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Thursday, July 19, 2018

विडम्बना : पृथ्वी पर अत्याचार : THE IRONY : ATROCITIES ON EARTH


मित्रो !
कैसी विडम्बना है कि हम सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि और छाया ग्रहों राहु और केतु की  पूजा-अर्चना करते हैं और उनके रुष्ट होने से उनसे डरते भी हैं किन्तु पृथ्वी गृह जो हम सबका भार उठाये हुए है और  हमारे जीवन पर्यन्त हमारा पालन - पोषण करता है, उसकी पूजा कोई-कोई ही करता है।  अधिकांश लोग नित्य-प्रति उसे क्षति पहुंचा कर  घायल और अपमानित करते रहते हैं।

मैं जानता हूँ कि अगर तुम चाहो भी तो नहीं दे सकते, 
इस पावन पृथ्वी माँ को दवा उसके दुखते घावों की,
फिर भी अगर हिम्मत है, जज्बा है, तुममें कुछ करने का,
तो दया करो इस माँ पर, उसे कोई और नया घाव न दो।

I know that even you wish, you can't give medicine,
to this holy mother Earth, for her painful wounds.
Even then if emotions and courage are in you, to do something for her,
then be compassionate to the mother, do not give her any new wound.



Wednesday, October 25, 2017

विडम्बना : The Irony

मित्रो !
        कैसी विडम्बना है कि हम उन उपकरणों, जो हमने अपनी अल्पकालिक सुविधा के लिए बनाये हैं, का रख-रखाव और रक्षा तो नियमित रूप से करते हैं किन्तु हम पृथ्वी और प्रकृति, जिन्होंने हमारा जन्म से पोषण किया है और जिनके कारण हम जीवित हैं, के रख-रखाव और रक्षा की हम कोई परवाह नहीं करते।

Wednesday, October 26, 2016

विडम्बना : The Irony

मित्रो !
       कैसी विडम्बना है कि हम उन उपकरणों, जो हमने अपनी अल्पकालिक सुविधा के लिए बनाये हैं, का रख-रखाव और रक्षा तो नियमित रूप से करते हैं किन्तु हम पृथ्वी और प्रकृति, जिन्होंने हमारा जन्म से पोषण किया है और जिनके कारण हम जीवित हैं, के रख-रखाव और रक्षा की हम कोई परवाह नहीं करते।

Earth, Nature, Maintenance, Birth,Irony,

Saturday, May 21, 2016

मृत्यु और बुढ़ापे की हत्या का पागलपन : Madness of Killing the Death and the Old Age


मित्रो !

       यदि बुढ़ापे और मृत्यु को टालने की बूटियां या युक्तियाँ मनुष्य के हाथ लग जांय तब प्रत्येक मनुष्य सदैव जवान ही रहना चाहेगा। ऐसे में जनसँख्या लगातार बढ़ती रहने पर पृथ्वी पर जगह नहीं रह जाएगी। मनुष्य स्वर्ग की चाहत में पृथ्वी को ही नर्क बना बैठेगा। अगर किसी और गृह पर जीवन हुआ और मनुष्य ऐसे गृह पर गया तब कुछ समय में ही वहां पर भी ऐसी ही स्थिति उत्पन्न हो जाएगी।
      उपर्युक्त परिस्थितियों में मनुष्य यह सोचने को विवश हो जाएगा कि वह मृत्यु और बुढ़ापे की हत्या का अपराधी है, मृत्यु और बुढ़ापा रहित जीवन से बुढ़ापे और जन्म-मृत्यु के बंधनों में बंधा जीवन ही श्रेयस्कर है। अंत में मनुष्य या तो स्वयं ऐसी बूटियां और युक्तियाँ नष्ट कर देगा या फिर ईश्वर से प्रार्थना करेगा कि वह उसे ऐसी बूटियों और युक्तियों से मुक्ति दिलाये।


Wednesday, May 18, 2016

साझे की विरासत के संरक्षण का दायित्व सबका

मित्रो !
     पृथ्वी, जल, पवन, अग्नि, आकाश पर ईश्वर के सिवा किसी अन्य का एकाधिकार नहीं है, ये सभी प्राणियों के उपयोग / उपभोग के लिए हैं। ऐसे में यदि कोई जीव-जंतु इनकी संरचना को बिगाड़ने का कोई कार्य करता है तब उसे ऐसा करने से रोकना सभी का अधिकार भी है और सभी का दायित्व भी।


     ऐसे में हम सबका दायित्व बनता है कि कोई भी व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति को साझा विरासत के उपयोग / उपभोग से रोके और हम सब मिलकर साझा विरासत की रक्षा करें। यदि कोई व्यक्ति इसकी पवित्रता को या इसको समूल नष्ट करने का प्रयास कर रहा हो तब उसे ऐसा करने के लिए समझाएं और यदि वह माने तब उसका सामाजिक वहिष्कार करें।




Wednesday, May 11, 2016

यह हम कहाँ आ गए हैं?

मित्रो !
     आजकल सभी क्षेत्रों में सामान्य रूप में ऐसा बहुत कुछ असामान्य घटित हो रहा है जो हमें याद दिलाता है कि यह कलियुग है। यहाँ प्यार, सत्य, करुणा, दान और धर्म जैसे तत्व कमजोर हो रहे हैं, उनकी परिभाषाएँ बदल रहीं हैं।

     यहां सत्य से उसके सत्य होने का प्रमाण माँगा जा रहा है, वासना को प्यार का नाम दे दिया गया है, बूढ़े माँ-बाप सहानुभूति के पात्र बन गए हैं, मानवीय रिस्तों का व्यापारीकरण हो गया है। भोलेपन और विश्वास को छला जा रहा है, इनको ब्लैकमेल के लिए प्रयोग किया जा रहा है। कामुक भूखे भेड़िये हर जगह घूम रहे हैं। नदियाँ प्यासीं हैं, हवा, पानी पर पहरे लगे हैं, संख्या बल बढ़ाने को धर्म का सशक्तिकरण माना जा रहा है। संतों का अकाल दिख रहा है, ईश्वर की तिजारत करने वाले बाबाओं की संख्या बढ़ रही है, स्वयं भू ईश्वर अनेक हैं। हमारी धरती जो कभी स्वर्ग तुल्य थी पर बोझ और उसका दोहन इतने बढ़ गए हैं कि वह काँप और कराह रही है। ------- हम भूल गए हैं कि हम लगातार गर्त में गिर रहे हैं।