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Monday, July 2, 2018

व्यवहारिक बात - 2 : PATRIOTISM


मित्रो!
      हम अपने व्यवहार में परिवर्तन लाकर अपनी मातृ भूमि की सेवा भले न कर पाएं किन्तु उसके कष्टों को कम अवश्य कर सकते हैं। यह भी राष्ट्र प्रेम है।
      हमें जन्म देने वाली माँ जन्म देते ही पृथ्वी माँ की गोद में दाल देती है। पृथ्वी माँ हमारे जीवन भर हमारा लालन-पालन करती है, हमारी आवश्यकताओं को पूरा करती है। किन्तु  हमारे बीच अनेक लोग ऐसे हैं जो पृथ्वी माँ द्वारा हमारे उपभोग के लिए दी गयी वस्तुओं को आवश्यकता से अधिक प्राप्त कर उनका कुछ भाग बर्बाद  कर देते हैं। पृथ्वी माँ उसकी सतह पर विद्यमान हर चेतन का भार उठाती है और उसके जीवित रहने के लिए उनके उपभोग की वस्तुएं उपलब्ध कराती है। इस कार्य में उसके संसाधनों का क्षय होता है जिसमें से कुछ  की भरपाई वह स्वयं कर लेती है किन्तु कुछ की उसके द्वारा भरपाई किया जाना संभव नहीं होता है। जिनकी भरपाई की जा सकती है उनके उगने में भी समय लगता है।
    दूसरी ओर बढ़ती जनसंख्या का अतिरिक्त बोझ भी पृथ्वी पर लगातार बढ़ता जा रहा है। इस कारण हमारी आवश्यकताएं बढ़तीं जा रहीं हैं।  
    हम सुख-सुविधाओं की चाहत में नयी वस्तुओं का अविष्कार करने में लगे हैं।  इसके साथ ही हम कुछ ऐसी वस्तुओं का निर्माण भी कर रहे हैं जो हमारे लिए ही विनाशकारी हैं। प्रक्रिया में पर्यावरण का संतुलन बिगड़ रहा है, पृथ्वी की उर्वरता समाप्त हो रही है। 
जरूरत इस बात की है कि हम पृथ्वी पर बढ़ते बोझ को घटाएं। इसके लिए जरूरी है कि हम ▬
1. हम अपनी आवश्यकताओं को सीमित रखें।
2. वस्तुओं का आवश्यक्तानुसार  ही उपभोग करें। .
3. दुरुपयोग और बर्बादी रोकें।
4. प्रकृति से ताल-मेल बना कर जीना सीखें।
5. जनसंख्या की बृद्धि को सीमित करें।
6. आवास अपनी आवश्यकता को देखते हुए बनाएं। पृथ्वी को कंक्रीट के जंगल बनाने से यथासंभव बचें।
7. प्राकृतिक संशाधनों को संरक्षित करें।
8. माँ वसुंधरा को उसकी खोई हुयी हरियाली को लौटाएं।
9. सहनशीलता और सौहार्द बढ़ाएं।
10. गुमराह होने से बचें।
     किसी भी धर्म के लोग क्यों न हों, सन्तानें अधिक पैदा करने के नारे बंद होने चाहिए। धर्म की आड़ में अधिक बच्चे पैदा करने की बात मिथ्या है।  मैंने ऐसे किसी परिवार को नहीं देखा जिसके द्वारा अपना परिवार दो बच्चों तक सीमित रखने पर उसका धर्म और समाज से बहिष्कार कर दिया गया हो। मेरा मानना है कि धर्म गुरुओं के साथ सरकार को बैठक करके हल निकाला जाना चाहिए। अधिक जनसँख्या होने पर उनकी आवश्यकताएं पूरी नहीं की जा सकतीं।  जनसंख्या बढ़ने से बेरोजगारी और अपराध बढ़ते हैं।
     हमें अपने में सुधार करने के लिए इसकी प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए कि दूसरे लोग करें तब हम भी करेंगे। सभी क्षेत्रों में किन्हीं कारणों से हम सुधार करने के लिए भले ही सक्षम न हों किन्तु यदि हम सुधार करने का संकल्प लेते हैं तब हमें सुधार के अनेक अवसर हमारे घर में ही मिल जाएंगे।


Sunday, June 3, 2018

GOD AND THE NATURE ईश्वर और प्रकृति


मित्रो!
      एक ईश्वर है और बाकी सब कुछ उसके द्वारा रची गयी प्रकृति है। प्रकृति के बाहर कुछ भी नहीं है। इस प्रकृति में वह भी वही समाया हुआ है। ईश्वर और उसकी प्रकृति के पुजारियों को  मेरा विनम्र प्रणाम।
                There is one God and everything else is the nature created by Him. There is nothing outside the nature. Even God Himself is deeply embedded in this nature. My humble salute to the priests of God and the nature.


Wednesday, October 25, 2017

विडम्बना : The Irony

मित्रो !
        कैसी विडम्बना है कि हम उन उपकरणों, जो हमने अपनी अल्पकालिक सुविधा के लिए बनाये हैं, का रख-रखाव और रक्षा तो नियमित रूप से करते हैं किन्तु हम पृथ्वी और प्रकृति, जिन्होंने हमारा जन्म से पोषण किया है और जिनके कारण हम जीवित हैं, के रख-रखाव और रक्षा की हम कोई परवाह नहीं करते।

Saturday, February 11, 2017

जानने योग्य : WORTH KNOWING

मित्रो !
तीन गुणों वाली प्रकृति, अहंकार, मन, बुद्धि और इन्द्रियों के कारण जीवात्मा सभी प्रकार के  अच्छे और बुरे कर्म करता है।
 
प्रकृति = जीव की सतो, रजो और तमो गुणों वाली जन्म से मिली प्रकृति।
अहंकार = जीव के अंदर "मैं हूँ", "मैं कर्त्ता हूँ" और "मैं ही भोक्ता हूँ" का अहम् भाव।
इन्द्रियाँ = पांच (आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा) ज्ञानेन्द्रियाँ और हाथ, पैर, वाणी, जननेन्द्रिय और गुदा पांच कर्मेन्द्रियाँ।

             ज्ञानेन्द्रियों में आँख से देखने, कान से सुनने, नाक से सूंघने, जीभ से स्वाद लेने, और त्वचा से स्पर्श करने से ज्ञान प्राप्त होता है। कर्मेन्द्रियों में हाथ और पैरों से कार्य करने, वाणी से बोलने, जननेन्द्रिय से संतान पैदा करने और गुदा से मल त्याग करने का कार्य होता है।




Wednesday, October 26, 2016

विडम्बना : The Irony

मित्रो !
       कैसी विडम्बना है कि हम उन उपकरणों, जो हमने अपनी अल्पकालिक सुविधा के लिए बनाये हैं, का रख-रखाव और रक्षा तो नियमित रूप से करते हैं किन्तु हम पृथ्वी और प्रकृति, जिन्होंने हमारा जन्म से पोषण किया है और जिनके कारण हम जीवित हैं, के रख-रखाव और रक्षा की हम कोई परवाह नहीं करते।

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Monday, September 19, 2016

स्वभाव में परिवर्तन का कारण क्या है? : Cause of Change in Our Nature


  • मित्रो !
             प्रत्येक व्यक्ति सतो, रजो और तमो, तीन गुणों वाली प्रकृति के साथ जन्म लेता है। मनुष्य के जीवन में जिस क्षण पर जो गुण प्रधान (dominant) होता है, उस क्षण पर वह उसी गुण के अनुरूप कार्य एवं आचरण करता है। 
            मनुष्य खान-पान, रहन-सहन और आचार-विचार में परिवर्तन कर अपनी प्रकृति में इच्छानुसार किसी भी गुण की प्रधानता को बढ़ा सकता है। अच्छी और बुरी संगति के प्रभाव से भी गुण (सतो गुण, रजो गुण और तमो गुण) प्रभावित होते हैं। कभी-कभी कटु बचनों से भी गुणों की प्रधानता में अचानक परिवर्तन हो जाता है। गुणों में परिवर्तन के कारण ही लुटेरे बाल्मीकि महर्षि बाल्मीकि बने और उन्होंने हिन्दुओं के धार्मिक ग्रन्थ रामायण की रचना की। नारी आकर्षण से ग्रस्त तुलसी दास के अंदर पत्नी द्वारा कही गयी बातों से गुणों में परिवर्तन हुआ और वे गोस्वामी तुलसी दास कहलाये तथा उन्होंने पवित्र ग्रन्थ राम चरित मानस की रचना की। आचरण द्वारा तामसी प्रवृत्ति रखने वाला व्यक्ति सात्विकी प्रकृति का व्यक्ति बन जाता है।
  •  

Friday, September 16, 2016

कर्म करने में ईश्वर का दखल नहीं : No Interference of God in Karm


मित्रो !
      ईश्वर को मानने वाले अधिकांश व्यक्ति यह मानते हैं कि ईश्वर की मर्जी के बिना पत्ता भी नहीं हिल सकता। यदि इसे सही मान लें तब प्रश्न यह उठता है कि क्या हमारे पाप कर्म करने में ईश्वर की सहमति या मर्जी होती है? मेरे विचार से ऐसा मान लेना पूर्णतः गलत है। 
     ऐसा मान लेना तीन कारणों से उचित नहीं है, पहला यह कि पाप कर्म करने के लिए प्रेरित करने या सहमति देने वाला ईश्वर नहीं हो सकता, दूसरे यह कि मनुष्य अपनी प्रकृति से प्रेरित हुआ कर्म करता है और तीसरे यह कि मनुष्य कर्म करने और किये जाने वाले कर्म का चयन करने के लिए स्वतंत्र है। 
    श्रीमद भगवद गीता के अध्याय 3 (कर्मयोग) के श्लोक 5 का अर्थ यह है कि प्रत्येक व्यक्ति को प्रकृति से अर्जित गुणों के अनुसार विवश होकर कर्म करना पड़ता है, अतः कोई भी एक क्षण के लिए भी बिना कर्म किये नहीं रह सकता। इसी अध्याय के श्लोक 8 में भगवान श्री कृष्णा अर्जुन को बताते हैं कि तुम अपना नियत कर्म करो, क्योंकि कर्म न करने की अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है। कर्म के बिना तो शरीर का निर्वाह भी नहीं होता। 
    यहां पर यह समझ लेना उचित होगा कि गीता में संदर्भित प्रकृति क्या है। प्रयेक जीव को जन्म के समय प्रकृति प्राप्त होती है। यह प्रकृति तीन प्रकार के गुणों से बनी होती है, सतो गुण, रजो गुण और तमो गुण। मनुष्य का स्वभाव इन्हीं गुणों पर निर्भर करता है। मनुष्य अपनी प्रकृति से प्रेरित हुआ प्रकृति के अनुसार कर्म करता है। 
    अध्याय 3 के श्लोक 8 में "नियत कर्म" करने की बात कही गयी है। प्रश्न यह उत्पन्न होता है "किसके द्वारा नियत कर्म". इसका उत्तर भगवान श्री कृष्णा द्वारा इसी अध्याय के श्लोक 5, जिसका सन्दर्भ ऊपर दिया गया है, में यह कहते हुए दिया गया है कि प्रत्येक व्यक्ति को प्रकृति से अर्जित गुणों के अनुसार विवश होकर कर्म करना पड़ता है। इससे स्पष्ट होता है कि मनुष्य को कर्म करने की प्रेरणा उसकी अपनी प्रकृति से मिलती है उसे भगवान या कोई अन्य प्रेरित नहीं करते। 
     यहां पर मैं गीता के अध्याय 2 के श्लोक 47 का भी देना चाहूँगा। यह श्लोक निम्प्रकर है 
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन | 
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि || 
    निश्चय ही तुम्हें अपना कर्म करने का अधिकार है, किन्तु कर्म के फलों के तुम अधिकारी नहीं हो। तुम न तो कभी अपने आपको अपने कर्मों के फलों का कारण मानों, न ही कर्म न करने में कभी आसक्त होओ। 
    You have a right to perform your duties, but you are not entitled to the fruits of your actions. Never consider yourself to be the cause of the results of your activities, nor be attached to inaction. 
     इस श्लोक में कर्म करने का अधिकार मनुष्य के पास होने की बात कही गयी है। कर्म करने के अधिकार के अन्दर, कर्म करने, कर्म न करने, विशिष्ट प्रकार का कर्म करने अथवा विशिष्ट प्रकार का कर्म न करने का अधिकार समाहित होता है। अतः यह समझना चाहिए कि कर्म के चयन का अधिकार भी मनुष्य को प्राप्त है।
     अध्याय 3 के श्लोक 36 में अर्जुन ने भगवान् श्री कृष्णा से बहुत ही महत्वपूर्ण प्रश्न (जो हम सब के मन में उठता है) निम्नप्रकार पूछा गया है। 

अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुष: | 
अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजित:|| 
     हे वृष्णिवंशी ! मनुष्य न चाहते भी पाप कर्मों के लिए प्रेरित क्यों होता है? ऐसा लगता है कि उसे बलपूर्वक उसमें लगाया जा रहा है? 
    Why is a person impelled to commit sinful acts, even unwillingly, as if by force, O descendant of Vrishni (Lord Krishna)?

   इस प्रश्न का उत्तर भगवान् श्री कृष्ण द्वारा अगले श्लोक 37 में निम्नप्रकार दिया गया है: 

काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भव: || 
महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम् || 37|| 
      हे अर्जुन ! इसका कारण रजोगुण के संपर्क से उत्पन्न काम है, जो बाद में क्रोध का रूप धारण करता है और जो इस संसार का सर्वभक्षी पापी शत्रु है। 
   It is lust alone, which is born of contact with Rajogun, and later transformed into anger. Know this as the sinful, all-devouring enemy in the world. 
   यहाँ पर पाप कर्म करवाने के लिए रजोगुण का संपर्क उत्तरदायी बताया गया है, जो मनुष्य की प्रकृति के कारण उत्पन्न होता है। 
उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि ईश्वर किसी व्यक्ति से कोई कर्म नहीं करवाता, मनुष्य स्वयं निर्णय लेकर अपनी प्रकृति से प्रेरित हुआ अच्छा या बुरा कर्म करता है।

     सुलभ सन्दर्भ हेतु ऊपर संदर्भित श्लोकों का मूल पथ नीचे दिया जा रहा है। 

अध्याय 3 श्लोक 5 
न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् | 
कार्यते ह्यवश: कर्म सर्व: प्रकृतिजैर्गुणै: || 5|| 
   There is no one who can remain without action even for a moment. Indeed, all beings are compelled to act by their qualities born of the nature. (the nature consists of three guas). 
अध्याय 3 श्लोक 8 
नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मण: | 
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मण: || 8|| 
   You should thus perform your prescribed duties, since action is superior to inaction. By ceasing activity, even your bodily maintenance will not be possible.
ओइम नमो भगवते वासुदेवाय।




Whether God Inspires Us To Do A Wrong : क्या ईश्वर गलत करने के लिए प्रेरित करता है?

Friends !
             For three reasons, it is wrong to assume that God inspires us to do a sinful act, firstly, because by definition, God has no such quality within Him, secondly, because a person acts under the inspiration of its own nature and thirdly, because the person is free to act and to choose the act to be performed by him.


मित्रो !
ईश्वर को मानने वाले अधिकांश व्यक्ति यह मानते हैं कि ईश्वर की मर्जी के बिना पत्ता भी नहीं हिल सकता। यदि इसे सही मान लें तब प्रश्न यह उठता है कि क्या हमारे पाप कर्म करने में ईश्वर की सहमति या मर्जी होती है? मेरे विचार से ऐसा मान लेना पूर्णतः गलत है। 

ऐसा मान लेना तीन कारणों से उचित नहीं है, पहला यह कि पाप कर्म करने के लिए प्रेरित करने या सहमति देने वाला ईश्वर नहीं हो सकता, दूसरे यह कि मनुष्य अपनी प्रकृति से प्रेरित हुआ कर्म करता है और तीसरे यह कि मनुष्य कर्म करने और किये जाने वाले कर्म का चयन करने के लिए स्वतंत्र है।