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Thursday, August 2, 2018

आत्मा की आवाज सुनो : LISTEN TO YOUR SOUL


मित्रो !
      मान लीजिये कि आपका वयस्क पुत्र आपके द्वारा किये गए मार्गदर्शन को बार-बार नजरअंदाज कर गलत निर्णय लेता है। ऐसी स्थिति में आप उसका मार्गदर्शन किया जाना व्यर्थ मानकर उसके द्वारा लिए जाने वाले निर्णयों के प्रति उदासीन (unconcerned) हो जाते हैं और उसका मार्गदर्शन करना बंद कर देते हैं। आपके सामने गलत निर्णय लेने पर भी आप उसको नहीं रोकते। यही सब कुछ आत्मा और बुद्धि के साथ होता है।  
      आत्मा बुद्धि से श्रेष्ठ होती है। जब आत्मा द्वारा बुद्धि का उचित मार्गदर्शन किये जाने के बाद भी, बुद्धि मार्गदर्शन को नजरअंदाज कर आत्मा के परामर्श के विपरीत निर्णय लेकर गलत कार्य करने की प्रवृत्ति अपना लेती है तब आत्मा उदासीन (unconcerned) रहकर बुद्धि को परामर्श देना बंद कर देती है। ऐसी स्थिति में आत्मा मूक दर्शक बन जाती है। यह स्थिति आत्मा की सोई हुयी स्थिति के समान होती है।

      Suppose when you see your adult son taking any wrong decision in any matter, you guide him but your son, does not pay heed to your advice and takes wrong decision. This happens times and again. After few instances, you stop advising him thinking that your advice is of no use and thereafter, you become unconcerned towards decisions that are made by him. Then you become a silent spectator and your son continues to take right or wrong decisions independently. Same thing happens with the intellect and the soul. When the intellect, under influence of desires, ignores the guidance provided by the soul, the soul becomes unconcerned silent spectator and the intellect (the brain) continues to take, independently, right or wrong decisions. 
      मानव शरीर में ईश्वर अंश के रूप में विद्यमान आत्मा मनुष्य का मार्गदर्शन करती है। उसकी राय और मार्गदर्शन कभी गलत नहीं होते। वह कुछ गलत करने के लिए प्रेरित भी  नहीं करती अपितु वह गलत निर्णय लेने से मनुष्य को रोकती है।





Tuesday, February 28, 2017

सामान्य जनों के लिए गीता – 1 : GEETA FOR COMMON MAN - 1

मित्रो !
          श्रीमद भागवद गीता आत्मा के परमात्मा से मिलन का उपाय तो बताती ही है साथ ही जन्म और मृत्यु के बन्धन से मुक्ति पाने का रास्ता भी दिखाती है। किन्तु सामान्य जनों का बौद्धिक ज्ञान का स्तर और आत्म बल इतना नहीं होता कि वे जन्म -मृत्यु के बंधनो से मुक्ति पाने और आत्मा के परमात्मा से मिलन (योग) के गीता में बताये गए मार्ग पर चलने का निर्णय ले सकें। आवश्यक बौद्धिक स्तर और आत्म बल रखने वाले लोगों में से भी बिरले ही इस मार्ग पर चलने का निर्णय लेते हैं। ऐसे में क्या यह मान लेना उचित होगा कि गीता में सामान्य जनो के लिए करने लायक कुछ भी नहीं है ?
         मेरा मानना है कि “गीता में सामान्य जनों के लिए कुछ भी करने लायक नहीं है” कहने वाला वही व्यक्ति हो सकता है जिसने गीता को नहीं पढ़ा है अथवा जिसने गीता को पढ़ा तो है किन्तु उसे ठीक से समझा नहीं है अथवा वह व्यक्ति जो गीता में लिखे श्लोकों को ईश्वर की आराधना में गए गए भजन या कीर्तन समझता है। इनमें कोई ऐसा हठी भी हो सकता है जो किन्हीं कारणों से जानकर भी अनजान बना रहना चाहता है अथवा जिसे गीता से किन्हीं कारणों से ईष्या है।
         मेरा मानना है कि गीता में दिए गए ज्ञान को व्यवहार में लाकर आसुरी प्रवृतियों पर विजय प्राप्त कर मनुष्य सुखमय जीवन गुजार सकता है, दुखों के कारणों पर नियंत्रण पा सकता है, अच्छा स्वास्थ्य प्राप्त कर सकता है, मृत्यु के भय से मुक्त हो सकता है और सभी प्रकार की चिंताओं और तनाव से मुक्ति पा सकता है। गीता हमें कर्म करने के लिए प्रोत्साहित करती है। मनुष्य के अंदर आत्म बल बढ़ाती है। गीता में दिया गया ज्ञान किसी धर्म विशेष के अनुयायियों तक के लिए सीमित नहीं है। यह विज्ञान है। गीता में सभी के लिए अलौकिक ज्ञान है।

        मैं प्रयास करूंगा कि आगे की पोस्ट्स में मैं कुछ पहलुओं को आपके समक्ष रख सकूं।

Sunday, October 23, 2016

सकाम कर्म ही पुनर्जन्म का कारण : Cause of Rebirth : Deeds Performed with Desire of Fruits


मित्रो !

सकाम कर्म ऐसे कर्म होते हैं जो फल की इच्छा से किये जाते हैं। ऐसे कर्मों का कर्मों के अनुसार फल अवश्य मिलता है। कर्मों का फल मिलने का भी समय होता है, कुछ कर्मों का फल तुरंत मिलता जाता है, कुछ कर्मों का फल कर्म करने के कुछ समय बाद और कुछ कर्मों का फल काफी समय बाद, यहां तक कि मृत्यु के बाद मिलता है। जिन कर्मों का फल उसी जन्म में नहीं मिल पाता है उसका फल भोगने के लिए आत्मा नया शरीर धारण करता है। जो कर्म फल के लिए नहीं किये जाते हैं निष्काम कर्म कहलाते हैं। ऐसे कर्मों का फल जीवात्मा को  नहीं  भोगना पड़ता है। अतः ऐसे कर्म पुनर्जन्म का कारण नहीं बनते। 

श्रीमद भगवद गीता में भगवन श्री कृष्ण द्वारा मानव शरीर को क्षेत्र (खेत) और इसके ज्ञाता को क्षेत्रज्ञ बताया गया है। कर्म करने और कर्म के फल का भोग / उपभोग करने के लिए शरीर और जीवात्मा का साथ होना आवश्यक है। पच-तत्व "क्षिति, जल, पावक, गगन, समीरा" से बना शरीर तब तक मिटटी है जब तक उसमें जीवात्मा का प्रवेश नहीं होता और जब जीवात्मा इस शरीर को छोड़ देता है तब जो कुछ बचता है वह यही पांच तत्व होते हैं। अतः फलों का भोग भी तभी किया जा सकता है जब जीवात्मा शरीर धारण किये हुए हो। 
शरीर के बिना जीवात्मा कर्म और कर्म के फल का भोग नहीं कर सकता। किसी जन्म में किये गए ऐसे कर्मों, जिनके फलों का भोग उसी जन्म में संभव नहीं हो पाता, के फलों का भोग करने के लिए जीवात्मा नया शरीर धारण करता है।
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