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Thursday, October 13, 2016

सर्वोच्च एकल ईश्वर : Supreme One God

मित्रो !
      ईश्वर का विस्तार ऐसा है जिसका न कोई प्रारम्भ है और न ही जिसका कोई अंत है अतः उसका वर्णन कर पाना मनुष्य की पहुँच से परे है। मेरा मानना है कि ईश्वर को मानने वाले लोग मोटे तौर पर ईश्वर के बारे में मानते हैं कि ईश्वर –
1. इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड (cosmos) का रचयिता और नियंता है;
2. सर्वशक्तिमान, सर्वविद्यमान और सर्वज्ञानी है;
3. सर्वोच्च (Supreme) है, उसके समान या उससे बड़ा कोई दूसरा नहीं है।
     यदि ऊपर उल्लिखित गुणों वाले ईश्वर की कल्पना करें तब ईश्वर के ऊपर किसी अन्य ईश्वर या ईश्वर के समान्तर किसी दूसरे ईश्वर अथवा ईश्वर के नीचे उसके समतुल्य किसी ईश्वर के होने की कल्पना नहीं की जा सकती क्योंकि ऐसा होने पर ईश्वर सर्वोच्च नहीं रह जायेगा। ऐसी स्थिति में महत्वपूर्ण प्रश्न यह उठता है कि भिन्न-धर्मों में भिन्न-भिन्न ईश्वर अथवा एक ही धर्म में अलग-अलग लोंगों के अलग-अलग ईश्वर क्यों हैं।
      एक ऐसी विशालकाय पहाड़ी की कल्पना करते हैं जो किसी भी मनुष्य द्वारा अगम्य है और जिस पर प्रत्येक स्थान पर भिन्न-भिन्न प्रकार के फूल खिले हुए हैं। इसके तलहटी में इसके चारों ओर मनुष्य खड़े हैं जी पहाड़ी को देख रहे हैं। स्पष्ट है पहाड़ी की ओर देखने वाला कोई भी व्यक्ति पहाड़ी का सीमित क्षेत्र ही देख पायेगा, भिन्न-भिन्न व्यक्ति पहाड़ी पर अलग-अलग फूल होने की बात कहेंगे। अगर प्रत्येक व्यक्ति से कहा जाय कि वह पहाड़ी का चित्र बनाये तब प्रत्येक व्यक्ति उसने जो कुछ देखा है वैसा ही चित्र बनाएगा। किन्तु किसी भी व्यक्ति द्वारा बनाया गया चित्र पहाड़ी की प्रतिकृति (Replica) नहीं होगी क्योंकि पहाड़ी के बारे में उसका ज्ञान सीमित और अपूर्ण है। यही स्थिति ईश्वर की प्रतिकृति (Replica) बनाने वालों की है, उनके द्वारा ईश्वर के बनाये गए चित्र या मूर्तियां ईश्वर की प्रतिकृतियां नहीं है क्योंकि वे संपूर्ण ईश्वर का वर्णन नहीं करतीं। उनमें ईश्वर को देखने वाला उतना ही ईश्वर देखता है जितना वह ईश्वर के बारे में ज्ञान रखता है। 

     ईश्वर सर्वत्र व्याप्त होने के बाद भी अदृश्य है, उसका दर्शन केवल आस्थावान मनुष्यों द्वारा ज्ञान चक्षुओं (eyes) द्वारा ही किया जा सकता है। सर्वत्र व्याप्त होने के कारण उसे प्रतिकृति रखने या उसकी प्रतिकृति होने का कोई औचित्य या आवश्यकता नहीं है, प्रतिकृतोयों की रचना या कल्पना मनुष्य की अपनी की हुयी है। इन प्रतिकृतियों की रचना मनुष्य द्वारा ईश्वर में उसकी अपनी आस्था और ईश्वर के बारे में उसके अपने ज्ञान के आधार पर हुयी है। विभिन्न मनुष्यों और समाजों में ईश्वर में उनकी आस्था और ज्ञान में भिन्नता के कारण प्रतिकृतियों में असमानता और भिन्नता आ गयी है। 

Tuesday, August 9, 2016

कितना एहसान फरामोश है आदमी : HOW UNGRATEFUL THE MAN IS

मित्रो !
        कितने अज्ञानी हैं हम। जब कोई हम पर कोई छोटा सा भी उपकार करता है तब हम उसका तो शुक्रिया अदा करते हैं किन्तु हम उस सर्वशक्तिमान का शुक्रिया अदा नहीं करते जिसने हमें सब-कुछ दिया है और जिसकी कृपा पर हम जिन्दा हैं। हमारी हर सांस जिसकी कृपा पर निर्भर है हम उसी को भुला बैठे हैं।

       How ignorant we are. When somebody does a small favor to us we thank him but we have forgotten to thank the almighty who has given us everything and on whose grace we are alive. We have forgotten Him on whose grace our every breath comes and goes.

Saturday, May 9, 2015

ईश्वर का अस्तित्व नकारना आत्मघाती : Denial of Existence of God is Fatal

मित्रो !
      जो लोग ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार करते हैं वे उसे सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान और सर्वज्ञ मानने के साथ-साथ वे उसको अपना माता और पिता भी मानते हैं। ईश्वर सर्वव्यापी और सर्वज्ञ होने से, ईश्वर को मानने वालों की मान्यता होती है कि वे जो कुछ भी सही या गलत कर रहे हैं ईश्वर उसको देख रहा है, वे जो कुछ सोच रहे हैं अर्थात उनके मन में जो कुछ है, उसे भी ईश्वर जानता है। ऐसी सोच के कारण उन्हें गलत न करने और सदमार्ग पर चलने की प्रेरणा मिलती है। वे निर्जन में भी अकेले होने का अनुभव नहीं करते क्योंकि ईश्वर सर्वव्यापी होने से निर्जन में भी उनके साथ होता है। फिर जब सर्वशक्तिमान मित्र के रूप में जिसके साथ हो उसके डरने का कोई कारण नहीं रह जाता।
      ईश्वर के अस्तित्व को मानने वाले के लिए उसके माता- पिता का उसके सिर से छाया उठ जाने पर भी ईश्वर रुपी माँ-वाप का छाया सदैव बना रहता है। अतः ईश्वर को मानने वाला कभी अनाथ नहीं हो सकता। ईश्वर निष्पक्ष है, सत्य उसे प्रिय है, वह दयालु है और अहिंसा उसे प्रिय हैं, वह काम, क्रोध, मद और लोभ से परे हैं। अतः ईश्वर को मानने वाले उसे प्रसन्न रखने के लिए दया, सत्य, अहिंसा और निष्पक्षता में विस्वास रखते हैं, काम, क्रोध, मद और लोभ को घृणित आचरण मान कर उसके करने से बचते हैं। 
     मेरा विचार है कि ईश्वर को न मानने से उपर्यक्त प्राप्तियां होना संभव नहीं है। विपरीत इसके ईश्वर को न मानने से अराजकता फैलेगी और भय और असुरक्षा की भावनाओं का राज होगा। इन्हीं परिस्थितयों में मेरे अन्दर निम्नलिखित विचार ने जन्म लिया और मैंने यह उपयुक्त समझा कि इसे आपके साथ साझा किया जाय :
    यदि ईश्वर का अस्तित्व स्वीकारने से हमारे अन्दर सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है, हम निडर बनते हैं, अनाथ होने पर भी सनाथ होने का अनुभव करते हैं, दया, सत्य, अहिंसा और निष्पक्षता जैसे दैवीय गुणों से प्रेम करते हैं तथा काम, क्रोध, मद और लोभ से घृणा करते हैं, तब किसी के द्वारा ईश्वर के अस्तित्व का नाकारा जाना उसका अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने जैसा है।




Wednesday, October 8, 2008

मेरी प्रार्थना

मैं अपनी प्रार्थना का विश्लेषण करने पर इसे तीन भागों में विभक्त कर पाता हूँ ।
भगवान में आस्था एवं विश्वास (स्तुति)
प्रार्थना के इस भाग के अंतर्गत हम सर्वशक्तिमान, सर्वविद्यमान और सर्वज्ञाता का अस्तित्व स्वीकारते हैं और उस के अनेकानेक गुणों का बखान करते हैं । उसको हम अपना अत्यन्त निकट हितैषी मानते हैं । उसे सभी लौकिक और अलौकिक बस्तुओं और सुखों का दाता मानते हैं । उसमें अपनी आस्था और विश्वास व्यक्त करते हैं ।
दोष-स्वीकृति और क्षमा याचना
प्रार्थना के इस भाग के अंतर्गत हम सर्वज्ञाता से हम से जाने और अनजाने में हुयी त्रुटियों और अपराधों के लिए क्षमा माँगते हैं । इससे हमारे विचार निर्मल होते हैं और भविष्य में गलतियाँ न करने की प्रेरणा मिलती है । हमें अनेकानेक मामलों में ग्लानि और पश्चात्ताप की पीड़ा से मुक्ति मिलती है। 
कल्याण की भावना
प्रार्थना के इस भाग के अंतर्गत हम सर्वशक्तिमान से अपने और जगत के समस्त प्राणियों के लिए सुख एवं समृद्धि प्रदान करने की कामना करते हैं । सभी को सद्मार्ग पर ले चलने की कामना करते हैं । 
मैं समझता हूँ की मेरी प्रार्थना अपने में पूर्ण है और इसमें कुछ जोड़ने अथवा इससे कुछ कम करने की आवश्यकता नहीं है । 
मैं नहीं जानता कि  आप किस धर्म और सम्प्रदाय के अनुयायी हैं मेरी जिज्ञासा है कि क्या आपकी प्रार्थना में भी यही तीन भाग हैं। यदि नहीं तब मैं अपनी प्रार्थना में क्या जोडूं या कम करूँ ताकि  प्रार्थना पूर्ण हो जाय। यदि आपकी प्रार्थना में भी यही तीन भाग हैं तब मेरी जिज्ञासा यह है कि  दो  विभिन्न  धर्मों के लोग एक समय में एक ही स्थान पर बैठकर प्रार्थना क्यों नहीं कर सकते। प्रश्न यह भी उठता है कि यदि एक पूर्ण प्रार्थना में उपरलिखित तीन भाग ही होते है, तब विभिन्न धर्मों के होते हुए भी सभी के लिए एक सर्वमान्य सारभौमिक प्रार्थना क्यों नहीं हो सकती ।
MY PRAYER
On analyzing my prayer, I can divide it into three parts:
(i) Expression of faith in the Almighty
In this first part of my prayer, I express my faith in the Supreme power. I remember Him in so many ways, sometimes in few words and sometimes in so many words. I feel that He is the infinite source of energy and is owner of benevolent powers. He gives his blessings to all and forgives me and all for all our sins. In Hindi, this part of my prayer may be called as “Stuti”.
(ii) Confession before the Almighty
In this second part of my prayer, I confess my sins those would have been committed knowingly or unknowingly. I feel that He knows all about my deeds। I surrender before Him and apologize for my wrong doings. I pray for His forgiveness। In Hindi, I may call it “Samarpan aur chhamayachna”.
(iii) Wish
In this last third part of my prayer, I wish that He should bestow all of us with happiness and prosperity. He should lead us kindly light. In Hindi we may call it “apani aur sabhi ke kalian ki bhawana”.
In my opinion, my prayer is complete and nothing is required to be added or deleted. I don’t know which concept of religion you follow, to which sect you belong, my quest is;Whether your prayer differs from my prayer? If it is so, then how I can make my prayer a complete PRAYER. If, your prayer is the same as the prayer of mine, then why we cannot exchange our prayers. If, you also believe in omnipresence of God, then why we cannot offer our prayers by sitting together at the same place. And my last quest is:Why there cannot be a universally acceptable prayer for all?