- मित्रो !
God has blessed all of us with valuable gift of love. We should understand love and thereafter -ईश्वर ने हम सभी को प्यार के अनमोल उपहार से आशीर्वाद दिया है। हमें चाहिए कि हम प्यार को समझें और उसके बाद -Live in love and inspire others to live with love.प्यार को जियें और औरों को प्यार से जीने के लिए प्रेरित करें। - Promote and propagate love.
Peace, Co-existence, Universal Approach Towards Religion, Life, GOD, Prayer, Truth, Practical Life, etc.
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Monday, October 31, 2016
प्यार का अनमोल उपहार : Valuable Gift of Love
Monday, May 30, 2016
मृत्यु निरर्थक नहीं : Death Is Not Purposeless
मित्रो !
इच्छा करो कि जब तक जियें, नीरोग और सुखी रहें। यह इच्छा न करो कि मृत्यु कभी न आये, क्योंकि पृथ्वी पर जीवन बने रहने के लिए जन्म और मृत्यु के चक्र का नियमित रूप से चलते रहना आवश्यक है।
Wish to live healthy and happy life till the death
comes and don't wish for death not to come because the continuity of life on
the earth requires continuous running of cycle of birth and death.
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Cycle of birth and death,
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Wednesday, May 13, 2015
पहले 100 प्रतिशत जियें फिर 100 वर्ष के जीवन की कामना करें
मित्रो !
जीवन में जितने समय में हम कोई शरीर निर्वाह, विश्राम, मनोविनोद, आदि का अथवा कोई अन्य कार्य नहीं करते, उस समय में हम केवल समय गुजारते हैं, जीवन नहीं जीते। जो जिया न जाय वह जीवन कैसे। समय गुजारना जीवन जीना नहीं है। मेरा मानना है कि कोई व्यक्ति अपनी जीवन अवधि का जितना समय निष्क्रिय रह कर गुजारता है वह अपनी जीवन की अवधि को उस सीमा तक कम कर लेता है।
उदहारण के लिए यहाँ पर हम मान लेते हैं कि किसी व्यक्ति की उम्र दो दिन (48 घंटे) की है। इस समय को हम 8-8 घंटे के अंतरालों में बाँट लेते हैं। मान लेते हैं कि व्यक्ति ने इन 48 घंटों में से 8 से 16 घंटे और 24 से 32 घंटे के मध्य का समय निष्क्रिय रहकर गुजारा। नीचे देखते हैं कि क्या परिणाम प्राप्त होता है।
दो दिन (48 घंटे) की जीवन अवधि
0--------8--------16--------24--------32--------40---------48
अवधि जिसमें जीवन निष्क्रिय रहा गया 8 से 16 और 24 से 32
जिए गए जीवन के समय अंतराल
0--------8 16--------24 32--------40 40--------48
कुल जिया गया जीवन
0--------8----------16--------24--------32
यहां पर जीवन अवधि 48 घंटे के सापेक्ष जीवन केवल 32 घंटे ही जिया गया है। 16 घंटे की जीवन अवधि का हमारे लिए कोई अर्थ नहीं रहा। इसका होना या न होना हमारे लिए कोई अर्थ नहीं रखता।
ईशावास्योपनिषद् में कहा गया है :
कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः। एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे॥
अर्थात्- श्रेष्ठ कर्म करते हुए सौ वर्ष तक जीवित रहने की इच्छा करनी चाहिए। ऐसा करते रहने से मनुष्य कर्म बन्धन से मुक्त हो जाता है।
इन्हीं विचारों ने मुझे निम्नलिखित विचार आपके सामने रखने के लिए प्रेरित किया :
हमारे बीच अधिकाँश लोग चाहते हैं कि उनकी जीवन अवधि अधिक और अधिक लम्बी हो, एक-दूसरे के दीर्घायु होने की कामना भी करते हैं किन्तु विडम्बना यह है कि हमें जो जीवन अवधि मिली है उसका एक बड़ा भाग हम निष्क्रिय रह कर बिना जिये ही गुजार देते हैं। हमें चाहिए कि हम पहले 100 प्रतिशत जियें फिर 100 वर्ष के जीवन की कामना करें।
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