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Sunday, November 2, 2014

क्रोध विनाशक संकल्पित मुद्रिका : Anger Destroyer Conceptual Ring

      मैंने पूर्व में एक आर्टिकल "विनाशकारी क्रोध" शीर्षक से पोस्ट किया था और सुझाव दिया था कि जिस समय किसी व्यक्ति को क्रोध आता है उसी समय अगर उसका ध्यान किसी अन्य वस्तु, विचार, दृश्य आदि की ओर मोड़ा जा सके तब उसका क्रोध शान्त हो सकता है । किन्तु यह तथ्य भी विचारणीय हैं कि व्यक्ति अकेला होने पर क्रोध के आवेश में आ सकता है और कुछ भी गलत करने का निर्णय ले सकता है। अगर किसी व्यक्ति के क्रोधित होने के समय अन्य व्यक्ति पास में हैं भी तब यह समस्या हो सकती है ऐसे व्यक्तियों को यह मालूम ही न हो कि जिस विषय या वस्तु को लेकर व्यक्ति क्रोधित हो रहा है उससे उसका ध्यान हटा दिया जाय अथवा यह भी हो सकता है कि उपस्थित व्यक्तियों में से किसी में भी क्रोधित हो रहे व्यक्ति से कुछ कह सकने का साहस न हो। ऐसा भी हो सकता है कि क्रोधित हो रहा व्यक्ति किसी की वात सुने ही नहीं। ऐसे में एक यही विकल्प बचता है कि क्रोध आने के समय क्रोध से ग्रसित होने वाले व्यक्ति के पास कोई वस्तु ऐसी होनी चाहिए जो उसे याद दिलाये कि उसे क्रोध नहीं करना है। क्रोध विनाशकारी है। साथ ही ऐसी वस्तु क्रोधित होने जा रहे व्यक्ति की सोच किसी अन्य विचार या वस्तु पर केंद्रित कर दे।
      मित्रो ! मेरा जन्म एक गाँव में हुआ है और मेरा बचपन गाँव में ही गुजरा है। मैंने बचपन में देखा है कि घरेलू कामकाजी अधेड़ उम्र और उम्रदराज अनेक महिलाएं किसी विशेष बात या कार्य को याद रखने के लिए अपनी साड़ी / धोती के एक छोर पर एक गाँठ बाँध लेतीं थी। यह गाँठ सदैव उनके साथ होती थी तथा जब तक खोली न जाय यह याद दिलाती रहती थी कि उन्हें अमुक काम करना है। अगर कार्य याद नहीं रहता था तब वह गाँठ देखकर अपनी याददास्त से पता करतीं थीं कि उन्होंने यह गाँठ किस लिए लगाई थी। मेरा विचार है कि प्रथा का उपयोग हम क्रोध नियंत्रण के लिए भी कर सकते हैं। पर आज पहले तो हम शरीर पर ऐसा वस्त्र धारण नहीं करते जिसमें गाँठ लगाई जा सके दूसरे अगर हम में से कोई ऐसा वस्त्र पहनते भी हैं तब ऐसे लोग गाँठ लगाना उपयुक्त नहीं पायेंगे। अगर गाँठ बाँध भी लें तब हम अनेक लोगों को इसका उद्देश्य बताने और समझाने में कठिनाई महसूस करेंगे। हमें ऐसा एक प्रतीक चाहिए जो हमारे संकल्प को याद दिलाता रहे, सदैव हमारे साथ रहे, इसके धारण करने से हमें अरुचि न हो और प्रतीक सामान्य लगे। यद्यपि हम क्रोध न करने का संकल्प ले सकते हैं किन्तु संभव है कि क्रोध आने के समय हमें संकल्प याद ही न रहे। ऐसी स्थिति में कोई वाह्य वस्तु या प्रतीक ही उपयुक्त हो सकता है।
      आजकल अनेक व्यक्ति अपनी उँगलियों में मुद्रिकाएं (Rings) पहनते है। किसी व्यक्ति को मुद्रिका पहने देखने पर कुछ भी असामान्य नहीं लगता है। कुछ लोग इन्हें आभूषण के रूप में धारण करते हैं, वहीं कुछ लोग ग्रहों के बुरे प्रभाव को कम करने के उद्देश्य से धारण करते हैं। कुछ लोग मुद्रिका को ring ceremony के अवसर पर धारण करते हैं। ऐसी मुद्रिका पर नज़र पड़ने पर ऐसे व्यक्ति के मन मष्तिष्क में रिंग सेरेमनी की याद ताज़ा हो जाती है। मुद्रिका का धारण करना सभ्य समाज में भी अशोभनीय नहीं माना जाता है। मेरा विचार है कि मुद्रिका का उपयोग प्रतीक के रूप में क्रोध पर नियंत्रण पाने में भी कर सकते हैं। हम जानते हैं कि कलाकार द्वारा निर्मित भगवान या किसी देवी-देवता की मूर्ति में श्रद्धा तब तक उत्पन्न नहीं होती जब तक उसमें विश्वास व्यक्त कर उसकी प्राण प्रतिष्ठा न की जाय। इसी प्रकार जब तक हम मुद्रा में संकल्प रुपी प्राण प्रतिष्ठा नहीं करेंगे तब तक वह एक सामान्य मुद्रा ही रहेगी। मुद्रिका धारण करने से पूर्व इसका सशक्तिकरण आवश्यक है ताकि क्रोध भावना के प्रकट होने से पूर्व ही हम इसके आगे आत्मसमर्पण कर सकें।
      इसके लिए बायें हाथ की तर्जनी उंगली में पहनने के लिए (अगर आप तर्जनी उंगली में पूर्व से ही कोई मुद्रिका धारण कर रहे हैं तब किसी अन्य उंगली के नाप की) अपनी पसंद की मुद्रिका ले सकते हैं। मुद्रिका देखने में रुचिकर लगे किन्तु ऐसी न हो जिसके सामने आपके विचारों का कोई महत्व ही न रह जाय। इसको धारण करने से पूर्व यदि आप ईश्वर में विश्वास रखते हैं तब पवित्र मन से ईश्वर का स्मरण करें, यदि ईश्वर में विश्वास नहीं करते हैं तब ऐसे व्यक्ति या देवी-देवता जिसमें आपकी अटूट श्रद्धा और विश्वास है अथवा जिससे आप अटूट प्रेम करते हैं, का स्मरण करें और संकल्प लें कि आप कभी भी क्रोध नहीं करेंगे। अगर क्रोध का भाव कभी उत्पन्न होगा तब यह मुद्रिका आपको आपके संकल्प का स्मरण कराएगी और आप इसके दर्शन को अपने इष्ट का आदेश मान कर क्रोध का त्याग कर देंगे। इसके उपरांत आप मुद्रिका को धारण कर सकते हैं।
      अपने विश्वास को दृढ़ करने के लिए आप जिस समय भी मुद्रिका उंगली से निकालें या धारण करें अपने द्वारा किये गये संकल्प को याद करें। आप अपने परिवारीय सदस्यों, मित्रों और संपर्क में आने वाले व्यक्तियों के मध्य गर्व से बतायें कि आपने क्रोध करना छोड़ दिया है। इससे क्रोध पर नियंत्रण पाने के लिए आपको आत्मबल मिलेगा। जब कभी भी आप महसूस करें कि आपको क्रोध आ रहा है आप दायें हाथ की उँगलियों से मुद्रिका पकड़ कर उंगली में घुमाने लगें और अपने इष्ट और संकल्प को याद करें। आपका ध्यान क्रोध से हट जायेगा, क्रोध के क्षण निकल जायेंगे। अगर किसी अवसर पर आप सफल नहीं होते तब क्रोधित होने के लिए पश्चात्ताप करें। जिस व्यक्ति पर क्रोधित होकर उसका दिल दुखाया है उसके सामने अपने कृत्य के लिए खेद (sorry) व्यक्त करें । मेरा विश्वास है कि इससे आपको क्रोध पर नियंत्रण पाने में अवश्य ही सफलता मिलेगी।

Monday, October 27, 2014

विनाशकारी क्रोध Anger : The Destroyer

      क्रोध एक मानसिक विकार है। क्रोधित व्यक्ति की अन्य कुछ भी सोचने की क्षमता समाप्त हो जाती है। क्रोधित अवस्था में व्यक्ति जो कुछ कर रहा होता है उसके परिणामों को सोच पाने में असमर्थ होता है। क्रोध में वह ऐसे गंभीर अपराध भी कर सकता है जिससे उसका भरा-पूरा हँसता-खेलता परिवार भी उजड़ सकता है, उसके बच्चे अनाथ हो सकते हैं। स्वयं के अपराधी होने से उसे सजा भी हो सकती है जिसके परिवारीय सदस्यों को भयानक परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। उसका व्यापर या रोजगार समाप्त हो जाता है और इस सबसे अलग उसे और उसके परिवार के सदस्यों को समाज का तिरस्कार भी सहन करना पड़ता है।
      बच्चों पर माता-पिता के क्रोध के भयंकर परिणाम होते हैं। बच्चों के अन्दर डर बैठ जाता है, क्रोध करने वाले माँ या वाप के प्रति बच्चों के अन्दर घृणा का भाव घर कर जाता है। उनका अध्ययन और अन्य कार्यों में जी नहीं लगता। अपनी आवश्यकताओं को भी माँ - वाप को बताने से कतराने लगते हैं। इन सब का प्रभाव यह होता है कि बच्चे का जीवन बर्वाद हो जाता है। इस सब के लिए माँ-वाप का क्रोध जिम्मेदार होता है। बच्चों के सामने अगर पति अपनी पत्नी पर भी क्रोध करता है तब भी बच्चों पर यही प्रभाव पड़ते हैं।
      मित्रो ! जब मैं किसी व्यक्ति को क्रोधित होते देखता हूँ तब मैं बहुत ही दुःखी और भयभीत हो जाता हूँ। मेरा मानना है कि क्रोध मानवता के लिए बहुत बड़ा श्राप है। इसका निदान खोजा जाना अत्यंत आवश्यक है। मेरे द्वारा फेसबुक पर पब्लिश किये गए आर्टिकल्स "Cause of Our Anger", "Where Battle is Won by Quitting the Battlefield" और "क्रोध पर नियंत्रण (बात पते की -१२)" क्रोध के प्रति मेरी भड़ास की ही उपज हैं। गत कुछ समय से मैं प्रयासरत हूँ कि कुछ ऐसा आपके सामने ला सकूँ जो स्वयं के क्रोध पर नियंत्रण पाने में सहायक हो सके। किन्तु अब तक कुछ ठोस तलाश नहीं कर पाया हूँ। इतना अवश्य समझ पाया हूँ कि प्रथम प्रयास यह होना चाहिए कि क्रोध आये ही नहीं, फिर भी अगर कभी क्रोध आता है तब कुछ ऐसा होना चाहिए जो हमारे अन्दर यह सोच पैदा कर सके कि हमें क्रोध नहीं करना है। ऐसा कुछ हो जो रेड कार्ड (Red Card) सावित हो सके।
      मेरा मानना है कि मेरे अधिकाँश मित्रो को क्रोध नहीं आता होगा। ऐसे मित्रों को मैं प्रणाम करता हूँ। किन्तु क्रोध के लिए कोई अवस्था निश्चित नहीं है। मैं अपने उन मित्रो जो कभी-कभी क्रोध के शिकार हो जाते हैं से अनुरोध करना चाहूँगा कि वे क्रोध से छुटकारा पाने के लिए एक संकल्प लें कि उन्हें क्रोध से बचना है। संकल्प का अपनी दैनिक प्रार्थना में स्मरण करें। कोई चिन्ह रेड कार्ड के रूप में अपने साथ रखें जो उन्हें याद दिलाता रहे की उन्हें क्रोध नहीं करना है। प्रत्येक दिन सोने से पहले यह विचार करें कि क्या वे उस दिन क्रोध के शिकार हुए हैं? यदि हाँ, तब अपनी गलती मानकर इस पर शर्मिंदा हों। जिस व्यक्ति पर हम क्रोध करते हैं वह आहत होता है। हमें समय पाकर उससे Sorry कहकर अपनी गलती स्वीकार करनी चाहिए। इससे रिश्ते पुनः निर्मल और नार्मल हो जाएंगे और आपके संकल्प को भी बल मिलेगा।
जिन मित्रों को क्रोध नहीं आता, उनसे मेरा निवेदन है कि ऐसे लोगों की सहायता करें जिन्हें क्रोध आता है ताकि ऐसे लोग क्रोध विकार से छुटकारा पा सकें। उनके द्वारा मानवता की यह बहुत बड़ी सेवा होगी। ऐसे मित्रों का मैं जीवन भर आभारी रहूँगा।
साभार।
केशव दयाल।
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