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Saturday, October 7, 2017

जीएसटी में माल का निर्यात Confused State of Affairs


मित्रो!
      माल के निर्यात पर जीएसटी नहीं लगता किन्तु जीएसटी में यह व्यवस्था है कि यदि निर्यात इनवॉइस बनाने के तीन माह में माल का निर्यात नहीं होता है तब निर्यातक को इंटीग्रेटेड टैक्स और इस पर इनवॉइस की तारीख से कर जमा करने की तारीख तक का 18 प्रतिशत सालाना की दर से ब्याज जमा करना होगा।  
माल के भारत के बाहर निर्यात करने से पूर्व निर्यातकों से जीएसटी कानून के अंतर्गत यह अपेक्षा की गयी है कि वे इस आशय का लेटर ऑफ़ अंडरटेकिंग देंगे कि एक्सपोर्ट इनवॉइस बनाने के तीन माह के अंदर माल का निर्यात कर देंगे और अगर वे ऐसी अवधि में माल का निर्यात करने में असफल रहते हैं तब वे तीन माह ऐसी अवधि समाप्त होने के १५ दिन के अंदर इनवॉइस में दिखाए गए माल के मूल्य पर इंटीग्रेटेड टैक्स की धनराशि और ऐसी धनराशि पर इनवॉइस की तारीख से धनराशि जमा करने की तारीख की अवधि के लिए 18 प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से व्याज जमा करेंगे।
मेरी समझ से परे है कि जब -
1. जीएसटी माल या सेवाओं की सप्लाई पर लगता है।  अगर माल की सप्लाई ही नहीं हुयी तब कर क्यों बसूला जा रहा है।
2. दूसरे यह कि माल की सप्लाई की अवधि (तारीख) निर्यातक और विदेशी क्रेता के बीच हुए अनुबंध से तय होती है तब इसको कम या अधिक करने का अधिकार सरकार को कहाँ से मिल जाता है।
3. कर बसूलने के लिए माल या सेवाओं की सप्लाई का होना आवश्यक है। किसी माल की सप्लाई हुए बिना  'माल की सप्लाई हुयी' कैसे माना जा सकता है।

4. निर्यात एक निर्धारित समय के अंदर न हो पाने से यह कैसे निष्कर्ष निकला जा सकता है कि माल की अंतर्राज्यीय सप्लाई कर दी गयी है। 

Saturday, September 30, 2017

निर्यात पर जंजीरें

मित्रो !
     जीएसटी लगने से पहले माल की व्यापार स्थल से निकासी पर लगने वाले केंद्रीय आबकारी शुल्क से राहत इस आधार पर मिलती थी कि माल निर्धारित अवधि में एक्सपोर्ट कर दिया जाय। छूट लेने के बाद निर्यात की आड़ में आबकारी शुल्क की चोरी न हो, इसके लिए माल की निकासी पर शर्तें लगाईं गई थीं। जीएसटी में निर्यात से सम्बंधित कोई भी राहत निर्यात होने के पूर्व में नहीं ली जाती और कोई भी  राहत निर्यात के लिए माल की क्लियरेंस होने के बाद निर्यात के समय प्राप्त होने वाले दस्ताबेजों के आधार पर मिलती है।  अतः निर्यात से पूर्व माल के सम्बन्ध में लेटर ऑफ़ अंडरटेकिंग, बांड और बैंक गारंटी या टैक्स के भुगतान की शर्तें लगाना निर्यात पर जंजीरें डालने  जैसा है।
        In reference to conditions in respect of zero rated supply, it is noteworthy that conditions, under Central Excise, were prescribed for removal of goods for export, for the reason that relief from excise duty was sought at the stage of removal of goods. As it relates to export in GST regime, relief is sought on the basis of export documents. Then why conditions are being imposed on making export invoice and removal of export goods . No relief can be claimed unless the goods are exported. As soon as goods come into the export stream, proof of export becomes available with the taxable person. Then where does arise the necessity of conditions prescribed under sub-section (3) of section 16 of the Integrated Goods and Services Tax Act, 2017. After all, relief and refund is to be provided on the basis of documents evidencing export.

            Scheme provided for export cases is hampering the export and is bringing adverse impact on the economy of the country. 


Tuesday, March 7, 2017

जीएसटी में निर्यात पर छूट : प्राविधानों का औचित्य एवं वैधता

Proposed Export Treatment Under GST In India
मित्रो !
प्रस्तावित माल और सेवा कर (Goods and Services Tax) से सम्बंधित ड्राफ्ट मॉडल जीएसटी लॉ और आईजीएसटी लॉ के संशोधित प्रारूपों, जैसे कि Central Board of Excise & Customs (CBEC), भारत सरकार द्वारा फरबरी 23, 2017 को लांच की गए मोबाइल ऐप में उपलब्ध है, के अनुसार –
    जीएसटी में एक्सपोर्ट के क्रम में माल की सप्लाई पर छूट जारी रखने का उद्देश्य है। लेकिन पहले टैक्स जमा करना है फिर एक्सपोर्ट के निर्धारित साक्ष्य देकर जमा की गयी धनराशि का रिफंड क्लेम करना है। अथवा माल व्यापार  स्थल से हटाने से पूर्व कर विभाग (tax department) में बांड (security bond) जमा कर अनुमति प्राप्त की जाय बाद में जब माल एक्सपोर्ट हो जाय उसके बाद निर्धारित साक्ष्य देकर इनपुट टैक्स क्रेडिट की धनराशि का रिफंड का क्लेम दाखिल किया जाय। विभाग जांच के बाद क्लेम सही पाए जाने पर तीन माह के अंदर रिफंड देगा।  यह प्रक्रिया कारोबारियों की कठिनाइयां बढ़ाने वाली और उनकी वर्किंग कैपिटल के एक बड़े भाग को अवरुद्ध करने वाली है। इससे  जीएसटी की कम्प्लाइंस कॉस्ट बढ़ेगी और समय तथा श्रम का दुरुपयोग भी होगा।  एक मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के अनुसार ऐसी व्यवस्था असंवैधानिक भी है।
    ड्राफ्ट का प्रारूप तैयार करने वाले विद्वान अधिकारियों ने उपर्युक्त आशय के प्राविधान Central Excise से लिए हैं किंतु ऐसा करते समय वे यह भूल गए है कि - The taxable event under the Central Excise law is ‘manufacture’ and the liability of Central Excise Duty arises as soon as the goods are manufactured. Before clearance of goods from area of manufacture, excise invoice is to be prepared and amount of excise duty is to be self-assessed by the manufacturer even if goods are to be shifted for storage at some other place.
     दूसरे Central Excise के प्राविधानों के अन्तर्गत निर्माण स्थल से माल हटाने की तिथि से  छह माह के अंदर या आगे बढ़ाये गए समय में एक्सपोर्ट किया जा सकता है।
          In the GST, taxable event is "supply of goods and / or services". Where goods are being supplied in the course of export, taxable event will be "supply of goods in the course of export". Here taxable event will not arise before goods come in the stream of export. Since the event is to be kept exempt from levy of GST, supplier will not be required to pay tax. As soon as the goods are cleared for export, the documents required for claiming exemption are available with the supplier.
        In the aforesaid circumstances, there is no need of the provision like in the Central Excise for depositing tax or for submitting security bond in respect of supply taking place in the course of export.
    यह विचारणीय है कि यदि किसी संव्यवहार पर कर देय नहीं है तब यह व्यवस्था नहीं की जा सकती कि taxpayer से पहले कर जमा कराया जाय और बाद में उसे ऐसी धनराशि बापस कर दी जाय। माननीय सुप्रीम कोर्ट ने मेसर्स भवानी कॉटन मिल्स लिमिटेड वनाम पंजाब राज्य एवं अन्य, निर्णय दिनांक 10-04-1967  मामले में ऐसी व्यवस्था को अवैध (invalid) ठहराया (held invalid) है।
"If a person is not liable for payment of tax at all, at any time, the collection of a tax from him with a possible contingency of refund at a later stage will not make the original levy valid."
प्रस्तावित व्यवस्था से इंस्पेक्टर राज को बढ़ावा मिलेगा और कारोबारियों के  व्यापार में लगी वर्किंग कैपिटल प्रतिकूल रूप में प्रभावित होगी।
        एक्सपोर्ट के क्रम में माल की सप्लाई पर कर लगाने (tax levy) के उद्देश्य से सप्लाई को अंतर्राज्यीय सप्लाई माने जाने का प्राविधान किया गया है। यह संविधान के अनुरूप नहीं है। अप्रमाणित एक्सपोर्ट सप्लाई राज्य के अंदर की सप्लाई या अंतर-राज्यीय सप्लाई में से कोई भी सप्लाई हो सकती है।
एक बात  और भी विचारणीय यह है कि संविधान में राज्यों को  "supply of goods and / or services which takes place in the course of export out of the territory of India"  पर कर लगाने की संविधान के आर्टिकल  286 में मनाही है लेकिन जो सप्लाई  "in the course of export" न होकर अन्यथा एक्सपोर्ट है पर कर लगाने का अधिकार राज्यों को भी प्राप्त है। उदाहरण के लिए अमेरिका में रहने वाला अनिवासी भारतीय (NRI) अपने साथ भारत से एक गिटार खरीद कर अमेरिका ले जाता है। इस उदहारण में भी गिटार का एक्सपोर्ट हो जाता है। किन्तु इस उदहारण में गिटार की सप्लाई "supply of goods in the course of export of goods out of the territory of India" नहीं है। माननीय उच्चतम न्यायालय ने केंद्रीय बिक्री कर अधिनियम, 1957 में धाराएं 3 व 5 लागू होने तक की अवधि के मामलों में अनेक बार यह निर्णय दिया है कि संविधान के अनुच्छेद 269 व 286 में प्रयुक्त शब्दों "in the course of" विशिष्ट अर्थ रखते हैं। 

मेरा विचार और सुझाव भी है कि यदि मॉडल ड्राफ्ट में प्रस्तावित व्यवस्था में यथोचित परिवर्तन नहीं किया गया है तब सम्बंधित पक्षों को अपना पक्ष सरकारों के सामने रखना चाहिए।  मेरा यह भी मानना है कि जीएसटी काउन्सिल की संस्तुतियां पार्लियामेंट या राज्यों की अस्सेम्बलीज़ के लिए बाध्यकारी प्रभाव नहीं रखतीं हैं।