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Wednesday, August 1, 2018

Thank God, Pray God



मित्रो !
मैं शुक्रगुजार होता हूँ प्रतिदिन ईश्वर का,
क्योंकि मुझे एहसास है कि,
मैं मर गया होता जिंदगी के किसी दिन,
अगर उसने मुझे न बचाया होता,
मैं प्रार्थना करता हूँ प्रतिदिन ईश्वर की
क्योंकि मैं चाहता हूँ कि वह,
रखे सही रास्ते पर मुझको,
मेरे जीवन की अंतिम सांस तक।

           I thank God everyday because I feel that had He not saved me in my life, I would have died any day in my life.
           I pray to God everyday because I want Him to keep me on the      right track till my last breath on this Earth.




Thursday, July 26, 2018

तेरा ईश्वर मेरा ईश्वर YOUR GOD AND MY GOD


मित्रो!
     ईश्वर आस्था का विषय है। हर व्यक्ति का अपना ईश्वर होता है। समस्या उस समय उत्पन्न होती है जब कोई व्यक्ति अपने ईश्वर को दूसरों पर थोपने का प्रयास करता है। इसका कारण ईश्वर के प्रति हमारी अज्ञानता है।
YOUR GOD AND MY GOD
          God is the matter of faith. Every person has his own God. Problem arises when a person tries to impose his own God on others. The reason for this is our ignorance towards God.



Sunday, June 3, 2018

GOD AND THE NATURE ईश्वर और प्रकृति


मित्रो!
      एक ईश्वर है और बाकी सब कुछ उसके द्वारा रची गयी प्रकृति है। प्रकृति के बाहर कुछ भी नहीं है। इस प्रकृति में वह भी वही समाया हुआ है। ईश्वर और उसकी प्रकृति के पुजारियों को  मेरा विनम्र प्रणाम।
                There is one God and everything else is the nature created by Him. There is nothing outside the nature. Even God Himself is deeply embedded in this nature. My humble salute to the priests of God and the nature.


Wednesday, April 11, 2018

ईश्वर को कैसे करें प्रसन्न : HOW TO PLEASE GOD


मित्रो !
     ईश्वर को प्रसन्न करना है तो सबसे पहले यह जानो कि ईश्वर को क्या पसंद है और उसे क्या पसंद नहीं है। उसके बाद वही करो जो उसे पसंद है।  ऐसा करने से बचो जो ईश्वर को पसंद नहीं है।



Friday, September 29, 2017

ONE GOD FOR ALL सबका ईश्वर एक


मित्रो !
One who is creator of this Universe, one who is savior as well as destroyer of the nature, one who is ocean of compassion, one who gives us fruits of our actions, One who punishes the guilty, one who is fair judge, One who creates all, one who knows everything about everyone, one who has neither beginning nor end, whose dimensions are infinite, he who dwells in every particle, he who, although fragmented, is undivided, one who loves his creation, one who loves to see love among all beings, one who is hungry of love, He who is paramount, supreme, omniscient, he is the God. I bow to the God.
वह जो सृष्टि का कारण है, वह जो जो जगत का पालनहार भी है और संहारक भी है, वह जो दया का सागर है, वह जो कर्मों के फलों का दाता है, वह जो दोषियों को दण्डित करने वाला है, वह जो निष्पक्ष न्यायाधीश है, वह जो सबकी रचना करता है, वह जो सबके बारे में सब कुछ जानता है, वह जिसका न तो आदि है और न ही जिसका अंत है, जिसका विस्तार अनंत है, वह जो कण-कण में समाया हुआ है, वह जो खंड-खंड होकर भी अखंड है, वह जिसे अपनी सृष्टि से प्यार है, वह जो अपनी संतानों के बीच प्रेम देखना चाहता है, वह जो प्रेम का भूखा है, वह जो सर्वोपरि, सर्वश्रेष्ठ, सर्वज्ञानी है, वही ईश्वर है। मैं उस ईश्वर को प्रणाम करता हूँ।
हम ऊपर उल्लिखित गुणों वाले किसी ईश्वर की कल्पना ही कर सकते हैं, कोई मूर्ति नहीं बना सकते क्योंकि एक ही क्षण पर ऐसी किसी वस्तु जो अनंत विस्तार लिए हो और किसी छोटे कण में भी समायी हुयी हो की मूर्ति या चित्र कैसे बनाया जा सकता है। हम ऐसे गुणों को निरूपित करने वाले किसी प्रतीक की कल्पना ही कर सकते हैं। प्रतीक कुछ भी हो सकता है, प्रतीक अच्छा दिखता है या नहीं इसका ईश्वर से कोई सम्बन्ध नहीं होता। ईश्वर के स्मरण के लिए आवश्यक होता है उसमें विश्वास व्यक्त करना और उसकी सत्ता को स्वीकार करना। जो लोग प्रतिक के बिना ईश्वर का स्मरण कर सकते हैं उनके लिए ईश्वर के प्रतीक की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए।
मेरे विचार से किसी भी धर्म के अनुयायियों को ऐसा ईश्वर मानने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। प्रतीकों पर भी कोई विवाद नहीं करना चाहिए। भिन्न भिन्न प्रतीकों को भी लेकर किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए।

Friday, May 26, 2017

असहाय का सहाय है ईश्वर

मित्रो!

      ईश्वर का हाथ बनकर किसी असहाय और जरूरतमंद की मदद कीजिये, आपको ईश्वर का प्यार और आशीर्वाद तो मिलेगा ही, साथ ही आपको आनन्द की असीमित अनुभूति भी होगी।


Tuesday, March 21, 2017

ईश्वर का शुक्रिया कैसे अदा करें : HOW TO THANK GOD

मित्रो !
     मैंने अपनी कुछ पोस्टों में यह कहा था कि आदमी, ईश्वर जिसने उसे सब कुछ दिया है का शुक्रिया अदा नहीं करता जबकि अल्प लाभ के लिए दूसरों का शुक्रिया अदा करता है। यह मेरी गलती थी, उस समय मैं यह भूल गया था कि कोई भी पुत्र अपने पिता के उपकारों का शुक्रिया अदा करने की स्थिति में नहीं होता क्योंकि - - -

          शुक्रिया औपचारिकतावश अदा किया जाता है और पिता-पुत्र के बीच औपचारिकता का कोई स्थान नहीं होता। पिता द्वारा पुत्र पर किये गए उपकार पुत्र पर ऋण होते हैं। इस ऋण को चुकाना पुत्र का दायित्व होता है। ऐसा ऋण पिता की अपेक्षाओं को पूरा करके और पिता के आदर्शों पर चल कर ही चुकाया जा सकता है।  पुत्र से अपेक्षित होता है कि वह पिता की अपेक्षाओं और उनके आदर्शों को जाने और उनको अपना दायित्व मानकर यथासंभव पूरा करे। ईश्वर हमारा परम पिता है, उसके द्वारा हमारे ऊपर किये गए उपकारों की कोई सीमा नहीं है। अतः हम उसके ऋण से कभी मुक्त नहीं हो सकते।


Tuesday, March 14, 2017

ईश्वर से दूर करता है अहंकार

मित्रो !
         जब हम किसी मुसीबत में फंसे होते हैं तब मुसीबत से बचाने के लिए हम ईश्वर को पुकारते हैं। ईश्वर हमें बचाता है किन्तु मुसीबत से बच निकलने के बाद ईश्वर का धन्यवाद करने के बजाय  इसका श्रेय स्वयं को देने लगते हैं। परिणामस्वरूप हम ईश्वर को भूल जाते हैं। 


Monday, March 13, 2017

विस्वास और धैर्य की परीक्षा

मित्रो !
    जहाँ ईश्वर ने समस्याएं बनायीं है वहीं उसने समस्याओं के समाधान भी रचे हैं। जहां एक रास्ता बंद हो जाता है, ईश्वर हमारे धैर्य की परीक्षा लेता है और हमारे लिए दूसरा रास्ता खोल देता है। जो व्यक्ति ईश्वर में विश्वास खोये बिना धैर्य के साथ अपना कर्म करता है उसे अपनी मंजिल अवश्य मिलती है।
     अंधी गली (Blind lane) के आख़िरी छोर पर रहने वाला व्यक्ति भी मुख्य मार्ग पाता है, मोटर वाहनों में रिवर्स गिअर होता है।

Tuesday, January 31, 2017

हमारा ईश्वर विषयक ज्ञान : Our Theological Knowledge

मित्रो !
          अधिकांश लोगों के सम्पूर्ण जीवन में ईश्वर को लेकर ज्ञान और क्रिया-कलाप एक जैसे रहते हैं। उन्हें बचपन में जो कुछ, यथा घर में स्थापित मंदिर या विभिन्न स्थानों पर विभिन्न मंदिरों में जाकर ईश्वर के चित्र या मूर्ति और वहां उपलब्ध अन्य देवी -देवताओं के चित्रों और मूर्तियों के आगे शीश झुकाना, उनकी चरण वंदना करना, प्रार्थना करना, दान करना आदि, सिखा दिया जाता हैं वे उसी के इर्द-गिर्द घूमते रहते हैं।
           बचपन में जो चित्र या मूर्तियां बच्चे देखते हैं, उनसे मिलती-जुलती मूर्ति या चित्र देखने पर वे उसे भगवान मानकर हाथ जोड़ लेते हैं। बचपन में उनसे यह भी कहा जाता है कि अगर वे भगवान के हाथ नहीं जोड़ेंगे अथवा उनके पैर नहीं छुएंगे तब भगवान नाराज हो जाएंगे। यह धारणा उनके अंदर घर कर जाती है। इसलिए उन्हें जहां-कहीं भी भगवान की मूर्ति या उसके स्वरूप से मिलती - जुलती किसी और की मूर्ति (भले ही वह चित्र या मूर्ति भगवान की न हो) दिखती है तब वे, भगवान को नाराज न करने के उद्देश्य से, उसे भगवान समझकर  हाथ जोड़ लेते हैं।
            लोग कहते हैं कि ईश्वर से डरो, मैं भी कहता हूँ कि मनुष्य को ईश्वर से डरना चाहिए किन्तु मेरा अभिप्राय यह नहीं है कि भय से ईश्वर मानो।  ईश्वर से डरने का मेरा अभिप्राय यह है कि कुछ ऐसा न करो जो ईश्वर को प्रिय नहीं है क्योंकि ऐसा कुछ करने पर वह रुष्ट हो जायेगा। बच्चे को प्यार करने वाले कोई भी माँ-बाप यह नहीं चाहते कि  उनका बच्चा ऐसा कुछ करे जिससे वह दंड का भागी बने। जब हम समझदार हो जाते हैं तब यह जानने का भी हमारा दायित्व हो जाता है कि हम जाने कि ईश्वर को क्या प्रिय है और क्या प्रिय नहीं है। कोई भी अपने प्रिय को रुष्ट नहीं करना चाहता। प्रिय को प्रसन्न रखने के लिए व्यक्ति सदैव ऐसा कार्य करता है जो प्रिय को प्रिय हों। प्रिय के सिद्धांतो को भी जीता है। ऐसे में ईश्वर से प्यार करने वाले को यह जानना जरूरी हो जाता है की ईश्वर हमसे क्या चाहता है, वह कैसे प्रसन्न होता है।
            बच्चा मासूम  होता है, उसकी गलतियां माफी योग्य होतीं हैं किन्तु वही गलतियां यदि युवा करे तब वह माफी योग्य नहीं रह जाता। उसी एक ईश्वर के अनेक चित्र बनाने वाला या तो कोई बच्चा हो सकता है या कोई चित्रकार। 
           चिंतन का विषय यह है कि क्या ईश्वर की अनेक स्वरूपों वाली मूर्तियां बनाने वाला शिल्पकार या अनेक चित्र बनाने वाला चित्रकार जहां ऐसे मूर्तिकार और शिल्पकार ईश्वर के सिद्धांतों की अवहेलना करते हों क्या ईश्वर उनसे प्रसन्न होगा।


           मेरा मानना है कि जब तक हम बच्चे हैं तब तक के लिए यह सब ठीक है किन्तु जब हम इस काबिल हो जाते हैं कि हम साश्वत मूल्यों को समझ सकते हैं तब चित्रो और मूर्तियों तक सीमित ईश्वर का ज्ञान पर्याप्त नहीं है। इस स्तर पर हमें अपने और ईश्वर के बारे चिंतन और मनन करना चाहिए।

Monday, December 12, 2016

गुमराह होता आदमी

 
मित्रो !
मनुष्य अपने को ईश्वर के रंग में रंगने के बजाय ईश्वर को ही अपने अनेक रंगों में रंगने में व्यस्त है। ऐसा करके वह अपनी सीमित सोच से असीमित की रचना का असफल प्रयास कर रहा है।
रचना से रचयिता सभी मायनो में बड़ा होता है। ईश्वर इस जगत में समस्त जड़ और चेतन, जिनमें मनुष्य भी शामिल है, का रचयिता है। इसलिए जगत के समस्त जड़ और चेतन से ईश्वर बड़ा है। अतः किसी भी जड़ या चेतन में ईश्वर की रचना कर पाने की योग्यता और क्षमता नहीं है। 

Tuesday, November 22, 2016

असहाय के लिए ईश्वर से प्रार्थना करें


मित्रो!

जब हमारा कोई परिचित या संबंधी गंभीर अवस्था में अस्वस्थ होता है और उपचार का भी उस पर कोई असर नहीं दिखाई देता। उस समय हम यही सोचते हैं कि काश हम कुछ कर सकते। उस समय हमें एक रास्ता दिखाई देता है, हम उसके लिए ईश्वर से दुआ माँगते हैं कि वह स्वस्थ हो जाय। ऐसे ही हमें चाहिए कि जहां हम किसी गरीब या असहाय की अपने तन, मन या धन से सहायता कर पाने में असमर्थ हों वहां पर हमें उस गरीब या असहाय के लिए ईश्वर से दुआ माँगनी चाहिए। इससे हमारा चरित्र निर्मल होता है।


Sunday, November 20, 2016

निराशा, चिंता या तनाव से मुक्ति : Freedom from Despair, Worry or Tension

मित्रो !
निराशा, चिंता या तनाव से ग्रसित होने पर हमारा मष्तिष्क सामान्य स्थिति में कार्य नहीं करता और इस कारण हम कोई कार्य सुचारू रूप से नहीं कर पाते। इनसे स्वास्थ्य हानि भी होती है। इनसे जितनी जल्दी छुटकारा पा लिया जाय उतना ही स्वास्थ्य के लिए अच्छा होता है।
जो लोग ईश्वर में आस्था रखते हैं उनको निराशा, तनाव और चिन्ताएं नहीं सतातीं। आस्थावान व्यक्ति निराशा, चिंता या तनाव से ग्रस्त होने पर ईश्वर को याद कर यह सोच कर कि ईश्वर सब ठीक करेगा निश्चिन्त हो जाता है। ऐसा होने पर वह निराशा, चिंता और तनाव से मुक्त हो जाता है।



Thursday, November 3, 2016

वह मंदिरों में ही नहीं मंदिरों में भी

मित्रो !
         जो यह जानता है कि ईश्वर सब जगह है उसे ईश्वर को याद करने के लिए मंदिर की जरूरत नहीं होती, वह मंदिर के बिना भी ईश्वर को याद कर लेता है। केवल मंदिर ही वह स्थान नहीं है जहां ईश्वर है, अपितु मंदिर उन स्थानों में से एक स्थान है जहां ईश्वर है क्योंकि ईश्वर सर्वविद्यमान (Omnipresent) है। इसीलिये मेरा मानना है कि -
       मैं नास्तिक हूँ किन्तु इतना बड़ा नहीं कि राह में आये मन्दिरों में ईश्वर को नकार दूँ, साथ ही इतना बड़ा आस्तिक भी नहीं हूँ कि मंदिरों की खोज में ही घूमा करूँ, क्योंकि मेरा अपना विश्वास है कि भगवान मंदिरों में ही नहीं, मंदिरों में भी है क्योंकि वह सर्वविद्यमान है।


Monday, October 31, 2016

प्यार का अनमोल उपहार : Valuable Gift of Love

  • मित्रो !
    God has blessed all of us with valuable gift of love. We should understand love and thereafter -
        Live in love and inspire others to live with love.
    ईश्वर ने हम सभी को प्यार के अनमोल उपहार से आशीर्वाद दिया है। हमें चाहिए कि हम प्यार को समझें और उसके बाद -
    प्यार को जियें और औरों को प्यार से जीने के लिए प्रेरित करें।
  • Promote and propagate love.

Friday, October 7, 2016

ईश्वर के प्रति अज्ञानता : IGNORANCE ABOUT GOD

मित्रो !
          जब सम्पूर्ण जगत की रचना करने वाला ईश्वर एक है तब ईश्वर क्या है, वह क्या चाहता है और क्या करता है, को लेकर अलग-अलग लोंगों के अलग-अलग विचार होने का कारण मनुष्य का ईश्वर के प्रति अज्ञानी या अल्प ज्ञानी होना ही है।

 
        When the creator of whole universe is one God then concept of separate God, by the different people, in the context of what God is, what He wants and what He does is due to our ignorance or incomplete knowledge about God.


Sunday, October 2, 2016

निराशा और तनाव से मुक्ति : Freedom from Frustration and Tension


  • मित्रो !
    निराश या तनाव ग्रस्त होने पर जब कोई रास्ता न सूझ रहा हो तब सब कुछ ईश्वर पर छोड़ देना चाहिए। ऐसा करने से चित्त शीघ्र शान्त हो जाता है। 
    व्यवहारिक जीवन में इसे उपयोग में लाया जा सकता है। यह विचार अत्यंत उपयोगी है। ईश्वर में विश्वास रखने का यह एक बड़ा लाभ है।

Friday, September 30, 2016

सबका ईश्वर एक : One God for All

मित्रो !
      वह जो सृष्टि का कारण है, वह जो जगत का पालनहार भी है और संहारक भी है, वह जो दया का सागर है, वह जो कर्मों के फलों का दाता है, वह जो दोषियों को दण्डित करने वाला है, वह जो निष्पक्ष न्यायाधीश है, वह जो सबकी रचना करता है, वह जो सबके बारे में सब कुछ जानता है, वह जिसका न तो आदि है और न ही जिसका अंत है, जिसका विस्तार अनंत है, वह जो कण-कण में समाया हुआ है, वह जो खंड-खंड होकर भी अखंड है, वह जिसे अपनी सृष्टि से प्यार है, वह जो अपनी संतानों के बीच प्रेम देखना चाहता है, वह जो प्रेम का भूखा है, वह जो सर्वोपरि, सर्वश्रेष्ठ, सर्वज्ञानी है, वही ईश्वर है। मैं उस ईश्वर को प्रणाम करता हूँ।
          हम ऊपर उल्लिखित गुणों वाले किसी ईश्वर की कल्पना ही कर सकते हैं, कोई मूर्ति नहीं बना सकते क्योंकि एक ही क्षण पर ऐसी किसी वस्तु जो अनंत विस्तार लिए हो और किसी छोटे कण में भी समायी हुयी हो की मूर्ति या चित्र कैसे बनाया जा सकता है। हम ऐसे गुणों को निरूपित करने वाले किसी प्रतीक की कल्पना ही कर सकते हैं। प्रतीक कुछ भी हो सकता है, प्रतीक अच्छा दिखता है या नहीं इसका ईश्वर से कोई सम्बन्ध नहीं होता। ईश्वर के स्मरण के लिए आवश्यक होता है उसमें विश्वास व्यक्त करना और उसकी सत्ता को स्वीकार करना। जो लोग प्रतिक के बिना ईश्वर का स्मरण कर सकते हैं उनके लिए ईश्वर के प्रतीक की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए।
     मेरे विचार से किसी भी धर्म के अनुयायियों को ऐसा ईश्वर मानने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। प्रतीकों पर भी कोई विवाद नहीं करना चाहिए। भिन्न भिन्न प्रतीकों को भी लेकर किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए।

       One who is creator of this universe, one who is savior as well as destroyer of the nature, one who is ocean of compassion, one who gives us fruits of our actions, One who punishes the guilty, one who is fair judge, One who creates all, one who knows everything about everyone, one who has neither beginning nor end, whose dimensions are infinite, he who dwells in every particle, he who, although fragmented, is undivided, one who loves his creation, one who loves to see love among all beings, one who is hungry of love, He who is paramount, supreme, omniscient, he is the God. I bow to the God.


Tuesday, September 27, 2016

कोई ईश्वर को क्यों माने : Why One Should Accept God

मित्रो ! 
     मैं अपना ईश्वर तुम्हारे ऊपर थोपना नहीं चाहता। इसलिए इस बात का मुझ पर कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम मेरे ईश्वर को अपना ईश्वर मानते हो या नहीं। मैं तो केवल इतना चाहता हूँ कि तुम्हारा भी कोई ईश्वर हो ताकि ईश्वरवादी को मिलने वाले लाभों से तुम वंचित न रह जाओ। 
   घोर निराशा में ईश्वर आशा का किरण पुंज है। जब हमारे अपने भी हमारा साथ छोड़ जाते हैं तब भी वह हमारे साथ रहता है, उसके रहते हम कभी अनाथ नहीं होते। उसकी स्वीकृति से हमें सदमार्ग पर चलने की प्रेरणा मिलती है, हम अनाचार से बचते है। उसकी शरण में हमें तनाव और चिंता से मुक्ति मिलती है। उसके डर से हम पाप कर्म करने से बचते हैं। हम अहंकार से बचते हैं। उसकी स्वीकृति हमें विनम्र बनाती है। उसकी सोच हमें निडर बनाती है। ईश्वर जितना हमारे निकट होता है उतना कोई दूसरा हमारे निकट नहीं होता। वह हमारा अंतरंग मित्र होता है, हम उसके साथ वह सब कुछ साझा कर सकते हैं जो किसी अन्य के साथ साझा नहीं कर सकते। उसके सामने अपराधों की स्वीकृति से अपराध बोध से मन हल्का हो जाता है और हमारी अपराध मनोवृत्ति पर अंकुश लगता है।
       It does not matter to me if you don't accept my God as your God. Also I do not want to impose my God upon you but I certainly want that you should also have God so that you may not be deprived of benefits available to a theist.




Friday, September 16, 2016

कर्म करने में ईश्वर का दखल नहीं : No Interference of God in Karm


मित्रो !
      ईश्वर को मानने वाले अधिकांश व्यक्ति यह मानते हैं कि ईश्वर की मर्जी के बिना पत्ता भी नहीं हिल सकता। यदि इसे सही मान लें तब प्रश्न यह उठता है कि क्या हमारे पाप कर्म करने में ईश्वर की सहमति या मर्जी होती है? मेरे विचार से ऐसा मान लेना पूर्णतः गलत है। 
     ऐसा मान लेना तीन कारणों से उचित नहीं है, पहला यह कि पाप कर्म करने के लिए प्रेरित करने या सहमति देने वाला ईश्वर नहीं हो सकता, दूसरे यह कि मनुष्य अपनी प्रकृति से प्रेरित हुआ कर्म करता है और तीसरे यह कि मनुष्य कर्म करने और किये जाने वाले कर्म का चयन करने के लिए स्वतंत्र है। 
    श्रीमद भगवद गीता के अध्याय 3 (कर्मयोग) के श्लोक 5 का अर्थ यह है कि प्रत्येक व्यक्ति को प्रकृति से अर्जित गुणों के अनुसार विवश होकर कर्म करना पड़ता है, अतः कोई भी एक क्षण के लिए भी बिना कर्म किये नहीं रह सकता। इसी अध्याय के श्लोक 8 में भगवान श्री कृष्णा अर्जुन को बताते हैं कि तुम अपना नियत कर्म करो, क्योंकि कर्म न करने की अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है। कर्म के बिना तो शरीर का निर्वाह भी नहीं होता। 
    यहां पर यह समझ लेना उचित होगा कि गीता में संदर्भित प्रकृति क्या है। प्रयेक जीव को जन्म के समय प्रकृति प्राप्त होती है। यह प्रकृति तीन प्रकार के गुणों से बनी होती है, सतो गुण, रजो गुण और तमो गुण। मनुष्य का स्वभाव इन्हीं गुणों पर निर्भर करता है। मनुष्य अपनी प्रकृति से प्रेरित हुआ प्रकृति के अनुसार कर्म करता है। 
    अध्याय 3 के श्लोक 8 में "नियत कर्म" करने की बात कही गयी है। प्रश्न यह उत्पन्न होता है "किसके द्वारा नियत कर्म". इसका उत्तर भगवान श्री कृष्णा द्वारा इसी अध्याय के श्लोक 5, जिसका सन्दर्भ ऊपर दिया गया है, में यह कहते हुए दिया गया है कि प्रत्येक व्यक्ति को प्रकृति से अर्जित गुणों के अनुसार विवश होकर कर्म करना पड़ता है। इससे स्पष्ट होता है कि मनुष्य को कर्म करने की प्रेरणा उसकी अपनी प्रकृति से मिलती है उसे भगवान या कोई अन्य प्रेरित नहीं करते। 
     यहां पर मैं गीता के अध्याय 2 के श्लोक 47 का भी देना चाहूँगा। यह श्लोक निम्प्रकर है 
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन | 
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि || 
    निश्चय ही तुम्हें अपना कर्म करने का अधिकार है, किन्तु कर्म के फलों के तुम अधिकारी नहीं हो। तुम न तो कभी अपने आपको अपने कर्मों के फलों का कारण मानों, न ही कर्म न करने में कभी आसक्त होओ। 
    You have a right to perform your duties, but you are not entitled to the fruits of your actions. Never consider yourself to be the cause of the results of your activities, nor be attached to inaction. 
     इस श्लोक में कर्म करने का अधिकार मनुष्य के पास होने की बात कही गयी है। कर्म करने के अधिकार के अन्दर, कर्म करने, कर्म न करने, विशिष्ट प्रकार का कर्म करने अथवा विशिष्ट प्रकार का कर्म न करने का अधिकार समाहित होता है। अतः यह समझना चाहिए कि कर्म के चयन का अधिकार भी मनुष्य को प्राप्त है।
     अध्याय 3 के श्लोक 36 में अर्जुन ने भगवान् श्री कृष्णा से बहुत ही महत्वपूर्ण प्रश्न (जो हम सब के मन में उठता है) निम्नप्रकार पूछा गया है। 

अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुष: | 
अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजित:|| 
     हे वृष्णिवंशी ! मनुष्य न चाहते भी पाप कर्मों के लिए प्रेरित क्यों होता है? ऐसा लगता है कि उसे बलपूर्वक उसमें लगाया जा रहा है? 
    Why is a person impelled to commit sinful acts, even unwillingly, as if by force, O descendant of Vrishni (Lord Krishna)?

   इस प्रश्न का उत्तर भगवान् श्री कृष्ण द्वारा अगले श्लोक 37 में निम्नप्रकार दिया गया है: 

काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भव: || 
महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम् || 37|| 
      हे अर्जुन ! इसका कारण रजोगुण के संपर्क से उत्पन्न काम है, जो बाद में क्रोध का रूप धारण करता है और जो इस संसार का सर्वभक्षी पापी शत्रु है। 
   It is lust alone, which is born of contact with Rajogun, and later transformed into anger. Know this as the sinful, all-devouring enemy in the world. 
   यहाँ पर पाप कर्म करवाने के लिए रजोगुण का संपर्क उत्तरदायी बताया गया है, जो मनुष्य की प्रकृति के कारण उत्पन्न होता है। 
उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि ईश्वर किसी व्यक्ति से कोई कर्म नहीं करवाता, मनुष्य स्वयं निर्णय लेकर अपनी प्रकृति से प्रेरित हुआ अच्छा या बुरा कर्म करता है।

     सुलभ सन्दर्भ हेतु ऊपर संदर्भित श्लोकों का मूल पथ नीचे दिया जा रहा है। 

अध्याय 3 श्लोक 5 
न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् | 
कार्यते ह्यवश: कर्म सर्व: प्रकृतिजैर्गुणै: || 5|| 
   There is no one who can remain without action even for a moment. Indeed, all beings are compelled to act by their qualities born of the nature. (the nature consists of three guṇas). 
अध्याय 3 श्लोक 8 
नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मण: | 
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मण: || 8|| 
   You should thus perform your prescribed duties, since action is superior to inaction. By ceasing activity, even your bodily maintenance will not be possible.
ओइम नमो भगवते वासुदेवाय।