Peace, Co-existence, Universal Approach Towards Religion, Life, GOD, Prayer, Truth, Practical Life, etc.
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Tuesday, March 14, 2017
Saturday, February 11, 2017
जानने योग्य : WORTH KNOWING
मित्रो !
तीन गुणों वाली प्रकृति, अहंकार, मन, बुद्धि और इन्द्रियों के
कारण जीवात्मा सभी प्रकार के अच्छे और बुरे कर्म करता
है।
प्रकृति = जीव की सतो, रजो और तमो गुणों वाली जन्म से मिली
प्रकृति।
अहंकार = जीव के अंदर "मैं हूँ",
"मैं कर्त्ता
हूँ" और "मैं ही भोक्ता हूँ" का अहम् भाव।
इन्द्रियाँ = पांच (आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा) ज्ञानेन्द्रियाँ और हाथ,
पैर, वाणी, जननेन्द्रिय और गुदा पांच
कर्मेन्द्रियाँ।
ज्ञानेन्द्रियों
में आँख से देखने, कान से सुनने, नाक से सूंघने, जीभ से स्वाद लेने, और त्वचा से स्पर्श करने
से ज्ञान प्राप्त होता है। कर्मेन्द्रियों में हाथ और पैरों से कार्य करने, वाणी से बोलने, जननेन्द्रिय से संतान पैदा करने और गुदा से मल त्याग करने का कार्य होता है।
Thursday, December 29, 2016
अहंकार तो आप में भी है
मित्रो !
प्रत्येक जीवित व्यक्ति के पंच-तत्वों से बने शरीर में पांच कर्मेन्द्रियों और पांच ज्ञानेन्द्रियों के अतिरिक्त मन, बुद्धि और अहंकार भी होते हैं। अहंकार के प्रभाव में ही जीवात्मा शरीर को अपना मानता है तथा शरीर द्वारा किये कर्मों का अपने को कर्त्ता और कृत कर्मों के फलों का अपने को भोक्ता मानता है। शरीर में इसी अहंकार से ग्रसित जीवात्मा ही व्यक्ति का "मैं" (I) होता है।
Wednesday, July 8, 2015
मृत्यु क्या है : What is Death?
मित्रो !
पांच तत्वों से बना पांच कर्मेन्दिर्यों, पांच
ज्ञानेन्द्रियों, मन, बुद्धि और अहंकार
वाला यह शरीर जीवात्मा के इसमें प्रवेश करने पर क्रियाशील होता है और जब तक
जीवात्मा शरीर में रहता है, शरीर में चेतना रहती है। जीवात्मा द्वारा शरीर का
त्याग कर देना ही मृत्यु है।
मृत्यु के उपरान्त शरीर क्रियाविहीन हो जाता है। जीवात्मा के
शरीर को छोड़ देने पर जीवात्मा शरीर और इस संसार की अनेक जड़ तथा चेतन वस्तुओं से
बनाये गये मोह बन्धनों से मुक्त हो जाती है।
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