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Wednesday, February 8, 2017

इंसानियत पीड़ित क्यों है : Why Humanity is Suffering

मित्रो !
        मैंने स्वयं से पूछा कि मानवता दम तोड़ती क्यों नजर आती है?, उत्तर मिला "आदमी स्वार्थी और उसका दिल छोटा हो गया हैइस छोटे दिल में भी इंसानी जज्बातों की जगह राग और द्वेष (passion and hatred) समाये हुए हैं।"
         किसी शायर ने ठीक ही कहा है:
रकवा तुम्हारे गाँव का मीलों हुआ तो क्या,

रकवा तुम्हारे दिल का तो दो इंच भी नहीं।


Sunday, May 29, 2016

वैश्विक स्तर पर स्वीकार्य धर्म : Globally Acceptable Religion

मित्रो !

     वस्तुतः मानवता ही ऐसा धर्म है जो विभिन्न धर्मों के अनुयायियों को एक सूत्र में बाँध सकता है। मेरा मानना है कि विभिन्न धर्मों के रहते विश्व स्तर पर मानवता को द्वितीयक अनिवार्य धर्म घोषित किये जाने और ऐसे धर्म की शिक्षा को अनिवार्य होने की सहमति बनायीं जानी चाहिए। 
        Humanity is indeed the only religion which can bind followers of all religions in a single thread. I am of the view that various religions remaining in existence, global consent should be developed for declaring "Humanity" as secondary mandatory religion and to make its education compulsory.




 

Sunday, May 8, 2016

धर्मों में इंसानियत के सिद्धांत सर्वोपरि

मित्रो !
     मेरे विचार से सभी धर्म इंसानियत के सिद्धांतों के पोषक हैं। ऐसी स्थिति में किसी भी धर्म में इंसानियत के सिद्धांतों के विपरीत कोई निर्देश या उपदेश उस धर्म का हिस्सा नहीं हो सकते। यदि हम ऐसे विपरीत निर्देशों को धर्म का भाग मानते हैं तब ऐसा मानने का कारण हमारी अज्ञानता है। 

     सभी धर्मों में इंसानियत को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गयी है। इस कारण हमें धर्म के किसी ऐसे उपदेश या निर्देश, जो प्रथम दृष्टया इंसानियत के सिद्धांत के विरुद्ध लगता हो, की व्याख्या इंसानियत के सिद्धांतों के अधीन रहकर या प्रतिबंधित मानकर करनी चाहिए। दुनियां के सभी लोगों को जोड़ने और विश्व शान्ति स्थापित करने का यही एक रास्ता है।

Wednesday, March 30, 2016

मानवता सर्वोपरि : Humanity Paramount

मित्रो !
     मेरे विचार से इंसानियत एक ऐसी चीज है जिससे किसी भी धर्म के अनुयायी को परहेज नहीं है। अनेक धर्मों को मानने वाले लोगों के देश में मेरा मानना है कि इंसानियत के दायरे में जो कुछ आता है उसे राष्ट्रीय संस्कृति का हिस्सा मानकर राष्ट्रीय चरित्र घोषित किया जाना चाहिए और इसके सिद्धांतों का उल्लंघन दंडनीय बनाया जाना चाहिए।