Peace, Co-existence, Universal Approach Towards Religion, Life, GOD, Prayer, Truth, Practical Life, etc.
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Monday, October 8, 2018
Friday, June 8, 2018
कानून बना देना ही पर्याप्त नहीं : LAW MAKING IS NOT SUFFICIENT
मित्रो !
काम (lust), क्रोध, मद
और लोभ (विशेष रूप से काम और क्रोध) का प्रभाव
इतना शक्तिशाली होता
है कि इनसे
आवेशित व्यक्ति कुछ और
सोच ही नहीं
सकता। इनके
आवेश में किये
गए अपराधों के
लिए मिलने वाले
दंड की ओर
उसका ध्यान ही
नहीं जाता। अतः इनके
आवेश में किये जाने वाले अपराधों को कानून बनाकर नहीं रोका जा सकता।
The urge of lust, anger, intoxication or
greed (especially lust and anger) is so powerful that the person charged by
them can not think of anything else. Persons, charged with these vices while
falling victim to them, remain unaware
of the penalties under the law for crimes to be committed by them. Therefore,
the crimes committed under the urge of lust, anger, intoxication or greediness
can not be stopped by making the law.
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पर्याप्त
Tuesday, February 13, 2018
Saturday, October 14, 2017
क्या आपने कभी सोचा है? : Have You Ever Thought?
मित्रो !
जब जब हम मन, बुद्धि और शरीर से किसी क्रिया को बार-बार करते हैं तब कुछ समय बाद हम उस क्रिया को करने के अभ्यस्त हो जाते हैं और उसके बाद उस क्रिया को करने के लिए हमें सोचना - विचारना नहीं पड़ता। विचारणीय यह है कि हम अपने व्यक्तित्व विकास के लिए ऐसा क्यों नहीं कर सकते ?
व्यक्तित्व के ऐसे कुछ क्षेत्र निम्नप्रकार हो सकते हैं
क्रोध पर नियंत्रण, सहनशीलता, मृदु भाषण, जरूरतमंदों की सहायता, अहिंसा, दया भाव, आपसी सहयोग, क्षमा, सदभावना, आभार, सत्य भाषण, समयनिष्ठा, ईमानदारी, स्वच्छता, पर्यावरण संरक्षण, आदि।
(जिस क्रम में क्षेत्र / गुण अंकित किये गए हैं, वे महत्ता प्रदर्शित नहीं करते।)
When
we do any act repeatedly applying our mind, intellect and body, we become
accustomed of doing it and thereafter, we can perform such act without much
thinking. The question is that why we do not apply this aspect for development
of our personality?
Few such aspects / fields of our personality may be as follows:
Few such aspects / fields of our personality may be as follows:
Control
over anger, Tolerance, Soft speech, Help to needy, Non-violence, Compassion,
Mutual co-operation, Forgiveness, Harmony, Gratitude, Truth, Punctuality,
Honesty, Cleanliness, Environment protection, etc. (Aspects mentioned here are
not in any specific order).
Friday, September 16, 2016
कर्म करने में ईश्वर का दखल नहीं : No Interference of God in Karm
मित्रो !
ईश्वर को मानने वाले अधिकांश व्यक्ति यह मानते हैं कि ईश्वर की मर्जी के बिना पत्ता भी नहीं हिल सकता। यदि इसे सही मान लें तब प्रश्न यह उठता है कि क्या हमारे पाप कर्म करने में ईश्वर की सहमति या मर्जी होती है? मेरे विचार से ऐसा मान लेना पूर्णतः गलत है।
ऐसा मान लेना तीन कारणों से उचित नहीं है, पहला यह कि पाप कर्म करने के लिए प्रेरित करने या सहमति देने वाला ईश्वर नहीं हो सकता, दूसरे यह कि मनुष्य अपनी प्रकृति से प्रेरित हुआ कर्म करता है और तीसरे यह कि मनुष्य कर्म करने और किये जाने वाले कर्म का चयन करने के लिए स्वतंत्र है।
श्रीमद भगवद गीता के अध्याय 3 (कर्मयोग) के श्लोक 5 का अर्थ यह है कि प्रत्येक व्यक्ति को प्रकृति से अर्जित गुणों के अनुसार विवश होकर कर्म करना पड़ता है, अतः कोई भी एक क्षण के लिए भी बिना कर्म किये नहीं रह सकता। इसी अध्याय के श्लोक 8 में भगवान श्री कृष्णा अर्जुन को बताते हैं कि तुम अपना नियत कर्म करो, क्योंकि कर्म न करने की अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है। कर्म के बिना तो शरीर का निर्वाह भी नहीं होता।
यहां पर यह समझ लेना उचित होगा कि गीता में संदर्भित प्रकृति क्या है। प्रयेक जीव को जन्म के समय प्रकृति प्राप्त होती है। यह प्रकृति तीन प्रकार के गुणों से बनी होती है, सतो गुण, रजो गुण और तमो गुण। मनुष्य का स्वभाव इन्हीं गुणों पर निर्भर करता है। मनुष्य अपनी प्रकृति से प्रेरित हुआ प्रकृति के अनुसार कर्म करता है।
अध्याय 3 के श्लोक 8 में "नियत कर्म" करने की बात कही गयी है। प्रश्न यह उत्पन्न होता है "किसके द्वारा नियत कर्म". इसका उत्तर भगवान श्री कृष्णा द्वारा इसी अध्याय के श्लोक 5, जिसका सन्दर्भ ऊपर दिया गया है, में यह कहते हुए दिया गया है कि प्रत्येक व्यक्ति को प्रकृति से अर्जित गुणों के अनुसार विवश होकर कर्म करना पड़ता है। इससे स्पष्ट होता है कि मनुष्य को कर्म करने की प्रेरणा उसकी अपनी प्रकृति से मिलती है उसे भगवान या कोई अन्य प्रेरित नहीं करते।
यहां पर मैं गीता के अध्याय 2 के श्लोक 47 का भी देना चाहूँगा। यह श्लोक निम्प्रकर है
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन |
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ||
निश्चय ही तुम्हें अपना कर्म करने का अधिकार है, किन्तु कर्म के फलों के तुम अधिकारी नहीं हो। तुम न तो कभी अपने आपको अपने कर्मों के फलों का कारण मानों, न ही कर्म न करने में कभी आसक्त होओ।
You have a right to perform your duties, but you are not entitled to the fruits of your actions. Never consider yourself to be the cause of the results of your activities, nor be attached to inaction.
इस श्लोक में कर्म करने का अधिकार मनुष्य के पास होने की बात कही गयी है। कर्म करने के अधिकार के अन्दर, कर्म करने, कर्म न करने, विशिष्ट प्रकार का कर्म करने अथवा विशिष्ट प्रकार का कर्म न करने का अधिकार समाहित होता है। अतः यह समझना चाहिए कि कर्म के चयन का अधिकार भी मनुष्य को प्राप्त है।
अध्याय 3
के
श्लोक 36 में अर्जुन ने भगवान् श्री कृष्णा से बहुत ही महत्वपूर्ण
प्रश्न (जो हम सब के मन में उठता है) निम्नप्रकार पूछा गया है।
अथ
केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुष: |
अनिच्छन्नपि
वार्ष्णेय बलादिव नियोजित:||
हे
वृष्णिवंशी ! मनुष्य न चाहते भी पाप कर्मों के लिए प्रेरित क्यों होता है?
ऐसा
लगता है कि उसे बलपूर्वक उसमें लगाया जा रहा है?
Why is a person impelled to commit sinful acts, even unwillingly, as if by
force, O descendant of Vrishni (Lord Krishna)?
इस प्रश्न का उत्तर
भगवान् श्री कृष्ण द्वारा अगले श्लोक 37 में निम्नप्रकार दिया
गया है:
काम
एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भव: ||
महाशनो
महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम् || 37||
हे
अर्जुन ! इसका कारण रजोगुण के संपर्क से उत्पन्न काम है,
जो
बाद में क्रोध का रूप धारण करता है और जो इस संसार का सर्वभक्षी पापी शत्रु है।
It is lust alone, which is born of contact with Rajogun, and later transformed
into anger. Know this as the sinful, all-devouring enemy in the world.
यहाँ
पर पाप कर्म करवाने के लिए रजोगुण का संपर्क उत्तरदायी बताया गया है,
जो
मनुष्य की प्रकृति के कारण उत्पन्न होता है।
उपर्युक्त
विवेचन से स्पष्ट है कि ईश्वर किसी व्यक्ति से कोई कर्म नहीं करवाता,
मनुष्य
स्वयं निर्णय लेकर अपनी प्रकृति से प्रेरित हुआ अच्छा या बुरा कर्म करता है।
सुलभ सन्दर्भ हेतु ऊपर संदर्भित श्लोकों का मूल पथ नीचे दिया जा
रहा है।
अध्याय
3 श्लोक 5
न
हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् |
कार्यते
ह्यवश: कर्म सर्व: प्रकृतिजैर्गुणै: || 5||
There is no one who can remain without action even for a moment. Indeed, all
beings are compelled to act by their qualities born of the nature. (the nature
consists of three guṇas).
अध्याय
3 श्लोक 8
नियतं
कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मण: |
शरीरयात्रापि
च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मण: || 8||
You should thus perform your prescribed duties, since action is superior to
inaction. By ceasing activity, even your bodily maintenance will not be
possible.
ओइम
नमो भगवते वासुदेवाय।
Thursday, August 11, 2016
Friday, March 27, 2015
Sunday, November 2, 2014
क्रोध विनाशक संकल्पित मुद्रिका : Anger Destroyer Conceptual Ring
मैंने पूर्व में एक आर्टिकल "विनाशकारी क्रोध" शीर्षक से पोस्ट किया था और सुझाव दिया था कि जिस समय किसी व्यक्ति को क्रोध आता है उसी समय अगर उसका ध्यान किसी अन्य वस्तु, विचार, दृश्य आदि की ओर मोड़ा जा सके तब उसका क्रोध शान्त हो सकता है । किन्तु यह तथ्य भी विचारणीय हैं कि व्यक्ति अकेला होने पर क्रोध के आवेश में आ सकता है और कुछ भी गलत करने का निर्णय ले सकता है। अगर किसी व्यक्ति के क्रोधित होने के समय अन्य व्यक्ति पास में हैं भी तब यह समस्या हो सकती है ऐसे व्यक्तियों को यह मालूम ही न हो कि जिस विषय या वस्तु को लेकर व्यक्ति क्रोधित हो रहा है उससे उसका ध्यान हटा दिया जाय अथवा यह भी हो सकता है कि उपस्थित व्यक्तियों में से किसी में भी क्रोधित हो रहे व्यक्ति से कुछ कह सकने का साहस न हो। ऐसा भी हो सकता है कि क्रोधित हो रहा व्यक्ति किसी की वात सुने ही नहीं। ऐसे में एक यही विकल्प बचता है कि क्रोध आने के समय क्रोध से ग्रसित होने वाले व्यक्ति के पास कोई वस्तु ऐसी होनी चाहिए जो उसे याद दिलाये कि उसे क्रोध नहीं करना है। क्रोध विनाशकारी है। साथ ही ऐसी वस्तु क्रोधित होने जा रहे व्यक्ति की सोच किसी अन्य विचार या वस्तु पर केंद्रित कर दे।
मित्रो ! मेरा जन्म एक गाँव में हुआ है और मेरा बचपन गाँव में ही गुजरा है। मैंने बचपन में देखा है कि घरेलू कामकाजी अधेड़ उम्र और उम्रदराज अनेक महिलाएं किसी विशेष बात या कार्य को याद रखने के लिए अपनी साड़ी / धोती के एक छोर पर एक गाँठ बाँध लेतीं थी। यह गाँठ सदैव उनके साथ होती थी तथा जब तक खोली न जाय यह याद दिलाती रहती थी कि उन्हें अमुक काम करना है। अगर कार्य याद नहीं रहता था तब वह गाँठ देखकर अपनी याददास्त से पता करतीं थीं कि उन्होंने यह गाँठ किस लिए लगाई थी। मेरा विचार है कि प्रथा का उपयोग हम क्रोध नियंत्रण के लिए भी कर सकते हैं। पर आज पहले तो हम शरीर पर ऐसा वस्त्र धारण नहीं करते जिसमें गाँठ लगाई जा सके दूसरे अगर हम में से कोई ऐसा वस्त्र पहनते भी हैं तब ऐसे लोग गाँठ लगाना उपयुक्त नहीं पायेंगे। अगर गाँठ बाँध भी लें तब हम अनेक लोगों को इसका उद्देश्य बताने और समझाने में कठिनाई महसूस करेंगे। हमें ऐसा एक प्रतीक चाहिए जो हमारे संकल्प को याद दिलाता रहे, सदैव हमारे साथ रहे, इसके धारण करने से हमें अरुचि न हो और प्रतीक सामान्य लगे। यद्यपि हम क्रोध न करने का संकल्प ले सकते हैं किन्तु संभव है कि क्रोध आने के समय हमें संकल्प याद ही न रहे। ऐसी स्थिति में कोई वाह्य वस्तु या प्रतीक ही उपयुक्त हो सकता है।
आजकल अनेक व्यक्ति अपनी उँगलियों में मुद्रिकाएं (Rings) पहनते है। किसी व्यक्ति को मुद्रिका पहने देखने पर कुछ भी असामान्य नहीं लगता है। कुछ लोग इन्हें आभूषण के रूप में धारण करते हैं, वहीं कुछ लोग ग्रहों के बुरे प्रभाव को कम करने के उद्देश्य से धारण करते हैं। कुछ लोग मुद्रिका को ring ceremony के अवसर पर धारण करते हैं। ऐसी मुद्रिका पर नज़र पड़ने पर ऐसे व्यक्ति के मन मष्तिष्क में रिंग सेरेमनी की याद ताज़ा हो जाती है। मुद्रिका का धारण करना सभ्य समाज में भी अशोभनीय नहीं माना जाता है। मेरा विचार है कि मुद्रिका का उपयोग प्रतीक के रूप में क्रोध पर नियंत्रण पाने में भी कर सकते हैं। हम जानते हैं कि कलाकार द्वारा निर्मित भगवान या किसी देवी-देवता की मूर्ति में श्रद्धा तब तक उत्पन्न नहीं होती जब तक उसमें विश्वास व्यक्त कर उसकी प्राण प्रतिष्ठा न की जाय। इसी प्रकार जब तक हम मुद्रा में संकल्प रुपी प्राण प्रतिष्ठा नहीं करेंगे तब तक वह एक सामान्य मुद्रा ही रहेगी। मुद्रिका धारण करने से पूर्व इसका सशक्तिकरण आवश्यक है ताकि क्रोध भावना के प्रकट होने से पूर्व ही हम इसके आगे आत्मसमर्पण कर सकें।
इसके लिए बायें हाथ की तर्जनी उंगली में पहनने के लिए (अगर आप तर्जनी उंगली में पूर्व से ही कोई मुद्रिका धारण कर रहे हैं तब किसी अन्य उंगली के नाप की) अपनी पसंद की मुद्रिका ले सकते हैं। मुद्रिका देखने में रुचिकर लगे किन्तु ऐसी न हो जिसके सामने आपके विचारों का कोई महत्व ही न रह जाय। इसको धारण करने से पूर्व यदि आप ईश्वर में विश्वास रखते हैं तब पवित्र मन से ईश्वर का स्मरण करें, यदि ईश्वर में विश्वास नहीं करते हैं तब ऐसे व्यक्ति या देवी-देवता जिसमें आपकी अटूट श्रद्धा और विश्वास है अथवा जिससे आप अटूट प्रेम करते हैं, का स्मरण करें और संकल्प लें कि आप कभी भी क्रोध नहीं करेंगे। अगर क्रोध का भाव कभी उत्पन्न होगा तब यह मुद्रिका आपको आपके संकल्प का स्मरण कराएगी और आप इसके दर्शन को अपने इष्ट का आदेश मान कर क्रोध का त्याग कर देंगे। इसके उपरांत आप मुद्रिका को धारण कर सकते हैं।
अपने विश्वास को दृढ़ करने के लिए आप जिस समय भी मुद्रिका उंगली से निकालें या धारण करें अपने द्वारा किये गये संकल्प को याद करें। आप अपने परिवारीय सदस्यों, मित्रों और संपर्क में आने वाले व्यक्तियों के मध्य गर्व से बतायें कि आपने क्रोध करना छोड़ दिया है। इससे क्रोध पर नियंत्रण पाने के लिए आपको आत्मबल मिलेगा। जब कभी भी आप महसूस करें कि आपको क्रोध आ रहा है आप दायें हाथ की उँगलियों से मुद्रिका पकड़ कर उंगली में घुमाने लगें और अपने इष्ट और संकल्प को याद करें। आपका ध्यान क्रोध से हट जायेगा, क्रोध के क्षण निकल जायेंगे। अगर किसी अवसर पर आप सफल नहीं होते तब क्रोधित होने के लिए पश्चात्ताप करें। जिस व्यक्ति पर क्रोधित होकर उसका दिल दुखाया है उसके सामने अपने कृत्य के लिए खेद (sorry) व्यक्त करें । मेरा विश्वास है कि इससे आपको क्रोध पर नियंत्रण पाने में अवश्य ही सफलता मिलेगी।
Monday, October 27, 2014
विनाशकारी क्रोध Anger : The Destroyer
क्रोध एक मानसिक विकार है। क्रोधित व्यक्ति की अन्य कुछ भी सोचने की क्षमता समाप्त हो जाती है। क्रोधित अवस्था में व्यक्ति जो कुछ कर रहा होता है उसके परिणामों को सोच पाने में असमर्थ होता है। क्रोध में वह ऐसे गंभीर अपराध भी कर सकता है जिससे उसका भरा-पूरा हँसता-खेलता परिवार भी उजड़ सकता है, उसके बच्चे अनाथ हो सकते हैं। स्वयं के अपराधी होने से उसे सजा भी हो सकती है जिसके परिवारीय सदस्यों को भयानक परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। उसका व्यापर या रोजगार समाप्त हो जाता है और इस सबसे अलग उसे और उसके परिवार के सदस्यों को समाज का तिरस्कार भी सहन करना पड़ता है।
बच्चों पर माता-पिता के क्रोध के भयंकर परिणाम होते हैं। बच्चों के अन्दर डर बैठ जाता है, क्रोध करने वाले माँ या वाप के प्रति बच्चों के अन्दर घृणा का भाव घर कर जाता है। उनका अध्ययन और अन्य कार्यों में जी नहीं लगता। अपनी आवश्यकताओं को भी माँ - वाप को बताने से कतराने लगते हैं। इन सब का प्रभाव यह होता है कि बच्चे का जीवन बर्वाद हो जाता है। इस सब के लिए माँ-वाप का क्रोध जिम्मेदार होता है। बच्चों के सामने अगर पति अपनी पत्नी पर भी क्रोध करता है तब भी बच्चों पर यही प्रभाव पड़ते हैं।
मित्रो ! जब मैं किसी व्यक्ति को क्रोधित होते देखता हूँ तब मैं बहुत ही दुःखी और भयभीत हो जाता हूँ। मेरा मानना है कि क्रोध मानवता के लिए बहुत बड़ा श्राप है। इसका निदान खोजा जाना अत्यंत आवश्यक है। मेरे द्वारा फेसबुक पर पब्लिश किये गए आर्टिकल्स "Cause of Our Anger", "Where Battle is Won by Quitting the Battlefield" और "क्रोध पर नियंत्रण (बात पते की -१२)" क्रोध के प्रति मेरी भड़ास की ही उपज हैं। गत कुछ समय से मैं प्रयासरत हूँ कि कुछ ऐसा आपके सामने ला सकूँ जो स्वयं के क्रोध पर नियंत्रण पाने में सहायक हो सके। किन्तु अब तक कुछ ठोस तलाश नहीं कर पाया हूँ। इतना अवश्य समझ पाया हूँ कि प्रथम प्रयास यह होना चाहिए कि क्रोध आये ही नहीं, फिर भी अगर कभी क्रोध आता है तब कुछ ऐसा होना चाहिए जो हमारे अन्दर यह सोच पैदा कर सके कि हमें क्रोध नहीं करना है। ऐसा कुछ हो जो रेड कार्ड (Red Card) सावित हो सके।
मेरा मानना है कि मेरे अधिकाँश मित्रो को क्रोध नहीं आता होगा। ऐसे मित्रों को मैं प्रणाम करता हूँ। किन्तु क्रोध के लिए कोई अवस्था निश्चित नहीं है। मैं अपने उन मित्रो जो कभी-कभी क्रोध के शिकार हो जाते हैं से अनुरोध करना चाहूँगा कि वे क्रोध से छुटकारा पाने के लिए एक संकल्प लें कि उन्हें क्रोध से बचना है। संकल्प का अपनी दैनिक प्रार्थना में स्मरण करें। कोई चिन्ह रेड कार्ड के रूप में अपने साथ रखें जो उन्हें याद दिलाता रहे की उन्हें क्रोध नहीं करना है। प्रत्येक दिन सोने से पहले यह विचार करें कि क्या वे उस दिन क्रोध के शिकार हुए हैं? यदि हाँ, तब अपनी गलती मानकर इस पर शर्मिंदा हों। जिस व्यक्ति पर हम क्रोध करते हैं वह आहत होता है। हमें समय पाकर उससे Sorry कहकर अपनी गलती स्वीकार करनी चाहिए। इससे रिश्ते पुनः निर्मल और नार्मल हो जाएंगे और आपके संकल्प को भी बल मिलेगा।
जिन मित्रों को क्रोध नहीं आता, उनसे मेरा निवेदन है कि ऐसे लोगों की सहायता करें जिन्हें क्रोध आता है ताकि ऐसे लोग क्रोध विकार से छुटकारा पा सकें। उनके द्वारा मानवता की यह बहुत बड़ी सेवा होगी। ऐसे मित्रों का मैं जीवन भर आभारी रहूँगा।
जिन मित्रों को क्रोध नहीं आता, उनसे मेरा निवेदन है कि ऐसे लोगों की सहायता करें जिन्हें क्रोध आता है ताकि ऐसे लोग क्रोध विकार से छुटकारा पा सकें। उनके द्वारा मानवता की यह बहुत बड़ी सेवा होगी। ऐसे मित्रों का मैं जीवन भर आभारी रहूँगा।
साभार।
केशव दयाल।
केशव दयाल।
***
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Saturday, September 1, 2012
CAUSE OF ANGER
Friends !
Before we analyze causes of anger, it seems logical to know about it. Anger is the general term for a sudden violent displeasure. Fury, indignation and rage may be thought close to anger. Rage is vehement anger. Indignation implies deep and justified anger, for example: indignation at cruelty or against corruption. Fury is rage so great that it resembles insanity. Anger causes resentment, exasperation, irritation, displeasure, infuriation, insanity and madness. A person in anger loses his thinking power and a person devoid of thinking power can go to any extent. Any right or wrong thing or act can be expected from him. Therefore, it is absolutely necessary to have control over anger.
On analyzing the behavior of human beings, we can classify human behaviors in following three broad categories:
(i) Persons who live balanced and peaceful life. These persons are knowledgeable persons. They are kind to all creatures. They are harmless creatures and are free from all types of vices. They have conquered their desires. They live ascetic life.
(ii) Persons who are ambitious and have lot of expectations and strong desires. They are always worried for results in their favor. They have strong feeling of attachment for their own. They are lustful, passionate and impulsive.
(iii) Persons who are lazy, who look (or behave like) mad and who have no control over their sleep. They are bullheaded. They believe in phantasm, delusion and illusion. Their acts suffer lack of knowledge.
We can assign each class a name. In holy Geeta, while addressing Arjun, Lord Krishna has referred to these classes of properties as Sato Gun, Rajo Gun and Tamo Gun. These properties have been referred to as properties of nature. At any moment, a person reflects properties of one of these classes in his acts. Properties of nature referred to in clause (i) above may be referred to as divine features. Properties of nature referred to in clause (iii) above may be referred to as devilish features. Properties referred to in clause (ii) above lie in between them.
At any moment in our life, we live one of three properties of nature, viz. sato gun, rajo gun and tamo gun (sat, raj & tam). We all know that particular type of behavior of a person is not permanent and everlasting. A person, who, at certain point of time, has been living tamo properties of nature, may behave as if he owns sato properties. Likewise, a person, who, at certain point of time, has been living rajo properties of nature, may behave as if he owns tamo properties. Sometimes, change in behavior is permanent. Person, who has been living properties of one class for a long time, can change his behavior for remaining span of his life. We have read story of Angulimala, the robber and murderer who later became a saint. We also know that Maharshi Valmiki, in his early period of life, had been a robber but in his latter life he became a great saint who composed the pious book Ramayana.
Feeling of anger is associated with Rajo gun. Person who cultivates sato property of nature has depth in his nature. Such person never gets excited. On analyzing the behavior of human beings, we find that anger arises on account of one of the following:
(i) A person has done something which we had not expected from him; or
(ii) A person has failed to perform any act as per our expectation.
Looking into the causes of anger, we can say that our expectations are sole cause of our anger. This feature is associated with rajo gun. In order to get rid of anger, we have to adopt sato gun. Person owning sato gun lives a balanced life. He has depth in his nature. He has no expectations. But in our modern life it is hard to believe that one can do without expectations. When we set our targets or goals and fail to achieve them, then what we feel is not anger. It is desperation. In this case we do not get excited. We do not lose our temper. But where we expect something from our others and they fail to deliver the desired result we get excited with anger. But we can avoid anger if we are kindhearted and we believe in forgiving. There may be cases where one may feel that his associate has done wrong deliberately. In such cases, it may be difficult but it is not impossible to avoid anger.
Suppose that your close associate does not follow your directions in performing a particular act but he / she acts on his / her own and by doing so spoils the wrath. This may be a reason of anger. But this can also be avoided by considering his / her ignorance. At one place, he / she does not know that he / she is expected to obey you and at the same time he / she does not know the proper way of performing the act. On account of his / her ignorance, he /she deserves sympathy. He / she must be forgiven.
Mahatma Gandhi has rightly said “Hate the sin not the sinner”. It is also believed that “Love the sinner, hate the sin” is a saying from holy Bible. Readers will forgive me if I am wrong. I am totally in favor of the saying “hate the sin not the sinner”. My view is that sinner commits wrong because he / she is ignorant about the sin. Sinner does not understand that it is wrong to commit a sin. He / she does not know that he / she should abstain from committing a sin. Therefore, he / she deserves sympathy. In stead of showing our anger, we should feel pity on him /her.
Unfair assessment of capabilities of our associate may be another cause of anger. Sometimes, we do not assess the capability of a person and expect him to do a certain act. If performance requires A grade knowledge but the performer possesses B grade (lower than A grade) knowledge, then we should not expect that performer will do the act properly. Similarly, an act done by a child should not be evaluated by comparing it with the act performed by a young person. We should give margin for short experience and lack of knowledge. If we expect then we should expect and we should assess the result considering these aspects.
Lack of our tolerance limit may be another cause for anger. In order to avoid anger, we should -
(i) avoid expectations and if those cannot be avoided then they should be based on fair assessment of capabilities of the person from whom we expect;
(ii) enlarge our tolerance limit;
(iii) cultivate habit of forgiveness.
We are human being and we have been blessed with enormous power to fight evils. Lord will not forgive us if we do not use these powers in improving our nature.
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