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Saturday, February 18, 2017

मंदिर जाने का महत्व : Importance of Temple Going

मित्रो !
          मेरा मानना है कि मन्दिर के निर्माण के बाद उसमें स्थापित मूर्ति की स्थापना पर मंदिर में और उसके समीप एक विशेष प्रकार की ऊर्जा भर जाती है। शहरी कोलाहल से दूर एकांत में साफ़-सुथरी जगह पर स्थित मंदिर में जाने से व्यक्ति के अंदर सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है, व्यक्ति ताजापन अनुभव करता है और व्यक्ति के अंदर आसुरी शक्तियां कमजोर पड़ जातीं है।
          मंदिर जाने पर आस्था बलबती होती है। अच्छे संस्कारो के प्रति विस्वास बढ़ता है। मेरा विचार है कि मंदिरों के पास लोगों आवास नहीं होने चाहिए। ऐसा होने पर मंदिर की सुचिता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है और मंदिर का ऊर्जा क्षेत्र घट जाता है।

         मंदिरों में किसी ख्वाहिश (wish, desire) को लेकर नहीं जाना चाहिए। ईश्वर सर्वव्यापी है, वह आपके विषय में सब कुछ जनता है और यह भी जनता है कि आपकी पात्रता क्या है। जिसके लिए आप पात्र हैं ईश्वर बिना मांगे ही देता है।

Tuesday, January 31, 2017

हमारा ईश्वर विषयक ज्ञान : Our Theological Knowledge

मित्रो !
          अधिकांश लोगों के सम्पूर्ण जीवन में ईश्वर को लेकर ज्ञान और क्रिया-कलाप एक जैसे रहते हैं। उन्हें बचपन में जो कुछ, यथा घर में स्थापित मंदिर या विभिन्न स्थानों पर विभिन्न मंदिरों में जाकर ईश्वर के चित्र या मूर्ति और वहां उपलब्ध अन्य देवी -देवताओं के चित्रों और मूर्तियों के आगे शीश झुकाना, उनकी चरण वंदना करना, प्रार्थना करना, दान करना आदि, सिखा दिया जाता हैं वे उसी के इर्द-गिर्द घूमते रहते हैं।
           बचपन में जो चित्र या मूर्तियां बच्चे देखते हैं, उनसे मिलती-जुलती मूर्ति या चित्र देखने पर वे उसे भगवान मानकर हाथ जोड़ लेते हैं। बचपन में उनसे यह भी कहा जाता है कि अगर वे भगवान के हाथ नहीं जोड़ेंगे अथवा उनके पैर नहीं छुएंगे तब भगवान नाराज हो जाएंगे। यह धारणा उनके अंदर घर कर जाती है। इसलिए उन्हें जहां-कहीं भी भगवान की मूर्ति या उसके स्वरूप से मिलती - जुलती किसी और की मूर्ति (भले ही वह चित्र या मूर्ति भगवान की न हो) दिखती है तब वे, भगवान को नाराज न करने के उद्देश्य से, उसे भगवान समझकर  हाथ जोड़ लेते हैं।
            लोग कहते हैं कि ईश्वर से डरो, मैं भी कहता हूँ कि मनुष्य को ईश्वर से डरना चाहिए किन्तु मेरा अभिप्राय यह नहीं है कि भय से ईश्वर मानो।  ईश्वर से डरने का मेरा अभिप्राय यह है कि कुछ ऐसा न करो जो ईश्वर को प्रिय नहीं है क्योंकि ऐसा कुछ करने पर वह रुष्ट हो जायेगा। बच्चे को प्यार करने वाले कोई भी माँ-बाप यह नहीं चाहते कि  उनका बच्चा ऐसा कुछ करे जिससे वह दंड का भागी बने। जब हम समझदार हो जाते हैं तब यह जानने का भी हमारा दायित्व हो जाता है कि हम जाने कि ईश्वर को क्या प्रिय है और क्या प्रिय नहीं है। कोई भी अपने प्रिय को रुष्ट नहीं करना चाहता। प्रिय को प्रसन्न रखने के लिए व्यक्ति सदैव ऐसा कार्य करता है जो प्रिय को प्रिय हों। प्रिय के सिद्धांतो को भी जीता है। ऐसे में ईश्वर से प्यार करने वाले को यह जानना जरूरी हो जाता है की ईश्वर हमसे क्या चाहता है, वह कैसे प्रसन्न होता है।
            बच्चा मासूम  होता है, उसकी गलतियां माफी योग्य होतीं हैं किन्तु वही गलतियां यदि युवा करे तब वह माफी योग्य नहीं रह जाता। उसी एक ईश्वर के अनेक चित्र बनाने वाला या तो कोई बच्चा हो सकता है या कोई चित्रकार। 
           चिंतन का विषय यह है कि क्या ईश्वर की अनेक स्वरूपों वाली मूर्तियां बनाने वाला शिल्पकार या अनेक चित्र बनाने वाला चित्रकार जहां ऐसे मूर्तिकार और शिल्पकार ईश्वर के सिद्धांतों की अवहेलना करते हों क्या ईश्वर उनसे प्रसन्न होगा।


           मेरा मानना है कि जब तक हम बच्चे हैं तब तक के लिए यह सब ठीक है किन्तु जब हम इस काबिल हो जाते हैं कि हम साश्वत मूल्यों को समझ सकते हैं तब चित्रो और मूर्तियों तक सीमित ईश्वर का ज्ञान पर्याप्त नहीं है। इस स्तर पर हमें अपने और ईश्वर के बारे चिंतन और मनन करना चाहिए।

Tuesday, January 3, 2017

HE IS OMNIPRESENT


मित्रो!
मैं नास्तिक हूँ किंतु इतना बड़ा नहीं कि राह में आए मंदिरों में भगवान् के अस्तित्व को नकार दूँ , साथ ही इतना बड़ा आस्तिक भी नहीं हूँ कि भगवान् को ढूढने के लिए मंदिरों की खोज में ही घूमा करुँ , क्यों कि मेरा अपना विश्वाश है कि भगवान् मंदिरों में ही नहीं मंदिरों में भी है क्यों कि वह सर्वविद्यमान है ।
OMNIPRESENCE OF GOD
I am an atheist but I cannot afford to deny existence of God in the temples* which fall on my way . At the same time, I am not so big a priest that I should run after temples in search of God . Because, temple is not the only place where God exists, but temple is also one of the places where God exists, because He is omnipresent.
Notes:
*Here temple word has been used to symbolize a worship place. How God, the Creator of whole universe can be confined within the four walls of a temple? He also cannot be thought of composed of many ….. Almighty is always with us. We can feel Him at any time and at any place. Temples may be thought necessary for reminding us about God like Ashoka Pillars (Stambh), but for offering our prayers, temple is not a necessity. A temple is not required to feel His presence.

Thursday, November 3, 2016

वह मंदिरों में ही नहीं मंदिरों में भी

मित्रो !
         जो यह जानता है कि ईश्वर सब जगह है उसे ईश्वर को याद करने के लिए मंदिर की जरूरत नहीं होती, वह मंदिर के बिना भी ईश्वर को याद कर लेता है। केवल मंदिर ही वह स्थान नहीं है जहां ईश्वर है, अपितु मंदिर उन स्थानों में से एक स्थान है जहां ईश्वर है क्योंकि ईश्वर सर्वविद्यमान (Omnipresent) है। इसीलिये मेरा मानना है कि -
       मैं नास्तिक हूँ किन्तु इतना बड़ा नहीं कि राह में आये मन्दिरों में ईश्वर को नकार दूँ, साथ ही इतना बड़ा आस्तिक भी नहीं हूँ कि मंदिरों की खोज में ही घूमा करूँ, क्योंकि मेरा अपना विश्वास है कि भगवान मंदिरों में ही नहीं, मंदिरों में भी है क्योंकि वह सर्वविद्यमान है।


Saturday, December 5, 2015

आरक्षित ईश्वर

मित्रो !

     कभी-कभी इस सोच में पड़ जाता हूँ कि अगर मेरा जन्म हिन्दू धर्म के अनुयायी किसी दलित परिवार में हुआ होता और जब मेरी कोई संतान किसी मंदिर के पास से गुजरने पर मंदिर में बैठे ईश्वर को देखने की जिद करती तब मैं उसे क्या कह कर बहलाता।

     क्या मैं यह कह देता कि यह तुम्हारा ईश्वर नहीं है या उससे अगले जन्म का इंतजार करने को कहता या शायद मैं यह भी सोचने को विवश हो जाता कि मैं कोई ऐसा धर्म अपना लूँ जिसमें ईश्वर के घर के दरवाजे बिना किसी भेदभाव के सभी के लिए खुले रहते हैं और जिसके अनुयायियों में ऊँच-नीच को लेकर इंसानों में भेदभाव नहीं होता।
    मंदिर की सुरक्षा, सफाई,  पवित्रता और शांति को बनाये रखने के उद्देश्य से किसी व्यक्ति को मंदिर में प्रवेश न देना उचित हो सकता है किन्तु स्त्री-पुरुष, अमीर-गरीब, धर्म और जाति के आधार पर भेद-भाव किया जाना पूर्णतः अनुचित है। ईश्वर केवल चयनित वर्ग के ही लोंगों का नहीं है, वह (ईश्वर) तो उन सब का है जो उसमें विश्वास करते हैं। 


Wednesday, July 8, 2015

ऊपर वाला तू ऊपर ही ठीक


मित्रो !
        ऊपर वाले का ऊपर रहना ही ठीक है। उसके ऊपर रहते नीचे वाले बिना किसी रोक-टोक अपनी फ़रियाद, जब जी चाहा, उससे कर लेते हैं बरना नीचे वालों ने तो उसके विश्राम के समय का सहारा लेकर मंदिरों के कपाट खुलने और बन्द होने का समय तो निश्चित किया ही, साथ ही यह फरमान भी सुना दिया है कि हर कोई दर्शन नहीं कर सकता।

        वह ईश्वर है जो अपनी संतानों में किसी प्रकार का भेद-भाव किये बिना उनकी पुकार, चाहे दिन हो रात, हर समय सुनता है और उनकी मदद भी करता है। किन्तु मनुष्य ने ईश्वर के विश्राम के समय का सहारा लेकर निश्चित समय में दर्शन पर पाबंदी लगा रखी है। कुछ वर्गों या व्यक्तियों के पूजा गृहों में जाने को भी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में प्रतिबंधित कर रखा है। यह कहाँ तक उचित है?