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Saturday, February 25, 2017

ज्ञान क्या है

मित्रो !
मेरे विचार से -

          हमारे शरीर के अंदर और शरीर के बाहर इस अनंत विस्तार वाले ब्रह्मांड में और उसके परे स्थित शून्य, जड़ या चेतन और उनके कारणों  तथा इनमें या इनसे उत्पन्न होने या कराये जा सकने वाले जड़ या चेतन अथवा भौतिक, आध्यात्मिक, बौद्धिक, मानसिक या भावनात्मक परिवर्तन, विचार एवं अनुभूतियाँ और उनके परिणामों में से किसी के विषय में अथवा उनको लेकर घटित हो रही या घटित कराई जा सकने वाली घटनाओं तथा क्रियाओं और उनके कारणों के सम्बन्ध में किसी भी प्रकार की जानकारी ज्ञान है।  
Knowledge, Wisdom


Tuesday, February 21, 2017

ज्ञान का स्त्रोत निरपेक्ष

मित्रो !

          जो लोग ज्ञान के स्त्रोत को तुच्छ या हीन मानकर उसे ग्रहण नहीं करते वे कितना भी ज्ञान प्राप्त क्यों न कर लें किन्तु वे इस विषय में अज्ञानी ही बने रहते हैं कि ज्ञान स्त्रोत के सापेक्ष निरपेक्ष होता है। ज्ञान किसी भी स्त्रोत से मिले उसे ग्रहण कर लेना चाहिए। ज्ञान व्यक्ति की शक्ति होती है।

Tuesday, January 31, 2017

हमारा ईश्वर विषयक ज्ञान : Our Theological Knowledge

मित्रो !
          अधिकांश लोगों के सम्पूर्ण जीवन में ईश्वर को लेकर ज्ञान और क्रिया-कलाप एक जैसे रहते हैं। उन्हें बचपन में जो कुछ, यथा घर में स्थापित मंदिर या विभिन्न स्थानों पर विभिन्न मंदिरों में जाकर ईश्वर के चित्र या मूर्ति और वहां उपलब्ध अन्य देवी -देवताओं के चित्रों और मूर्तियों के आगे शीश झुकाना, उनकी चरण वंदना करना, प्रार्थना करना, दान करना आदि, सिखा दिया जाता हैं वे उसी के इर्द-गिर्द घूमते रहते हैं।
           बचपन में जो चित्र या मूर्तियां बच्चे देखते हैं, उनसे मिलती-जुलती मूर्ति या चित्र देखने पर वे उसे भगवान मानकर हाथ जोड़ लेते हैं। बचपन में उनसे यह भी कहा जाता है कि अगर वे भगवान के हाथ नहीं जोड़ेंगे अथवा उनके पैर नहीं छुएंगे तब भगवान नाराज हो जाएंगे। यह धारणा उनके अंदर घर कर जाती है। इसलिए उन्हें जहां-कहीं भी भगवान की मूर्ति या उसके स्वरूप से मिलती - जुलती किसी और की मूर्ति (भले ही वह चित्र या मूर्ति भगवान की न हो) दिखती है तब वे, भगवान को नाराज न करने के उद्देश्य से, उसे भगवान समझकर  हाथ जोड़ लेते हैं।
            लोग कहते हैं कि ईश्वर से डरो, मैं भी कहता हूँ कि मनुष्य को ईश्वर से डरना चाहिए किन्तु मेरा अभिप्राय यह नहीं है कि भय से ईश्वर मानो।  ईश्वर से डरने का मेरा अभिप्राय यह है कि कुछ ऐसा न करो जो ईश्वर को प्रिय नहीं है क्योंकि ऐसा कुछ करने पर वह रुष्ट हो जायेगा। बच्चे को प्यार करने वाले कोई भी माँ-बाप यह नहीं चाहते कि  उनका बच्चा ऐसा कुछ करे जिससे वह दंड का भागी बने। जब हम समझदार हो जाते हैं तब यह जानने का भी हमारा दायित्व हो जाता है कि हम जाने कि ईश्वर को क्या प्रिय है और क्या प्रिय नहीं है। कोई भी अपने प्रिय को रुष्ट नहीं करना चाहता। प्रिय को प्रसन्न रखने के लिए व्यक्ति सदैव ऐसा कार्य करता है जो प्रिय को प्रिय हों। प्रिय के सिद्धांतो को भी जीता है। ऐसे में ईश्वर से प्यार करने वाले को यह जानना जरूरी हो जाता है की ईश्वर हमसे क्या चाहता है, वह कैसे प्रसन्न होता है।
            बच्चा मासूम  होता है, उसकी गलतियां माफी योग्य होतीं हैं किन्तु वही गलतियां यदि युवा करे तब वह माफी योग्य नहीं रह जाता। उसी एक ईश्वर के अनेक चित्र बनाने वाला या तो कोई बच्चा हो सकता है या कोई चित्रकार। 
           चिंतन का विषय यह है कि क्या ईश्वर की अनेक स्वरूपों वाली मूर्तियां बनाने वाला शिल्पकार या अनेक चित्र बनाने वाला चित्रकार जहां ऐसे मूर्तिकार और शिल्पकार ईश्वर के सिद्धांतों की अवहेलना करते हों क्या ईश्वर उनसे प्रसन्न होगा।


           मेरा मानना है कि जब तक हम बच्चे हैं तब तक के लिए यह सब ठीक है किन्तु जब हम इस काबिल हो जाते हैं कि हम साश्वत मूल्यों को समझ सकते हैं तब चित्रो और मूर्तियों तक सीमित ईश्वर का ज्ञान पर्याप्त नहीं है। इस स्तर पर हमें अपने और ईश्वर के बारे चिंतन और मनन करना चाहिए।

Friday, January 27, 2017

ज्ञान का प्रकटीकरण


मित्रो !
सभी प्रकार के ज्ञान सभी पर प्रकट नहीं किये जा सकते। ज्ञान प्रदाता को ज्ञान के प्रकटीकरण से पूर्व ज्ञान पाने वाले की पात्रता पर विचार अवश्य करना चाहिए अन्यथा ज्ञान के दुरुपयोग अथवा प्राप्तकर्त्ता द्वारा ज्ञान के प्रयोग से उसका अहित होने की संभावना बनी रहती है।
किसी व्यक्ति के साथ गोपनीय प्रकृति की जानकारी साझा करते समय इस बात पर विचार किया जाना चाहिए कि जिस व्यक्ति के साथ जानकारी साझा की जा रही है वह विश्वासपात्र है अथवा नहीं। बच्चों के साथ व्यावहारिक जीवन की जानकारियां साझा करते समय उनकी आयु का भी ध्यान रखा जाना चाहिए।

Thursday, October 13, 2016

सर्वोच्च एकल ईश्वर : Supreme One God

मित्रो !
      ईश्वर का विस्तार ऐसा है जिसका न कोई प्रारम्भ है और न ही जिसका कोई अंत है अतः उसका वर्णन कर पाना मनुष्य की पहुँच से परे है। मेरा मानना है कि ईश्वर को मानने वाले लोग मोटे तौर पर ईश्वर के बारे में मानते हैं कि ईश्वर
1. इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड (cosmos) का रचयिता और नियंता है;
2. सर्वशक्तिमान, सर्वविद्यमान और सर्वज्ञानी है;
3. सर्वोच्च (Supreme) है, उसके समान या उससे बड़ा कोई दूसरा नहीं है।
     यदि ऊपर उल्लिखित गुणों वाले ईश्वर की कल्पना करें तब ईश्वर के ऊपर किसी अन्य ईश्वर या ईश्वर के समान्तर किसी दूसरे ईश्वर अथवा ईश्वर के नीचे उसके समतुल्य किसी ईश्वर के होने की कल्पना नहीं की जा सकती क्योंकि ऐसा होने पर ईश्वर सर्वोच्च नहीं रह जायेगा। ऐसी स्थिति में महत्वपूर्ण प्रश्न यह उठता है कि भिन्न-धर्मों में भिन्न-भिन्न ईश्वर अथवा एक ही धर्म में अलग-अलग लोंगों के अलग-अलग ईश्वर क्यों हैं।
      एक ऐसी विशालकाय पहाड़ी की कल्पना करते हैं जो किसी भी मनुष्य द्वारा अगम्य है और जिस पर प्रत्येक स्थान पर भिन्न-भिन्न प्रकार के फूल खिले हुए हैं। इसके तलहटी में इसके चारों ओर मनुष्य खड़े हैं जी पहाड़ी को देख रहे हैं। स्पष्ट है पहाड़ी की ओर देखने वाला कोई भी व्यक्ति पहाड़ी का सीमित क्षेत्र ही देख पायेगा, भिन्न-भिन्न व्यक्ति पहाड़ी पर अलग-अलग फूल होने की बात कहेंगे। अगर प्रत्येक व्यक्ति से कहा जाय कि वह पहाड़ी का चित्र बनाये तब प्रत्येक व्यक्ति उसने जो कुछ देखा है वैसा ही चित्र बनाएगा। किन्तु किसी भी व्यक्ति द्वारा बनाया गया चित्र पहाड़ी की प्रतिकृति (Replica) नहीं होगी क्योंकि पहाड़ी के बारे में उसका ज्ञान सीमित और अपूर्ण है। यही स्थिति ईश्वर की प्रतिकृति (Replica) बनाने वालों की है, उनके द्वारा ईश्वर के बनाये गए चित्र या मूर्तियां ईश्वर की प्रतिकृतियां नहीं है क्योंकि वे संपूर्ण ईश्वर का वर्णन नहीं करतीं। उनमें ईश्वर को देखने वाला उतना ही ईश्वर देखता है जितना वह ईश्वर के बारे में ज्ञान रखता है। 

     ईश्वर सर्वत्र व्याप्त होने के बाद भी अदृश्य है, उसका दर्शन केवल आस्थावान मनुष्यों द्वारा ज्ञान चक्षुओं (eyes) द्वारा ही किया जा सकता है। सर्वत्र व्याप्त होने के कारण उसे प्रतिकृति रखने या उसकी प्रतिकृति होने का कोई औचित्य या आवश्यकता नहीं है, प्रतिकृतोयों की रचना या कल्पना मनुष्य की अपनी की हुयी है। इन प्रतिकृतियों की रचना मनुष्य द्वारा ईश्वर में उसकी अपनी आस्था और ईश्वर के बारे में उसके अपने ज्ञान के आधार पर हुयी है। विभिन्न मनुष्यों और समाजों में ईश्वर में उनकी आस्था और ज्ञान में भिन्नता के कारण प्रतिकृतियों में असमानता और भिन्नता आ गयी है। 

Tuesday, September 13, 2016

ज्ञान का अनन्य स्त्रोत श्रीमद भगवद गीता : The Infinite Source of Knowledge, Shrimad Bhagvad Gita

मित्रो !

     जब आप सभी ओर से निराशा, हताशा, तनाव, चिंता, दुःख, भय, अज्ञान से घिरे हुए हों तब गीता का ज्ञान आपको इनसे छुटकारा दिलाता है। गीता में केवल जन्म-मृत्यु के बंधनों से छुटकारा दिलाने से सम्बंधित दिव्य ज्ञान ही नहीं अपितु इसमें साधारण मनुष्यों के व्यावहारिक जीवन में आने वाली कठिनाइयों और कष्टों  से छुटकारा दिलाने के लिए भी सम्पूर्ण ज्ञान उपलब्ध है।  
    
     सत्य और ज्ञान किसी भी धर्म से ऊपर उठकर होते हैं। किसी धर्म विशेष का अनुशरण करने वाले किसी परिवार में जन्मे व्यक्ति द्वारा दिया गया ज्ञान किसी अन्य धर्म के अनुयायी के लिए अज्ञान नहीं हो जाता और न ही किसी ज्ञान की महत्ता इस कारण से कम हो जाती है कि उसको देने वाला किसी दूसरे धर्म में अवतरित हुआ था। यदि सत्य इसके विपरीत रहा होता  तब अब तक हुयी वैज्ञानिक खोजों का लाभ सभी को सुलभ हो पाना संभव नहीं रहा होता। 

    Whenever you find yourself surrounded by disappointment, frustration, stress, anxiety, sorrow, fear, ignorance then the Gita can help you in restoring your self. The Gita not only has the highest category of knowledge for getting rid of bondage of birth and death, but it also has the the knowledge to relieve a common man of his sufferings and pains in his practical life.

     Truth and knowledge are independent of a religion. They are above all religions. Any knowledge, for a person following a particular religion, given by a person following another religion, does not become ignorance (agyaaan) nor importance of any knowledge diminishes because it was revealed by a person who was born in a family following any other religion. Had the truth been otherwise, then benefit of scientific researches could not have been available to people of all religions.


   

Friday, July 8, 2016

ज्ञान का खण्डन : Rebuttal of Knowledge

मित्रो !
ज्ञान एक सत्य होता है। जिस प्रकार किसी सत्य को नकारा नहीं जा सकता उसी प्रकार ज्ञान को भी झूठा नहीं ठहराया जा सकता। ज्ञान के नाम पर जो कुछ खण्डित किया जा सकता है वह या तो वह अज्ञान होता है या फिर वह अपूर्ण ज्ञान होता है। अनुभव से ज्ञान का सृजन संभव है किन्तु अनुभव से ज्ञान का खण्डन संभव नहीं है।


Thursday, February 18, 2016

जिन्दगी छोटी न करें : Do Not Shorten Your Life by Wasting or Killing Your Time


मित्रो !

        खाली वक़्त में समय-चक्र के थम जाने का भ्रम होता है, पर वास्तविकता यह है कि ऐसा कुछ भी नहीं है, खाली बैठने से केवल वक़्त ही बर्बाद नहीं होता, व्यक्ति जल्दी बूढ़ा हो जाता है और जिन्दगी भी छोटी हो जाती है। जीवन वही जो जिया जाय। 
        अगर कुछ भी करने को नहीं है तब कुछ ज्ञान - ध्यान की बातें या अभ्यास ही कर लें। यह भी हमारे काम की चीजें हैं। 


Saturday, September 5, 2015

मनुष्य सुख-दुःख का कारण स्वयं


मित्रो !

     मनुष्य को सर्व साधन संपन्न यह प्रकृति मिली है, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, मन रुपी अन्तः इन्द्रिय और मष्तिष्क मिले हैं। यह मनुष्य के विवेक पर निर्भर है कि वह संसाधनों का प्रयोग या उपभोग दुःख पाने के लिए करता है अथवा सुख पाने के लिए।
      मैं नहीं मानता कि यहाँ पर जो बात मैंने कही है उसमें कोई ऐसी बात है जिसे विज्ञान नहीं मानता। वैज्ञानिकों ने जो भी अविष्कार किये हैं या जिन वस्तुओं का निर्माण किया है उनके लिए संसाधन प्रकृति के अतिरिक्त क्या कहीं अन्यत्र से जुटाये गए हैं? इनको बनाने के लिए आवश्यक ज्ञान मानव ने स्वयं उसके अन्दर उपलब्ध मन, मष्तिष्क का प्रयोग कर अर्जित किया है।


Friday, June 12, 2015

ज्ञान क्या, अज्ञान क्या


मित्रो !
ज्ञान से अभिप्राय किसी वस्तु, विषय या प्रक्रिया के सम्बन्ध में सम्पूर्ण जानकारी से होता है। ज्ञान ही हमें कार्य करने की योग्यता तथा सही और गलत में विभेद करने की क्षमता प्रदान करता है। जिस प्रकार प्रकाश के अभाव में अँधेरा होता है उसी प्रकार ज्ञान के अभाव में अज्ञान होता है। जिस प्रकार अँधेरे को प्रकाश मिटा देता है उसी प्रकार अज्ञान को ज्ञान मिटा देता है।


Thursday, October 2, 2008

ऐसा भी एक दीप जले : Kindle a Lamp

बहें बयारें शान्ति ज्ञान की,
अन्धकार सब छंट जाए
फट जाय तिमिर की काली चादर,
जग प्रकाशमय हो जाए
मलयानिल से आए सुरभित सुगंध,
सौरभ जग में छा जाए
छलके स्नेह अमिय की गागर,
डगर प्यार की आ जाए

AISA BHI EK DEEP JALE

Bahein bayaarein shaanti gyaan ki,
Andhkaar sab chhant jaye.
Phat jaay timir ki kali chaadar,
Jag prakashmay ho jaye.
Malyanil se aaye surbhit sugandha,
Saurabh jaga mein chhaa jaye.
Chhalake sneh amiy ki gaagar,
Dagar pyaar ki aa jaye.

MEANINGS:
Bahein =blow; bayaarein = air; shaanti= peace; gyaan= knowledge; andhakaar=darkness; chhant=dispel; phat=torn; timir= darkness; kaali=black =chaadar=sheet; jag=world; prakaashmay =full of light; malayanil= air blowing from mountain malay; surbhit sugandh =smell full of fragrance; saurabh= polygrains of flowers; chha jaaye= spread; chhalake= spill or overthrow, running over of a liquid from a pot, an overthrow of a liquid in a pot; sneh= love, affection; amiya= nector; gaagar=pitcher; dagar= path, road; pyaar=love.