जाय? इस सम्बन्ध में यह मानना है कि खाना खाने के एक घंटा और अड़तालीस मिनट बाद खाने पर जठराग्नि का काम समाप्त हो जाता है अतः आदर्श रूप में खाना खाने के 1 घंटा और 48 मिनट बाद पानी पिया जाय किन्तु खाना खाने के 1 घंटे बाद भी पानी पिया जा सकता है। एक प्रश्न यह भी उठता है कि कभी - कभी खाना खाने के दौरान खाना गले या ग्रास नाली में फंस जाता है, क्या तब भी पानी न पिया जाय? इस सम्बन्ध में दो बातें करनी होतीं हैं, एक तो पानी अल्प मात्रा में इतना लिया जाय कि खाना ग्रास नली में आगे बढ़ जाय, दूसरे यह कि ठंडा पानी न पिया जाय, पानी का तापक्रम सामान्य हो या सामान्य से कुछ अधिक हो। यदि खाना खाने से पूर्व पानी पीना है तब खाने से लगभग 45 मिनट पूर्व पानी पिया जाना चाहिए। इतने समय बाद पानी आमाशय में नहीं रहता।
 मित्रो !
हमारे शरीर, मन तथा बुद्धि को ऊर्जा (energy) हमारे द्वारा लिए जाने वाले भोजन (food) से प्राप्त होती है किन्तु हमारे शरीर के अंग सीधे भोजन से ऊर्जा प्राप्त नहीं कर सकते। इसके अतिरिक्त हमारे द्वारा लिए जाने वाले भोजन में शरीर को ऊर्जा देने वाले पदार्थ भोजन में एक अंश के रूप में विद्यमान रहते हैं, भोजन का शेष भाग अनुपयोगी होता है। जो कुछ हम भोजन के रूप में खाते हैं उसके साथ हमारे आमाशय में दो क्रियाएँ हो सकती हैं। यदि हमारी पाचन शक्ति ठीक है तब आमाशय में भोजन पर पाचन क्रिया (Digestion) होती है और इस क्रिया द्वारा पोषक तत्व और पदार्थ तथा अनुपयोगी तत्व और पदार्थ अलग-अलग हो जाते हैं। पोषक तत्व और पदार्थ शरीर में अवशोषित कर लिए जाते हैं और अनुपयोगी एवं त्याज्य तत्व और पदार्थ मल-मूत्र के रूप में शरीर के बाहर निकल जाते हैं। यदि पाचन शक्ति ठीक नहीं है तब आमाशय में भोजन पचने के बजाय सड़ता (fermentation) है। सड़ने की स्थिति में अनेक विषाक्त पदार्थ (toxins) उत्पन्न होते हैं। यह विषाक्त पदार्थ शरीर में विभिन्न प्रकार की बीमारियां और अवरोध उत्पन्न करते हैं। ऐसी स्थिति में शरीर नीरोग नहीं रह पाता, शरीर को आवश्यक ऊर्जा प्राप्त नहीं हो पाती। इसका प्रतिकूल प्रभाव हमारे शरीर के विकास, कार्य क्षमता, मन तथा बुद्धि पर पड़ता है। शरीर के अंदर हानिकारक गैसें उत्पन हो जाती हैं। दिन भर आलस्य रहता है, किसी कार्य के करने में मन नहीं लगता। आमाशय में भोजन के सड़ने की क्रिया न हो, इसके लिए आवश्यक है कि हमारी पाचन शक्ति ठीक रहे।

आयुर्वेद चिकित्सा पद्यति के अनुसार हमारे आमाशय में भोजन पचाने का कार्य जठराग्नि (digestive fire) करती है। जैसे ही हम कुछ भी खाते है यह अग्नि प्रदीप्त हो जाती है। यह अग्नि भोजन से पोषक तत्वों और त्याज्य पदार्थों को अलग कर देती है। इस अग्नि के कमजोर होने पर पाचन क्रिया मंद पड़ जाती है और भोजन अधपचा रह जाता है जिसमें विषाक्त पदार्थ (toxins) होते हैं। यह विषाक्त पदार्थ अनेक बीमारियों को जन्म देते हैं। भोजन करने के बाद पानी पीने से यह अग्नि कमजोर पड़ जाती है और भोजन पच नहीं पाता। इस कारण खाना खाने के तुरंत बाद पानी पीना बर्जित (prohibit) किया गया है।
जठराग्नि मंद या ख़राब होने के लक्षणों में जीभ पर सफेद कोटिंग हो जाना, भूख का कमजोर होना या भूख न लगना, मल त्याग का नियमित न होना, मल त्याग के लिए अंदर से जोर लगाने की आवश्यकता का होना, मल का पानी में डूब जाना, अस्पष्ट सोच, सूजन, गैस, कब्ज का होना, सुस्ती रहना, कार्य में अरुचि का होना, आदि होते हैं।
वैसे तो पूर्णरूपेण स्वस्थ शरीर में भी भोजन से पोषक तत्वों और पदार्थों का शत-प्रतिशत निष्कर्षण व्यवहारिक रूप में संभव नहीं होता किन्तु जठराग्नि के अभाव में भोजन से कोई भी पोषक तत्व और पदार्थ प्राप्त नहीं होते। जठराग्नि से हमें भूख होने का भी आभाष होता है। हमारे शरीर की जठराग्नि मंद न पड़े, इसके लिए भोजन में लिए जाने वाले पदार्थों, भोजन करने का समय, भोजन करने के समय वातावरण, भोजन करने के समय हमारे शरीर का आसान या मुद्रा (posture) आदि का भी ध्यान रखना होता। मंद पडी जठराग्नि को भी भोजन में कुछ विशिष्ट पदार्थ शामिल करके अथवा कुछ पदार्थों को छोड़ कर अथवा उनकी मात्रा कम करके ठीक किया जा सकता है।

यहॉं यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि यदि खाना खाने के तुरंत पानी नहीं पीना है तब खाना खाने के कितने समय बाद पानी पिया जाय? इस सम्बन्ध में यह मानना है कि खाना खाने के एक घंटा और अड़तालीस मिनट बाद खाने पर जठराग्नि का काम समाप्त हो जाता है अतः आदर्श रूप में खाना खाने के 1 घंटा और 48 मिनट बाद पानी पिया जाय किन्तु खाना खाने के 1 घंटे बाद भी पानी पिया जा सकता है। एक प्रश्न यह भी उठता है कि कभी - कभी खाना खाने के दौरान खाना गले या ग्रास नाली में फंस जाता है, क्या तब भी पानी न पिया जाय? इस सम्बन्ध में दो बातें करनी होतीं हैं, एक तो पानी अल्प मात्रा में इतना लिया जाय कि खाना ग्रास नली में आगे बढ़ जाय, दूसरे यह कि ठंडा पानी न पिया जाय, पानी का तापक्रम सामान्य हो या सामान्य से कुछ अधिक हो। यदि खाना खाने से पूर्व पानी पीना है तब खाने से लगभग 45 मिनट पूर्व पानी पिया जाना चाहिए। इतने समय बाद पानी आमाशय में नहीं रहता।
खाने के तुरंत बाद पानी न पियें