Showing posts with label जीवात्मा. Show all posts
Showing posts with label जीवात्मा. Show all posts

Saturday, February 11, 2017

जानने योग्य : WORTH KNOWING

मित्रो !
तीन गुणों वाली प्रकृति, अहंकार, मन, बुद्धि और इन्द्रियों के कारण जीवात्मा सभी प्रकार के  अच्छे और बुरे कर्म करता है।
 
प्रकृति = जीव की सतो, रजो और तमो गुणों वाली जन्म से मिली प्रकृति।
अहंकार = जीव के अंदर "मैं हूँ", "मैं कर्त्ता हूँ" और "मैं ही भोक्ता हूँ" का अहम् भाव।
इन्द्रियाँ = पांच (आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा) ज्ञानेन्द्रियाँ और हाथ, पैर, वाणी, जननेन्द्रिय और गुदा पांच कर्मेन्द्रियाँ।

             ज्ञानेन्द्रियों में आँख से देखने, कान से सुनने, नाक से सूंघने, जीभ से स्वाद लेने, और त्वचा से स्पर्श करने से ज्ञान प्राप्त होता है। कर्मेन्द्रियों में हाथ और पैरों से कार्य करने, वाणी से बोलने, जननेन्द्रिय से संतान पैदा करने और गुदा से मल त्याग करने का कार्य होता है।




Sunday, October 23, 2016

सकाम कर्म ही पुनर्जन्म का कारण : Cause of Rebirth : Deeds Performed with Desire of Fruits


मित्रो !

सकाम कर्म ऐसे कर्म होते हैं जो फल की इच्छा से किये जाते हैं। ऐसे कर्मों का कर्मों के अनुसार फल अवश्य मिलता है। कर्मों का फल मिलने का भी समय होता है, कुछ कर्मों का फल तुरंत मिलता जाता है, कुछ कर्मों का फल कर्म करने के कुछ समय बाद और कुछ कर्मों का फल काफी समय बाद, यहां तक कि मृत्यु के बाद मिलता है। जिन कर्मों का फल उसी जन्म में नहीं मिल पाता है उसका फल भोगने के लिए आत्मा नया शरीर धारण करता है। जो कर्म फल के लिए नहीं किये जाते हैं निष्काम कर्म कहलाते हैं। ऐसे कर्मों का फल जीवात्मा को  नहीं  भोगना पड़ता है। अतः ऐसे कर्म पुनर्जन्म का कारण नहीं बनते। 

श्रीमद भगवद गीता में भगवन श्री कृष्ण द्वारा मानव शरीर को क्षेत्र (खेत) और इसके ज्ञाता को क्षेत्रज्ञ बताया गया है। कर्म करने और कर्म के फल का भोग / उपभोग करने के लिए शरीर और जीवात्मा का साथ होना आवश्यक है। पच-तत्व "क्षिति, जल, पावक, गगन, समीरा" से बना शरीर तब तक मिटटी है जब तक उसमें जीवात्मा का प्रवेश नहीं होता और जब जीवात्मा इस शरीर को छोड़ देता है तब जो कुछ बचता है वह यही पांच तत्व होते हैं। अतः फलों का भोग भी तभी किया जा सकता है जब जीवात्मा शरीर धारण किये हुए हो। 
शरीर के बिना जीवात्मा कर्म और कर्म के फल का भोग नहीं कर सकता। किसी जन्म में किये गए ऐसे कर्मों, जिनके फलों का भोग उसी जन्म में संभव नहीं हो पाता, के फलों का भोग करने के लिए जीवात्मा नया शरीर धारण करता है।
deeds,God,Soul,Karma

Wednesday, July 8, 2015

मृत्यु क्या है : What is Death?

मित्रो !
       पांच तत्वों से बना पांच कर्मेन्दिर्यों, पांच ज्ञानेन्द्रियों, मन, बुद्धि और अहंकार वाला यह शरीर जीवात्मा के इसमें प्रवेश करने पर क्रियाशील होता है और जब तक जीवात्मा शरीर में रहता है, शरीर में चेतना रहती है। जीवात्मा द्वारा शरीर का त्याग कर देना ही मृत्यु है।

      मृत्यु के उपरान्त शरीर क्रियाविहीन हो जाता है। जीवात्मा के शरीर को छोड़ देने पर जीवात्मा शरीर और इस संसार की अनेक जड़ तथा चेतन वस्तुओं से बनाये गये मोह बन्धनों से मुक्त हो जाती है।

Friday, March 27, 2015

जीवात्मा का कर्म और कर्म-फल में बँधना

मित्रो ! 
      जब कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति द्वारा किये गए किसी कार्य का स्वयं को कर्त्ता (doer / performer) मानकर कार्य करने का श्रेय (Credit) स्वयं ले लेता है तब कार्य के फलस्वरूप मिलने वाले दंड (punishment) या पारितोषक (reward) को लेने से इन्कार (refuse) नहीं कर सकता।  जीवात्मा से क्रियाशील  हुए (activated) मनुष्य का शरीर कर्म तो स्वयं करता है किन्तु जीवात्मा मिथ्या (false / untrue) रूप में ऐसे कर्म का कर्त्ता स्वयं को मान लेता (admits / accepts) है और इस कारण उसे कर्म के फलों का उपभोक्ता बनना पड़ता है। इस प्रकार जीवात्मा कर्मों का कर्त्ता और कर्म - फलों (results of actions ) का भोक्ता (user) बन जाता है।