Monday, March 30, 2015

अमर्यादित आचरण अवाँछनीय भी घातक भी

मित्रो !

    समाज के बीच अमर्यादित आचरण करने वाले व्यक्ति की प्रतिष्ठा इस सीमा तक गिर जाती है कि ऐसे व्यक्ति से या उसके सामने समाज का कोई सदस्य बात भी नहीं करना चाहता। समाज ऐसे व्यक्ति की वहिष्कार की औपचारिक घोषणा भले ही न करे किन्तु समाज ऐसे व्यक्ति के साथ आचरण उसी प्रकार करता है जैसे वह व्यक्ति समाज से वहिष्कृत व्यक्ति हो।


दुःख हमारी अपनी देन हैं

मित्रो !

    मनुष्य अज्ञानी रह कर अनियंत्रित जीवन शैली जीते हुए असीमित आज़ादी का उपभोग कर अपने कष्टों को स्वयं बढ़ाता है। यदि मनुष्य सुखी रहना चाहता है तब उसे ज्ञान अर्जित करना होगा, जीवन नौका को अनियंत्रित न छोड़कर स्वयं नियंत्रित कर सही दिशा में ले जाना होगा तथा उसे असीमित आज़ादी में से उतनी आज़ादी का उपभोग करना होगा जितना उसके और अन्य सभी के लिए हितकर हो सकता है।


Friday, March 27, 2015

जो जस करइ सो तस फल चाखा




मित्रो। 
कर्म का फल कर्म करने वाले को ही मिलता है। सत्कर्म का फल अच्छा और दुष्कर्म का फल बुरा होता है। जब कोई आपको अपमानित करने का दुष्कर्म करता है तब वह ऐसे दुष्कर्म का बुरा फल पाने का हक़दार बनता है। जब प्रतिक्रियावश आप किसी का अपमान करने का दुष्कर्म करते हैं तब आप ऐसे दुष्कर्म का बुरा फल पाने के हक़दार बनते हैं।

हमारे त्यौहार



हमारे रक्षाबन्धन, करवा चौथ और भाई दूज अच्छे हैं।

True Happiness and Contentment

मित्रो !
             सभी प्राणियों के प्रति दया, परोपकार और सच्चे प्यार तथा निस्वार्थ सेवा का भाव रख कर इनका आचरण करने वाला विनम्र और कर्मठ व्यक्ति ही सच्ची ख़ुशी और संतुष्टि पाता है। इस नश्वर जगत में सच्चे सुख और संतोष से बढ़कर कुछ भी नहीं है। 
          In this mortal world, there is nothing more than the true happiness and satisfaction. Only a diligent and humble person, who believes in altruism, compassion, true love and selfless service towards all creatures and who cultivates them, finds true happiness and contentment.

हमें कुछ अच्छा करने के अवसर तलाशने चाहिए

मित्रो !
जिस दिन ईश्वर हमें कोई नेक कर्म करने का अवसर देता है और हम किसी दीन-दुखी का कोई कष्ट कम करने में सहायक होते हैं, किसी असहाय या जरूरत मंद की सहायता करते हैं या किसी असहाय भूखे व्यक्ति को खाना खिलाते हैं या किसी के साथ हो रहे अत्याचार से उसे मुक्ति दिलाते हैं तब उस दिन हम अपने अंदर एक अलौकिक ख़ुशी का अनुभव करते हैं। हम अपने अंदर हल्कापन अनुभव करते हैं। हमारे अंदर एक नयी ऊर्जा का संचार होता है। हमारे अपने लोगों के प्रति प्यार और प्रगाढ़ हो जाता है। हमारे अंदर आत्मविश्वास और बढ़ जाता है। हम सभी प्रकार के तनाव से मुक्त हो जाते हैं। हमारी कार्य क्षमता पर इसका अनुकूल प्रभाव पड़ता है। 
मेरा व्यक्तिगत विचार है कि अगर कुछ अच्छा करने से इतना सब कुछ मिलता है तब हम सब को ऐसे अवसरों को तलाशना चाहिए और अवसर मिलने पर कुछ न कुछ अच्छा अवश्य करते रहना चाहिए।

साधु प्रकृति और दुष्ट प्रकृति रखने वाले व्यक्ति

मित्रो !
साधु प्रकृति और दुष्ट प्रकृति रखने वाले व्यक्तियों के अन्तः और वाह्य आचरण में कोई अंतर नहीं होता। साधु प्रकृति वाले व्यक्ति के अन्तः मन में नैतिक प्रकृति के विचार होते हैं और उसका वाह्य आचरण भी साधु प्रकृति का होता है। दुष्ट प्रकृति के व्यक्ति के अन्तः मन में अनैतिक प्रकृति के विचार होते हैं और वह अनैतिक प्रकार का वाह्य आचरण भी करता है। इन दोनों प्रकार की प्रवृतियों से भिन्न प्रकार की प्रकृति रखने वाला तीसरे प्रकार का व्यक्ति पाखंडी प्रकृति का होता है। उसका वाह्य आचरण साधु प्रकृति रखने वाले व्यक्तियों के सामान दिखावे के लिए होता है। उसके अन्तः मन में विचार दुष्ट प्रकृति वाले व्यक्तियों के समान होते है और वह ऐसे विचारों का क्रियान्वन सार्वजनिक रूप से न करके योजनाबद्ध तरीके से गुप्त रूप से करता है।
साधु प्रकृति के व्यक्ति से समाज को कोई खतरा नहीं होता अतः उसे दण्डित करने की आवश्यकता नहीं होती, दुष्ट व्यक्ति का जीवन एक खुली किताब की तरह होता है। अतः उसे पकड़कर आसानी से दण्डित किया जा सकता है किन्तु कोई भी समाज या सरकार किसी पाखंडी को तब तक दण्डित नहीं कर सकती जब तक पाखंडी अनैतिकता का प्रदर्शन करते पकड़ा न जाए। पाखंडी अनैतिक आचरण वाले व्यक्ति के समान खुले तौर पर अपराध नहीं करता। वह योजनाबद्ध तरीके से इस प्रकार अपराध करता है कि उसका ऐसा आचरण आसानी से न पकड़ा जा सके। ऐसा व्यक्ति प्रायः ऐसे व्यक्तियों को अपना शिकार बनाता है जो उसके वाह्य आचरण के मोह जाल में फंसे होते हैं। ऐसे लोगों को पकड़ने के लिए जाल बिछाने की आवश्यकता होती है।
आज हमारे देश में अनगिनत लोग पाखण्डियों के शिकार हो रहे हैं। इनके शिकार अधिकांश आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लोग शिकार होते हैं। मेरा विचार है कि बड़े-बड़े पाखंडियों को पकड़ने के लिए समाज और सरकार को ख़ुफ़िया जाल बिछाकर इनको पकड़कर दण्डित करना चाहिए। इस प्रक्रिया में अगर किसी सत्य आस्थावान का भी परीक्षण होता है तब इसमें बुरा कुछ भी नहीं है। सत्य के परीक्षणों के अनेक उदहारण हमारे धार्मिक ग्रंथों में भी मिल जाएंगे। "साँच को आंच क्या।" इस पर हमारे साधु-संत भी विश्वास करते हैं। सत्यनारायण जी की कथा भी तो सत्य के परीक्षण और असत्य के दुष्परिणामों से सम्बंधित कथा संग्रह है। अतः नैतिक आचरण करने वाले किसी व्यक्ति और किन्हीं वास्तविक साधु-संतों को भी इससे कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए।

छवि : IMAGE

मित्रो ! 
प्रत्येक व्यक्ति की एक छवि होती है। यह छवि सदैव उसके साथ चलती है। इसी छवि के आधार पर वह सफलता और मान सम्मान पाता है :


FAIR DECISION

मित्रो !
यथोचित कारणों से असमर्थित किसी भी निर्णय की निष्पक्षता पर सबाल उठना स्वाभाविक है। कोई भी निर्णय निष्पक्ष होने के लिए स्वयं में स्वतंत्र रूप से पूर्ण होना चाहिए और निर्णय को विवाद से मुक्त होना चाहिए। 
It is but natural to question the fairness of a decision unsupported by adequate reasons. A decision, for being a fair decision, should be complete and self contained and decision should be free from any controversy.



WHILE TAKING RISK


मित्रो !
हमें जीवन में जोखिम सोच समझ कर उठाना चाहिए। छोटी प्राप्तियों के लिए बड़ा जोखिम नहीं उठाना चाहिए। जीवन या जीवन से कम मूल्यवान किसी वस्तु की प्राप्ति के लिए जीवन का जोखिम उठाना बुद्धिमानी नहीं है। जोखिम उठाना से पहले हमें यह विचार करना चाहिए कि क्या प्राप्त करने के लिए हम क्या खोने का जोखिम उठाने जा रहे हैं।

अप्रिय सन्देश दिए जाने की कला :Art of Communicating Unpleasant Message

मित्रो ! 
       हमें अपने व्यावहारिक जीवन में कभी - कभी अन्य व्यक्तियों को अप्रिय सन्देश देने होते हैं अथवा कोई ऐसी बात बतानी होती है जो सुनने वाले के हितों के विरुद्ध होने से उसे अच्छी न लगे, वह ऐसी बात बताने का वह बुरा मान बैठे और हमारे और उसके बीच संबंधों में खटास आ जाय। कुछ सन्देश या बातें ऐसी हो सकतीं हैं जिनके सुनने पर श्रोता को आघात पहुंचे। ऐसी स्थिति में हमें तथ्य को बताने में आवश्यक सावधानी बरतनी चाहिए ताकि श्रोता के स्वास्थ्य या हमारे और श्रोता के बीच मधुर संबंधों पर यदि संभव हो तब कोई प्रतिकूल प्रभाव न पड़े अथवा कम से कम प्रतिकूल प्रभाव पड़े।
      कुछ लोग किसी अपने परिचित, हितैषी या सम्बन्धी से ऐसी बात, जिसके सुनने पर ऐसा परिचित, हितैषी या सम्बन्धी उत्तेजित हो सकता है अथवा बुरा मान सकता है, कहने से पूर्व शब्दों "बुरा न माने तो एक बात कहूँ" का प्रयोग करते हैं। थोड़ा रूककर यह भी कह देते है "अच्छा छोड़िये, रहने दीजिये" . इसकी प्रतिक्रिया श्रोता पर यह होती है कि वह कड़ुई बात सुनने के लिए मानसिक रूप से तैयार हो जाता है और स्वयं बात बताये जाने का अनुरोध करने लगता है। ऐसी स्थिति में वक्ता और श्रोता के मध्य मधुर संबंधों पर या तो कोई प्रभाव नहीं पड़ता अथवा अस्थायी रूप से नगण्य प्रभाव पड़ता है।
    इसी प्रकार किसी के प्रियजन की मृत्यु का सीधे समाचार दिए जाने से बचा जाता है। अप्रत्यक्ष रूप से इस प्रकार वार्ता की जाती है कि सुनने वाला समझ जाय कि उसके प्रियजन की मृत्यु हो गयी है। इस सम्बन्ध में मुझे बचपन में पढ़ी एक कहानी याद आ रही है। एक राजा ने अपने बूढ़े हाथी की देखभाल के लिए चार सेवक रख दिए और उनसे कहा कि उनमें से प्रत्येक दिन एक व्यक्ति उसे (राजा को) हाथी के स्वास्थ्य के बारे में बताएगा किन्तु हाथी के मरने की बात नहीं कहेगा। जो सेवक हाथी के मरने की बात कहेगा उसे मृत्यु दंड मिलेगा। सेवकों में से बारी-बारी से एक सेवक प्रतिदिन राजा के पास जाता और राजा को हाथी के स्वास्थ्य के बारे में बताता। कुछ दिन बाद हाथी मर गया। उस दिन जिस सेवक को हाथी के स्वास्थ्य के बारे में राजा को बताना था वह और अन्य दो सेवक मृत्यु दंड के भय से राजा के पास जाने को तैयार नहीं हुए। चौथा व्यक्ति राजा के पास जाने को तैयार हो गया। वह राजा के पास गया। यथोचित अभिवादन के बाद बोला "महाराज ! आज तो हाथी का विचित्र हाल है, वह न तो उठता है न ही बैठता है, न ही सांस लेता है, न कुछ खाता है न ही पानी पीता है.." इतना सुनकर राजा बोल पड़ा की क्या हाथी मर गया। इस पर सेवक बोला "महाराज ! यह मैं नहीं कहता, ऐसा आप कह रहे हैं" यह सुनकर राजा उस सेवक पर प्रसन्न हुआ और उसे पुरष्कृत किये जाने का आदेश दिया।
    यद्यपि उक्त कहानी "वाक-पटुता" से सम्बंधित है किन्तु यह परोक्ष रूप में मृत्यु का सन्देश देने का ऐसा तरीका बताती है जिससे सुनाने वाला क्रोधित या दुखी नहीं हुआ।
   विभिन्न परिस्थितियों के लिए भिन्न-भिन्न प्रकार के संवादों का प्रयोग किया जा सकता है। संवादों का उद्देश्य श्रोता को अप्रिय सुनाने के लिए मानसिक रूप से तैयार करने का होना चाहिए।




क्रोध पर नियंत्रण : How to Control Anger

मित्रो !
    जीवन में सफल होने के लिए क्रोध पर नियंत्रण पाना आवश्यक है।

       If we want to avoid anger, we should exercise tolerance and patience. We should learn to forgive others for their mistakes.




प्यार की खैरात

मित्रो !
दूसरों को प्यार की खैरात देने वाले कभी खुशी के मोहताज नहीं होते।


मित्र और शत्रु बनाने में वाणी की भूमिका



मित्रो !
शायद वाणी सबसे बड़ा माध्यम है जिसके द्वारा हम बाह्य जगत से जुड़ते हैं। मधुर वाणी में लिपटे अच्छे और सृजनात्मक विचार मधुर वाणी बोलने वाले और सुनने वाले, दोनों के लिए हितकारी होते है, वहीं कटु वाणी में लिपटे दूषित और विध्वंशक विचार ऐसी वाणी बोलने वाले और सुनने बाले, दोनों के लिए अहितकारी होते है। अच्छे और सृजनात्मक विचारों वाले संवाद भी यदि कटु वाणी में बोले जांय तब सुनने वाले पर ऐसे संवादों का प्रभाव कम पड़ता है। मित्र और शत्रु बनाने में वाणी की महत्वपूर्ण भूमिका होती है

स्वर (Tone) वाणी का आभूषण होता है। कर्कश स्वरों वाली वाणी की अपेक्षा मधुर स्वरों वाली वाणी अधिक गहरा प्रभाव छोड़ती है। कर्कश आवाज को मधुर आवाज में तो नहीं बदला जा सकता किन्तु कर्कश आवाज की तीव्रता को उचित शब्दों के चयन से कम किया जा सकता है। इस उद्देश्य से संवाद के साथ आदर, स्नेह या मैत्री सूचक शब्द, जो भी उपयुक्त हों, जोड़कर कर्कश आवाज के प्रभाव को कम किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त कर्कश स्वर वाले व्यक्ति को संवाद लम्बा न खींच कर संक्षिप्त रखना चाहिए और सीधी तथा सरल भाषा का प्रयोग करना चाहिए।
हलाहल = Poison


आस्था का पत्थर : IDOL WORSHIP



मित्रो !
एक कथा के अनुसार महाभारत काल में द्रोणाचार्य कौरवों और पाण्डवों के धनुर्विद्या के गुरु थे। महाभारत में वर्णित कथा के अनुसार एकलव्य नाम का एक युवक धनुर्विद्या सीखने के उद्देश्य से द्रोणाचार्य के आश्रम में आया किन्तु निषादपुत्र होने के कारण द्रोणाचार्य ने उसे अपना शिष्य बनाना स्वीकार नहीं किया। निराश हो कर एकलव्य वन में चला गया। उसने द्रोणाचार्य की एक मिटटी की मूर्ति बनाई और उस मूर्ति को गुरु मान कर धनुर्विद्या का अभ्यास करने लगा। एकाग्रचित्त से साधना करते हुये अल्पकाल में ही वह धनु्र्विद्या में अत्यन्त निपुण हो गया। एक दिन पाण्डव तथा कौरव राजकुमार गुरु द्रोण के साथ आखेट के लिये उसी वन में गये जहाँ पर एकलव्य आश्रम बना कर धनुर्विद्या का अभ्यास कर रहा था। राजकुमारों का कुत्ता भी था। संयोगवश कुत्ता भटक कर एकलव्य के आश्रम में जा पहुँचा। एकलव्य को देख कर वह भौंकने लगा। कुत्ते के भौंकने से एकलव्य की साधना में बाधा पड़ रही थी अतः उसने अपने बाणों से कुत्ते का मुँह बंद कर दिया। एकलव्य ने इस कौशल से बाण चलाये थे कि कुत्ते को किसी प्रकार की चोट नहीं लगी। कुत्ते के लौटने पर कौरव, पांडव तथा स्वयं द्रोणाचार्य यह धनुर्विद्या का यह कौशल देखकर आश्चर्य चकित रह गए और बाण चलाने वाले की खोज करते हुए एकलव्य के पास पहुँचे। उन्हें यह जानकर और भी आश्चर्य हुआ कि द्रोणाचार्य को मानस गुरु मानकर एकलव्य ने स्वयं ही अभ्यास से यह विद्या प्राप्त की है। एकलव्य ने द्रोणाचार्य को प्रणाम किया और आशीर्वाद माँगा। इस पर द्रोणाचार्य ने एकलव्य से उसका हाथ का अंगूठा गुरु दक्षिणा के रूप में मांग लिया। एकलव्य ने बिना कोई देर किये अपना अंगूठा काट कर द्रोणाचार्य को भेंट कर दिया।
इस कथा पर यदि हम ध्यान दें तो हम पाते हैं कि यह एकलव्य की आस्था ही थी कि वह मिटटी के पुतले में अपने गुरु द्रोणाचार्य को देखता था और उनकी देख-रेख में धनुर्विद्या का अभ्यास करता था। प्रश्न यह उठता है कि जब आस्था होने पर मिटटी की मूर्ति में गुरु की अनुभूति की जा सकती है तब आस्था होने पर ईश्वर, जो सर्वत्र विध्यमान है की पत्थर की मूर्ति में अनुभूति क्यों नहीं की जा सकती।
मेरा विचार है की ईश्वर एक आस्था है जिसे सजीव या निर्जीव किसी भी वस्तु में व्यक्त किया जा सकता है। आस्था का कोई आकार या स्वरुप नहीं होता। यह शून्य में भी व्यक्त की जा सकती है . निर्जीव या सजीव जिसमें आस्था व्यक्त की जा सकती है किसी भी रूप या आकार में हो सकता है। बिना आस्था के पत्थर पत्थर है और जिस पत्थर में आस्था है वह पत्थर ईश्वर का रूप है।

आस्था का कमजोर होना

मित्रो !
जरा सोचो।


जीवित और मृत शरीर में अन्तर



मित्रो !
किसी जीवित व्यक्ति के शरीर में जो अंग पाये जाते हैं वही अंग उसकी मृत्यु होने पर मृत शरीर में रहते हैं तब यह विचारणीय हो जाता है कि वह क्या चीज है जिसके शरीर में न रहने से मृत्यु हो जाती है। सामान्य बोल-चाल की भाषा में हम कह देते हैं कि अमुक व्यक्ति ने प्राण त्याग दिए हैं। शरीर में वह क्या चीज है जिसके न रहने से हमारा दिमाग और दिल काम करना बंद कर देता है? यह गूढ़ प्रश्न हैं। ऐसे में हम कल्पना कर सकते हैं कि हमारे शरीर में शरीर के अंगों के अतिरिक्त कोई ऐसी चीज है जो हमारे जन्म के समय हमारे शरीर में प्रवेश करती है और हमारे शरीर को जीवन्त बनाती है। यही चीज मृत्यु के समय हमारे शरीर को छोड़ देती है।
"मैं" एक ऐसा शब्द है जिसे बोलने वाला केवल अपने को संदर्भित करने के लिए ही प्रयोग कर सकता है। इसे व्यक्ति जीवित रहते ही बोल सकता है अतः कोई व्यक्ति इसका प्रयोग जन्म के उपरान्त और मृत्यु से पूर्व ही कर सकता है। शब्द "मेरा" व्यक्ति के संबंधों और अधिकारों को दर्शाने के लिए प्रयोग किया जाता है। यदि हम किसी व्यक्ति से उसके शरीर के किसी अंग के बारे में पूछें कि यह क्या है तब वह उत्तर देगा कि यह मेरा हाथ है, यह मेरा पाँव है, यह मेरी उँगली है, आदि-आदि। किसी व्यक्ति के शरीर में जो भी अंग हैं उन सभी पर "मैं" का अधिकार होगा। शरीर में पदार्थ के रूप में (in material form) जो कुछ भी होता है उस पर स्वामित्व "मै" का होता है। जीवित शरीर इस "मै" जो पदार्थ रूप में नहीं होता और शरीर के अंग जो पदार्थ रूप होते हैं से बना होता है। मृत शरीर में केवल शरीर के अंग ही होते हैं जो पदार्थ रूप में होते हैं। इस प्रकार मृत शरीर "मै" विहीन शरीर होता है। तब प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि शरीर के अंदर वह कौन और कहाँ है जो पूरे शरीर पर अपना अधिकार जताता है? निश्चित रूप से वह पदार्थ रूप में नहीं है अन्यथा उसके सम्बन्ध में भी कहा जा सकता "यह मैं हूँ". यह अदृश्य है और शरीर में जीवन का कारण है।
उपर्युक्त विवेचन के आधार पर हम कह सकते हैं कि -
जीवित शरीर और मृत शरीर में यह अन्तर होता है कि जीवित शरीर के अन्दर एक ऐसा "मै" निवास करता है जो जन्म के समय शरीर को क्रियाशील कर देता है और जीवन पर्यन्त शरीर को क्रिया विहीन नहीं होने देता। "मैं" के शरीर छोड़ देने पर शरीर क्रिया विहीन हो जाता है और ऐसा शरीर मृत शरीर कहलाता है। प्राणी के शरीर और बाह्य जगत से सम्बन्धों का कारण भी "मैं" ही है।

बुद्धि का समय पर सही उपयोग




मित्रो !
हमारा शरीर आँख, कान, नाक, त्वचा और जिव्हा पाँच ज्ञानेन्द्रियों द्वारा बाहर से इनपुट्स लेता है और पाँच कर्मेन्द्रियों हाथ, पैर, वाणी, जननेन्द्रिय और गुदा द्वारा बाह्य कार्य करता है। ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा हम रूप, ध्वनि, गन्ध, स्पर्श और स्वाद इनपुट्स के रूप में लेते हैं। इन सभी इन्द्रियों के ऊपर मन (Mind) शरीर के अंदर ग्यारहवीं इन्द्रिय मानी गयी है। इसे अन्तः इन्द्रिय भी कह सकते हैं। 
हमारा मन विभिन्न प्रकार के विचारों, जिनमें हमारी इच्छाएं भी शामिल हैं, की उत्पत्ति का स्त्रोत है। इसमें विभिन्न प्रकार के विचार उत्पन्न होते रहते हैं। यह विचार मन द्वारा बुद्धि (Brain) को प्रेषित किये जाते हैं। बुद्धि मन से प्राप्त विचारों पर कार्यवाही करने का निर्णय लेता है। इस स्तर पर बुद्धि किसी विचार को अस्वीकार भी कर सकती है। जिस विचार पर कार्यवाही का निर्णय बुद्धि द्वारा लिया जाता है वह कार्यवाही या तो शरीर के अंदर होनी होती है या फिर शरीर के बाहर। शरीर के अंदर होने वाली कार्यवाही के लिए बुद्धि अन्दर के सम्बंधित अंगों को सन्देश / निर्देश भेजता है, शरीर के बाहर कार्यवाही के लिए सम्बंधित कर्मेन्द्रियों को सन्देश / निर्देश भेजता है। जिन विचारों पर कार्यवाही नहीं किये जाने का निर्णय बुद्धि लेती है वे नष्ट हो जाते हैं। विचारों में हमारी इच्छायें भी शामिल होतीं है।
मेरा विचार है कि यदि हम बुद्धि का समय से समुचित उपयोग करें तब हम अपने को अवांछित कार्य करने, लोभ-लालच, क्रोध, हिंसा, अहंकार, आदि से रोक सकते हैं। हमें अपने ज्ञान के भंडार को बढ़ाना चाहिए और इस पर विचार करना चाहिए कि किस प्रकार के विचारों पर कार्यवाही करना उचित है और किस प्रकार के विचारों पर कार्यवाही करना अनुचित है। मेरा मानना है कि हमारी बुद्धि में इस ज्ञान के भण्डार से बुद्धि को उचित निर्णय लेने में आवश्यक सहायता मिलेगी।


Soul and Supreme Soul



मित्रो !
हमारा शरीर आत्मा के बिना निर्जीव है। आत्मा के बिना शरीर में कोई क्रिया नहीं हो सकती। इसे जीवात्मा कहते हैं। आत्मा शरीर के विषय में सब कुछ जानता है, शरीर के बाहर जगत की जानकारी उसको नहीं होती। जीव अपनी प्रकृति के तीन गुणों सत्व, रज और तम से प्रेरित होकर मन, बुद्धि से कर्म करता है। किन्तु मिथ्या अहंकार के प्रभाव में जीवात्मा यह मानता है कि वह शरीर का स्वामी है, शरीर द्वारा किये जा रहे कार्यों का वह स्वयं कर्ता है और कर्म फलों का स्वयं भोक्ता है। इसी कारण जीवात्मा सुख-दुःख और अन्य अनुकूल और प्रतिकूल परिणामों का अनुभव करता है। यही आत्मा मृत्यु के समय शरीर का त्याग कर देता है तथा जन्म के समय नए शरीर को धारण करता है।
परम आत्मा अर्थात परमात्मा सर्व-विद्यमान, सर्व-ज्ञाता और सर्व-शक्तिमान है। इस कारण से हमारे शरीर में यह परमात्मा भी निवास करती है। यह शरीर को जानने के साथ-साथ समस्त जगत के बारे में जानती है, यह प्रत्येक जीव के अंदर भी है और प्रत्येक जीव के शरीर के बाहर अन्य समस्त स्थानों पर भी है। यह शरीर, प्रकृति के गुणों, मन, बुद्धि और इन्द्रियों के प्रभाव में न आकर स्वतंत्र रहती है। वह जीव से किसी भी प्रकार बद्ध नहीं है, शरीर द्वारा किये जा रहे कार्यों और भोगे जा रहे कर्म-फलों का दृष्टा मात्र होती है। यह जन्म और मृत्यु से पर है। परमात्मा अकर्ता, अभोक्ता , अपरिवर्तनशील,शाश्वत, अजन्मा, अविनाशी, और समस्त विश्वो का सार है।
श्रीमदभगवद गीता के अध्याय 13 के श्लोक 1 में अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण से क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के बारे में जिज्ञासा प्रकट की है। भगवान श्री कृष्ण ने इसका उत्तर इसी अध्याय के श्लोक 2 में निंम्प्रकार दिया है -
इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिदीयते।
एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः।।
हे कुन्ती पुत्र ! यह शरीर क्षेत्र कहलाता है और इस क्षेत्र को जानने वाला क्षेत्रज्ञ कहलाता है।
श्लोक ३ में भगवन श्री कृष्ण ने अपने को भी सभी शरीरों का ज्ञाता बताया है। यह श्लोक निम्नप्रकार है -
क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत।
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मातम मम।।
अर्थ : हे भारतवंशी ! समस्त शरीर रूपी क्षेत्रों में मुझको निश्चय ही मुझको भी क्षेत्र का ज्ञाता जानों। इस शरीर और इसके ज्ञाता को जान लेना ज्ञान कहलाता है। ऐसा मेरा मत है।
यहां पर यदि हम ध्यान दें तब हम देखते हैं की भगवान के मुख से शब्द "चापि मां" (निश्चय ही मुझको भी ) बोले गए हैं। "भी" शब्द से स्पष्ट है कि भगवान श्री कृष्ण द्वारा किसी और को भी शरीर का ज्ञाता माना गया है। भगवान जो कि परमात्मा हैं के अतिरिक्त शरीर को जानने वाला अन्य ज्ञाता जीव की अपनी आत्मा होती हैं। इस प्रकार जीवित शरीर में परमात्मा और जीवात्मा दो आत्मायें होतीं हैं।

Positive Energy in Odd Times

POSITIVE ENERGY IN ODD TIMES


विवाहित जीवन में नोंक - झोंक




मित्रो !
एक दूसरे को प्यार करने वाले पति-पत्नी के मध्य होने वाले विवादों के समाप्त होने में समय भले ही लग जाय किन्तु उनका अन्त अवश्य होता है और प्रत्येक बार अंत परिस्थिति सामान्य होने के साथ ही होता है। फर्क यह पड़ता है कि विवाद प्रारम्भ होने से समाप्त होने के मध्य की समयावधि पति-पत्नी को प्यार के लिए मिली कुल अवधि में से कम हो जाती है और इतना समय प्यार के पलों की जगह तनाव के क्षणों में बदल जाता है, विवाद बड़ों के संज्ञान में आने पर उनका दिल दुखता है और बच्चों के सामने विवाद होने पर उनके मन मष्तिष्क पर बुरा प्रभाव पड़ता है।
पति-पत्नी को प्रयास करना चाहिए कि उनके बीच विवाद की स्थिति ही न आये, यदि विवाद की स्थिति आती ही है तब उन्हें यह समझ कर कि जो चीज बिना कुछ खोये पायी जा सकती है वही चीज बहुत कुछ खोकर पाने में बुध्दिमानी नहीं है, विवाद शीघ्र समाप्त करना चाहिये। प्यार में अह्म का कोई स्थान नहीं होता अतः विवाद समाप्त करने में अहम् आड़े नहीं आना चाहिये।

ऐसी परिस्थिति में हम क्या करें ?



प्रिय मित्रो !
हम अपने प्रियजनों या शुभचिंतकों के साथ कोई अनुचित या अप्रिय व्यवहार नहीं करना चाहते किन्तु फिर भी कभी - कभी अनजाने में हम उनके प्रति अनुचित व्यवहार करते रहते हैं। दूसरी ओर हमारे प्रियजन या शुभचिंतक हमारे ऐसे अनुचित व्हवहार की शिकायत हमें दुःख पहुँचने की आशंका से नहीं करते। ऐसी परिस्थितयों में हमारे द्वारा किये जा रहे व्यवहार के औचित्य की जानकारी हमें नहीं हो पाती। ऐसी स्थिति से बचने के लिए यह कारगर हो सकता है कि हम अपने को अपने प्रियजन या शुभचिंतक के स्थान पर रखकर और प्रियजन या शुभचिंतक को अपने स्थान पर रखकर व्यवहार का विश्लेषण करते रहे। इससे हमें उचित या अनुचित व्यवहार की जानकारी मिल सकती है और हम अपने व्यवहार में सुधार कर सकते हैं ।

प्रकृति के तीन गुणों पर नियंत्रण - (एक)

मित्रो !
मनुष्य अपने जीवन में कभी ज्ञानी पुरुषों की भांति सात्विक व्यवहार करता है, अपने अन्दर संतुष्ट हुआ आनन्द का अनुभव करता है, कभी अत्यधिक मोह, अनियंत्रित इच्छा, लोभ, गहन उद्यम, सकाम कर्म से ग्रसित हुआ अनेक आकांक्षाओं और तृष्णाओं से भरा जीवन जीता है, प्रत्येक कर्म स्वार्थवश केवल फल के उद्देश्य से करता है. यदि कुछ दान, पुण्य करता भी है तब वह ऐसा कार्य स्वार्थ पूर्ति (कीर्ति, यश आदि की प्राप्ति) हेतु करता है, ऐसा व्यक्ति धन, ऐश्वर्य, यश, कीर्ति का भूखा होता है, काम, क्रोध और कृपालता भी दर्शाता है. कभी-कभी जीव अज्ञान से घिरा हुआ लोभ, अत्यंत आलस्य और अत्यधिक निद्रा से ग्रसित रहते हुये पागलों की तरह व्यवहार करता है।
उपर्युक्त प्रकार के आचरण इस कारण होता है कि प्रत्येक जीव के अन्दर सत्व, रज और तम के रूप में तीन गुण जन्म से ही असंतुलित मात्रा में विद्यमान रहते हैं। इन्हीं गुणों के प्रभाव में जीव उपर्युक्त भिन्न-भिन्न प्रकार का जीवन जीता है। जिस समय जीव के अंदर सत्व गुण की प्रधानता होती है उस समय अन्य दो गुणों रज और तम के प्रभाव दब कर रह जाते हैं और जीव सत्व गुण से प्रभावित हुआ सात्विकी आचरण करता है, जब सत्व और तम की अपेक्षा रज गुण की प्रधानता होती है तब जीव रज गुण के प्रभाव में आचरण करता है। जब सत्व और रज की तुलना में तम गुण की प्रधानता होती है तब जीव तम गुण से प्रभावित हुआ आचरण करता है। 
जिन लोगों ने रसायन शास्त्र (Chemistry) का अध्ययन किया है वे जानते हैं की पदार्थ के अपने गुण और गुणों का प्रभाव रखता है। हमारा स्थूल शरीर भी पंचमहाभूतों (आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी) से बना है। यह पंचमहाभूत और उनसे बना स्थूल शरीर भी पदार्थ हैं। अतः शरीर में गुण और गुणों के प्रभाव होना स्वाभाविक है। निर्जीव शरीर में गुण निष्क्रिय अवस्था में रहते हैं। जीवित शरीर में यह गुण सक्रिय अवस्था में होने से अपने प्रभाव दिखाते हैं। 
श्रीमद भगवद गीता के अध्याय 14 में इन गुणों का विस्तार से वर्णन हुआ है। कोई भी व्यक्ति अपने अंदर किसी गुण विशेष की प्रधानता बढ़ा सकता है और तम के प्रभाव से निकल कर रज या सत्व के प्रभाव में अपना जीवन जी सकता है। ऐसा करने के लिए पहले तो इन गुणों के बारे में जान लेना (ज्ञान प्राप्त करना) आवश्यक है, इस सम्बन्ध में भी ज्ञान प्राप्त करना आवश्यक है कि इन गुणों पर किन - किन चीजों का प्रभाव पड़ता है। उसके बाद आवश्यक नियन्त्रण के बाद इन गुणों के प्रभाव में परिवर्तन लाया जा सकता है। आलस्य, निद्रा, क्रोध, लोभ, आदि तथा अन्य अवांछित प्रकार के आचरण से छुटकारा पाया जा सकता है। बच्चों के आचरण में भी परिवर्तन लाया जा सकता है। उसी प्रकार शरीर में उपस्थित सत्व, रज और तम में परिवर्तन से विकारों में परिवर्तन लाया जा सकता है। यह गुणों की प्रधानता में परिवर्तन के कारण ही सम्भव हुआ कि लुटेरे वाल्मीकि महर्षि वाल्मीकि बन गए और उन्होंने प्रसिद्द ग्रन्थ रामायण की रचना की, कपिलवस्तु के राजकुमार सिद्दार्थ गौतम बुद्धा बन गए, वासना में लिप्त तुलसी दास गोस्वामी तुलसी दास बन गए और उन्होंने रामचरित मानस की रचना की। ऐसे अनेक उदहारण इतिहास में मिलेंगे जहाँ गुणों के प्रभावों में परिवर्तन से व्यक्तिव में आमूल - चूल परिवतन हुये हैं। 
आयुर्वेद चिकित्सा पद्ध्यति शरीर में वायु, कफ और पित्त की उपस्थिति पर आधारित होती है। स्वस्थ शरीर में वायु, कफ और पित्त का साम्यावस्था में होना आवश्यक होता है। जब इनमें साम्यवस्था बिगड़ती है और किसी की प्रधानता बढ़ जाती है तब हम किसी बीमारी से ग्रसित होकर अस्वस्थ हो जाते हैं। जिस प्रकार आयुर्वेदा चिकित्सा पद्ध्यति में किसी रोग का कारण मानव शरीर में वायु, कफ या पित्त में से किसी एक की अधिकता होना होता है, उसी प्रकार मनुष्य का किसी समय सतोगुणी, रजोगुणी या तमोगुणी आचरण उसके शरीर में पाये जाने वाले प्रकृति के तीन गुणों सत्व, रज और तम में से सम्बंधित गुण की प्रधानता हो जाने के कारण होता है।


जीवन स्तर के सुधार की पहल

प्रिय मित्रो!
किसी व्यक्ति के द्वारा निकृष्ट श्रेणी का जीवन जिए जाने का एक कारण यह हो सकता है कि ऐसा जीवन जीने वाले को यह पता ही न हो कि वह निकृष्ट श्रेणी का जीवन जी रहा है, ऐसा जीवन जीने का दूसरा कारण यह हो सकता है कि ऐसा जीवन जीने वाले को यह ज्ञात न हो कि वह जो जीवन जी रहा है उससे बेहतर जीवन जीने का विकल्प उपलब्ध है और वह वर्तमान में जीवन जीने के तरीके से छुटकारा पाकर अच्छी श्रेणी का जीवन जी सकता है, निकृष्ट श्रेणी का जीवन जीने का तीसरा कारण यह हो सकता है कि निकृष्ट श्रेणी का जीवन जीने वाले के पास जीवन स्तर को सुधारने के लिए आवश्यक संसाधन न हों। निकृष्ट श्रेणी का जीवन जीने का चौथा और महत्वपूर्ण कारण यह हो सकता है कि ऐसा जीवन जीने वाले के अन्दर जीवन स्तर के परिवर्तन के प्रति और अच्छी श्रेणी का जीवन जीने के प्रति इच्छा शक्ति का अभाव हो।
संक्षेप में हम कह सकते हैं कि जीवन के स्तर को सुधारने के लिए ज्ञान (शिक्षा), संसाधन और इच्छा शक्ति की आवश्यकता होती है। यदि हम चाहते हैं कि निम्न श्रेणी का जीवन जी रहे किसी व्यक्ति, वर्ग या समुदाय के लोगों का जीवन स्तर सुधरे तब हमें ऐसे व्यक्ति, वर्ग या समुदाय के लोगों के बारे में अध्ययन करके पता लगाना होगा कि उनके पास उपर्युक्त तीन चीजों में से किन चीजों का अभाव है और इसके पश्चात हमें ऐसी कमी को पूरा करना होगा।


क्योंकि क्रोध के परिणाम कहीं अधिक दुखदायी हो सकते हैं


ALL RELIGIONS ARE EQUAL : MEANING OF सभी धर्म समान होने का अभिप्राय

Friends!
            When we say that all religions are equal, it does not necessarily mean that -
(a) each religion consists of same number of principles;
(b) all principles of one religion are identical to principles of any other religion; and
(c) there is no conflict in any two principles of any two religions.
         It simply means that in spite of any difference in between principles of any two religions, persons following two different religions should not be discriminated on account of following different religions.

सभी धर्म समान होने का अभिप्राय  





बिना कुछ खोये बहुत कुछ मिले तो क्यों न लें?



प्रिय मित्रो !
हम लोगों में से बहुत से लोग ऐसे होंगे जो पानी, बिजली, गैस तथा अन्य अनेक चीजों का प्रयोग करते समय उनके दुरुपयोग पर ध्यान नहीं देते अथवा उनके उपयोग में मितव्यता नहीं वर्तते। भोजन पकाते समय आवश्यकता से अधिक भोजन पका लेते हैं, भोजन लेते समय अपनी थाली में आवश्यकता से अधिक रख लेते हैं और बाद में थाली में छोड़ देते हैं जो कूड़े के साथ फेंक दिया जाता है। बिजली पानी के स्त्रोत खुले छोड़ देते हैं। हम अपने उपयोग के लिए प्रकृति से अनेक चीजें लेते हैं किन्तु उनकी भरपाई पर ध्यान नहीं देते।
कुछ लोग जो बिजली, पानी के स्त्रोत खुले छोड़ देते हैं से अगर उन्हें सचेत किया जाय तब वे कहते हैं क्या फर्क पड़ता है वह ईमानदारी से बिल का भुगतान करते हैं। आप सोंचें तो बहुत फर्क पड़ता है, हमारे किसानों को या गाँव में रहने वाले बहिन - भाइयों को विजली इसलिए नहीं मिल पाती की बिजली की कमी है। इस स्थिति से शहर भी अछूते नहीं हैं। घरेलू उपयोग की बिजली की कटौती होती है। हमारे उद्योगों को बिजली नहीं मिल पाती, उत्पादन प्रतिकूल रूप में प्रभावित होता है। अन्य ईन्धन महंगा होने से उत्पाद का मूल्य बढ़ाने से महंगाई बढ़ती है। पानी की स्थिति अच्छी नहीं है, वाटर लेबल गिरता जा रहा है।
अगर हम मितव्यता बरतें और दुरुपयोग रोकें तब केवल हमारे खर्चे में ही कमी नहीं आएगी, संसाधनों की बचत हो सकेगी जिसका उपयोग हम आगे कर सकेंगे। इसका एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू भी है। इस काम को हम तभी कर सकेंगे जब हम संजीदा होंगे, किसी भी वस्तु का प्रयोग करते समय हमें हर बार सोचना पड़ेगा कि हमें दुरुपयोग रोकना है और मितव्यता बरतनी है। इससे आपकी सोच में बहुत बड़ा परिवर्तन आएगा। इसका परिणाम यह होगा कि हम अन्य क्षेत्रों में भी अनुशासित और संजीदा होकर कार्य करेंगे। इससे हमारी सोच और चरित्र भी बदलेगा।
मेरा यही मानना है कि यदि बिना कुछ खोये बहुत कुछ मिल रहा हो तब बहुत कुछ लेने में विलम्ब नहीं करना चाहिए।

मा फलेषु कदाचन:

मित्रो !
श्रीमद भगवद गीता के अध्याय (chapter) 2 के श्लोक 47  में भगवन श्री कृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि  मनुष्य कौन सा कर्म (work / act / action) करे और कौन सा कर्म न करे इसका निर्णय लेना उसके अधिकार क्षेत्र में है किन्तु कर्म के फल के चयन करने (selection of good result or bad result, success or failure) का अधिकार उसे प्राप्त नहीं है। ऐसा इसलिए कहा गया है ताकि अनुचित कर्म करने वाला या उचित प्रकार से कर्म न करने वाला अच्छा फल (अच्छा परिणाम) का चयन (selection)  न कर सके। श्लोक की पहली पंक्ति का आशय यही है। पूरा श्लोक निम्नप्रकार है -

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।

मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥४७॥



मनुष्य की कर्म करने की स्वतन्त्रता

प्रिय मित्रो !
क्या मनुष्य ईश्वर के द्वारा चाहा गया कर्म करता है? क्या हम सभी से सभी गलत या सही कर्म ईश्वर करवाता है? ये महत्वपूर्ण प्रश्न हैं। श्रीमद भागवद गीता के अध्याय २ के श्लोक ४७ के अनुसार कर्म करने का अधिकार मनुष्य का है। अगर कर्म के चयन करने और कर्म करने का अधिकार ईश्वर द्वारा मनुष्य को न दिया गया होता और प्रत्येक कार्य का चयनकर्त्ता और कर्त्ता स्वयं ईश्वर रहा होता तब मनुष्य को मन, बुद्धि, ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों की कोई आवश्यकता नहीं रही होती।
मनुष्य प्रकृति के तीन गुणों सत्व, रज और तम, जो उसके जन्म के समय से ही उसके शरीर में रहते हैं, से प्रेरित होकर स्वयं उचित-अनुचित कार्य करता है। यहां प्रकृति से तात्पर्य प्राणी के जीवित शरीर में जीवात्मा को छोड़ कर जो कुछ भी है से है। मनुष्य अपने द्वारा किये जाने वाले कर्मों का चयन स्वयं करता है और चयनित कर्म का कर्त्ता भी वह स्वयं है। ज्ञान प्राप्त करना भी मनुष्य का कर्म है। क्या सही है और क्या गलत है का निर्धारण ज्ञान के आधार पर किया जा सकता है।
श्रीमद् भागवद गीता के उक्त श्लोक में शब्दों "मा फलेषु कदाचन" का प्रयोग हुआ है। वैसे तो यह जन्म मृत्यु के बंधन से मुक्त होने के लिए निष्काम कर्म करने के सम्बन्ध में है किन्तु आधुनिक जीवन में हमें यह नहीं मानना चाहिए कि हम कर्म करते समय लक्ष्य या उद्देश्य को ध्यान में न रखें। निष्काम कर्म करने के पीछे भी एक उद्देश्य होता है। जीवन निर्वाह के लिए किये जाने वाले कर्मों के पीछे भी उद्देश्य होता है। निष्काम कर्म करने वाले को भी जीवन निर्वाह के लिए कर्म करने होते हैं। इन शब्दों से यह समझना उचित होगा कि कर्म के बदले फल का चयन करने का अधिकार मनुष्य को नहीं है। यदि फल के चयन करने का अधिकार मनुष्य के पास होता तब कोई व्यक्ति, जो किसी कार्य को आधा -अधूरा करता है, भी अज्ञानतावश या लालचवश उस परिणाम का अपने लिए चयन कर लेता जो सफलतापूर्ण पूर्ण कार्य करने वाले को प्राप्त होता है।
जीव के रूप में मनुष्य कर्मों का कर्त्ता भी है और कर्म के अनुरूप किये गए कर्म के फलों का भोक्ता भी है।


जीवात्मा का कर्म और कर्म-फल में बँधना

मित्रो ! 
      जब कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति द्वारा किये गए किसी कार्य का स्वयं को कर्त्ता (doer / performer) मानकर कार्य करने का श्रेय (Credit) स्वयं ले लेता है तब कार्य के फलस्वरूप मिलने वाले दंड (punishment) या पारितोषक (reward) को लेने से इन्कार (refuse) नहीं कर सकता।  जीवात्मा से क्रियाशील  हुए (activated) मनुष्य का शरीर कर्म तो स्वयं करता है किन्तु जीवात्मा मिथ्या (false / untrue) रूप में ऐसे कर्म का कर्त्ता स्वयं को मान लेता (admits / accepts) है और इस कारण उसे कर्म के फलों का उपभोक्ता बनना पड़ता है। इस प्रकार जीवात्मा कर्मों का कर्त्ता और कर्म - फलों (results of actions ) का भोक्ता (user) बन जाता है। 



सत्य के लिये प्रमाण आवश्यक नहीं


प्रिय मित्रो!
ऐसा विश्वास या धारणा, जिससे हमें अपने चरित्र निर्माण में सहायता मिलती हो, समाज को एक सही दिशा मिलती हो और किसी का अहित न होता हो, को, उसके स्त्रोत और सत्यता पर तर्क या परीक्षण किये बिना, सत्य मान कर अपना लेना चाहिये। जो सबके लिए हितकारी है वह असत्य कैसे हो सकता है?
अधिकाँश लोगों का विश्वास है कि ईश्वर है। वह समस्त श्रष्टि को नियंत्रित करता है और उसने हमारे लिए प्रकृति का सृजन किया है। वह दयालु है और हम सभी से सभी प्राणियों पर दयाकरने की अपेक्षा करता है। वह महान्यायधीश है, हमसे सभी के प्रति न्याय करने की अपेक्षा करता है। वह दीन -दुखियों और जरूरतमंदों की सहायता करता है और हमसे दीन - दुखियों और जरूरतमंदों की सहायता करने की अपेक्षा करता है। ऐसा सब कुछ हमारे लिए और समाज के लिए हितकारी है, किसी का अहित नहीं होता है। अतः इस पर तर्क किये बिना यह मान लेना चाहिए कि ईश्वर है एक सत्य है।
लोगों का विश्वास है कि मनुष्य द्वारा किये गए सभी भले - बुरे कर्मों का फल उसे भोगना पड़ता है। इसे मान्यता देने से हम बुरे कर्मों के करने से बचते हैं। हम जानते हैं कि प्रत्येक क्रिया का क्रिया के अनुरूप परिणाम होता है। अतः हम सोच सकते हैं कि बुरे कर्म का परिणाम भी बुरा होगा। बुरा परिणाम हमारे और समाज के लिए अहितकर होगा। ऐसे विश्वास से हमारा चरित्र विकास होता है, हम बुरे कर्म के दंड से बचते हैं। समाज अपराधों से बचता है और सभ्य समाज का निर्माण होता है। यह सब हमारे और समाज के लिए हितकारी है। अतः इस धारणा कि मनुष्य द्वारा किये गए सभी भले - बुरे कर्मों का फल उसे भोगना पड़ता है, पर बिना कोई तर्क किये इसे हमें सत्य मान लेना चाहिए।

विकल्प तलाशें, बेहतर विकल्प अपनायें


मित्रो !
जब आप बिना सोचे विचारे कोई कार्य प्रारम्भ कर देते हैं अथवा किसी क्रिया के विरुद्ध बिना कुछ सोचे अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं तब आप उनमें से ही कोई विकल्प प्रयोग में लाते हैं जो आपके मन और बुद्धि के स्टोर में होता है। ऐसे में यह आवश्यक नहीं होता जो विकल्प आप अपना रहे हैं वह उचित और बेहतर ही हो। थोड़ी देर के लिए आप इस पर विचार करें कि क्या उसी कार्य को करने के अन्य वैकल्पिक तरीके हो सकते थे अथवा प्रतिक्रिया व्यक्त करने के क्या और भी तरीके हो सकते थे? विचार करने पर आप इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि कार्य करने या प्रतिक्रिया व्यक्त करने के अन्य विकल्प भी उपलब्ध थे। इन परिस्थितियों में यह नितान्त सम्भव है कि आपने जो विकल्प अपनाया है उससे बेहतर विकल्प वह था जिसकी सम्भावना पर आपने विचार ही नहीं किया।
मान लीजिये आपका पुत्र या पुत्री और आपके मित्र का पुत्र या पुत्री एक ही कक्षा में पढ़ते हैं। दोनों ही पढ़ने में ठीक से ध्यान नहीं देते। परिणामतः परीक्षा में दोनों को ही कम अंक प्राप्त होते हैं। आपका पुत्र या पुत्री आपको और आपके मित्र का पुत्र या पुत्री आपके मित्र को रिजल्ट कार्ड दिखाते हैं। आप रिजल्ट कार्ड देखते ही प्रतिक्रियावश अपने पुत्र या पुत्री पर क्रोध उंडेल देते हैँ। बच्चा डर जाता है, आप से कटा कटा रहने लगता है। उसकी शिक्षा में सुधार तो नहीं होता उलटे उसका स्वास्थ्य ख़राब रहने लगता है। दूसरी ओर आपका मित्र रिजल्ट कार्ड देखकर तुरंत प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं करता वल्कि उन विकल्पों पर विचार करता है जिससे पुत्र या पुत्री की शिक्षा में सुधार लाया जा सके। वह अपने पुत्र या पुत्री पर क्रोधित नहीं होता, उसे पास बुलाकर प्यार से उसकी कठिनाई पूछता है और उसका मनोबल बढ़ाता है। बच्चा पढ़ने में ठीक से ध्यान देना प्रारंभ कर देता है और आगे परीक्षा में अच्छे अंक लाता है। यहां अंतर यह है की आपने विकल्पों पर विचार नहीं किया, आपके मन और बुद्धि के पास क्रोध का विकल्प था। इसलिए आप तुरंत क्रोधित हो गए जबकि आपके मित्र ने अन्य विकलों पर विचार किया और बेहतर विकल्प का प्रयोग किया। इस प्रक्रिया में आपके मन और बुद्धि में कोई परिवर्तन नहीं हुआ किन्तु आपके मित्र के मन और बुद्धि में ऐसी परिस्थिति के लिए नए विकल्प और जुड़ गए। इससे मित्र की आपके बुद्धि और मन का विकास भी हुआ।
एक अन्य उदहारण एक सड़क दुर्घटना में घायल सड़क पर पड़े सहायता के लिए पुकार रहे व्यक्ति का लेते हैं। आप अपनी मोटर साइकल से जाते हुए घटना स्थल पर उसकी सहायता करने के उद्देश्य से रुकते हैं। आपका मन और बुद्धि कहते हैं कि मोटर साइकल से आप घायल व्यक्ति को हस्पताल नहीं ले जा पाएंगे। ऑटो रिक्शा पर घायल व्यक्ति के साथ एक व्यक्ति घायल व्यक्ति को पकड़ने के लिए चाहिए। आप इरादा बदल देते हैं और उस घायल व्यक्ति को उसके हाल पर छोड़कर चल देते हैं। आपकी तरह ही एक अन्य आदमी मोटर साइकल से आता है। उसका मन भी वही विकल्प प्रस्तुत करता है किन्तु वह अन्य व्यक्ति सोचता है कि क्या अन्य कोई तरीका नहीं हो सकता? उसकी बुद्धि कहती है कि एम्बुलेंस को बुला सकते हो। दूसरा विकल्प प्रस्तुत करता है कि अपनी मोटर साइकल सड़क के किनारे ताला लगाकर खड़ी कर सकते हो और घायल व्यक्ति को ऑटो रिक्शा से हॉस्पिटल ले जा सकते हो। वह व्यक्ति सोचता है कि एम्बुलेंस आने में देर लगेगी। वह व्यक्ति मोटर साइकल सड़क के किनारे खड़ी करके एक ऑटो रिक्शा लेकर उस घायल व्यक्ति को ऑटो रिक्शा ड्राइवर की सहायता से ऑटो रिक्शा पर लिटाकर उसको सहारा देकर हॉस्पिटल पहुँचा देता हैं। वहाँ घायल व्यक्ति को दाखिल कर ऑटो रिक्शा से बापस आकर अपनी मोटर साइकल उठा लेता हैं। यहाँ अंतर कहाँ है? आपको जब दूसरे व्यक्ति द्वारा किये गए कार्य की जानकारी मिलती है तब आप सोचते हैं कि आप भी तो यह कर सकते थे किन्तु ये विचार आपके दिमाग में नहीं आये। जाहिर है कि आपने समस्त विकल्पों पर विचार नहीं किया। दूसरे व्यक्ति ने विकल्पों पर विचार कर बेहतर विकल्प चुना।
प्रत्येक व्यक्ति को मन और बुद्धि मिले हैं। नए विकल्प सोच सकता है, बुद्धि से विकल्पों का विश्लेषण कर अच्छे विकल्प को अपना कर कार्य कर सकता है। विभिन्न परिस्थितियों में नए विकल्पों का भंडार भी बढ़ा सकता है। सामान परिस्थिति आने पर मन और बुद्धि पूर्व के विकल्पों के साथ नए अर्जित विकल्पों को भी स्वतः प्रस्तुत करते हैं। इस प्रकार मन और बुद्धि का विकास होता रहता है।
मेरा मानना है कि कोई कार्य प्रारम्भ करने अथवा कोई प्रतिक्रिया व्यक्त करने से पूर्व हमें सम्भावित सभी विकल्पों पर विचार करना चाहिए और उपलब्ध विकल्पों में से जो सबसे अच्छा और व्यवहारिक विकल्प हो उसे क्रियान्वित करना चाहिए। ऐसा करके हम केवल अपना सुविचारित श्रेष्ठ निर्णय ही नहीं देते वल्कि अनेक त्रुटियों से भी बच जाते हैं और सबसे बड़ी उपलब्धि यह होती है कि ऐसा करने से हमारे मन और बुद्धि का विकास होता है।

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