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Tuesday, March 21, 2017

माँ का श्रृंगार छीनने का दोषी कौन?

मित्रो!
      तीनो लोकों में न्यारी क्या यही वह पृथ्वी है जिस पर परी लोक से आने वाली परियां और देवलोक से आने वाले देवता विचरण किया करते थे। क्या यह वही पृथ्वी है जिस पर राम ने जन्म लेकर राक्षसों का विनाश किया था, जहां कृष्ण ने अर्जुन को गीता का अमर सन्देश दिया था, क्या आदि देव शिव - शंकर  की पावन तपो भूमि यही है।  क्या यही वह पृथ्वी है जिस पर ऋषि - मुनि  साधना और तपस्या किया करते थे, जहाँ अप्सराएं आकर नृत्य किया करतीं थीं।

             हरे-भरे बन, स्वच्छ जल के झरने और कल - कल कर बहती स्वच्छ - मीठे जल की नदियाँ, हरे - भरे घास के मैदान और उन पर छलांग लगाते, कुलाटें भरते हिरणो के छौने और शेरों के शावक,  रंग-विरंगे फूल और फलों से लदे मस्ती में लहराते पेड़-पौधे यह सब जो पृथ्वी का श्रृंगार थे, कहाँ विलुप्त हो गए।
Meanings: शावक = बच्चे।   छौने = हिरन के बच्चे। 


Saturday, January 14, 2017

Conservation of Greenery

मित्रो !

हरे भरे बाग़-बगीचे, लहलहाते हरी घास के मैदान, वन्य पशुओं की शरण स्थली घने जंगल किसे नहीं भाते। किन्तु विडम्बना यह है कि हम इनको उगाने और संरक्षित करने के स्थान पर बड़ी-बड़ी कोठियां (Big Houses) बनाकर ईंटों और पत्थरों का रोपण कर रहे हैं। कोठियों के लिए आवश्यकता से अधिक भूमि पर कब्ज़ा तो कर ही रहे हैं, इसके साथ ही इनके निर्माण में लगने वाली सामिग्री भी पृथ्वी से प्राप्त कर रहे हैं। इससे धरती माँ का स्वरुप बदल रहा है और बाढ़ - सूखा और सुनामी जैसी आपदाओं को आमंत्रण दे रहे हैं।
हमें चाहिए कि हम पृथ्वी पर आवश्यकता से अधिक न लें और आवश्यकता से अधिक क्षेत्र पर कब्ज़ा न करें।