Saturday, May 9, 2015

दया धर्म का मूल है : Compassion, the base of a religion

मित्रो !
किसी अन्य प्राणी को कष्ट में देखने पर उसके कष्ट दूर करने के उद्देश्य से उसकी सहायता करने की जिस इच्छा का मनुष्य के हृदय में जन्म होता है, वह दया या करुणा कहलाती है। गोस्वामी तुलसी दास जी ने राम चरित मानस में एक दोहे में धर्म के मूल के विषय में निम्नप्रकार उल्लेख किया है :

दया धर्म का मूल है पाप मूल अभिमान। 

तुलसी दया न छोड़िये जब लगि घट में प्रान ।।
विचारणीय यह है कि यदि दया धर्म का मूल है तब धर्म को स्थायित्व प्रदान करने और सशक्त बनाये जाने के लिए प्रत्येक व्यक्ति, जो धर्म में विश्वास रखता है अथवा जो धर्म की उन्नति चाहता है अथवा जो अपने को धर्म का रक्षक कहता है, को अपने अन्दर के दया भाव को जागृत कर उसका प्रयोग धर्म की जड़ों के सशक्तिकरण के लिए करना होगा। सभी प्राणियों पर दया करते हुए असहाय दलितों, वंचितों और गरीबों पर विशेष दया दृष्टि से उनका दर्द कम करना होगा। कोरे भाषण देकर धर्म की पैरबी करने, दयनीय जीवन जी रहे लोगों को अल्पकालिक लालच देकर अपने समुदाय में शामिल करने अथवा उनके इर्द-गिर्द पहरेदार (watchmen) खड़े करने से धर्म की जड़ें मजबूत नहीं होंगी।

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