Saturday, March 4, 2017

जी0एस0टी0 में क्या इनका होगा अहित : GST

मित्रो !
       क्या देश के अनेक ऐसे बेरोजगार युवाओं, जो ई-कामर्स आपरेटरों द्वारा उपलब्ध कराये गए मार्किट प्लेस का उपयोग कर हस्त-शिल्प, रेडीमेड गारमेंट्स या अन्य वस्तुएं, क्षेत्र विशेष में उपलब्ध विशिष्ट वस्तुएं, आदि की दो-चार लाख रूपया की बिक्री कर लेते हैं अथवा ऐसे लोंगों जो समय -समय पर लगने वाले हाट, मेलों में या त्योहारों पर वर्ष भर में दो-चार लाख रुपये की खरीद-बिक्री कर लेते हैं, का रोजगार प्रस्तावित जी0एस0टी0 में छिन जायेगा?
        प्रस्तावित माल और सेवा कर (Goods and Services Tax) से सम्बंधित ड्राफ्ट मॉडल जीएसटी  लॉ और आईजीएसटी  लॉ  के संशोधित प्रारूपों, जैसे कि Central Board of Excise & Customs (CBEC), भारत सरकार द्वारा फरबरी 23, 2017 को लांच की गए मोबाइल ऐप में उपलब्ध है,  के अनुसार -
1. कैजुअल सप्लायर को छोड़कर अन्य सप्लायर के मामले में  -
(अ) यदि ऐसा कारोबारी किसी पूर्वोत्तर राज्य या विशेष दर्जा प्राप्त राज्य में स्थित है;  उसका वर्ष भर का सभी राज्यों के टर्नओवर का कुल योग दस लाख रूपया तक है; और वह
 (i) माल और / सेवा की अंतर्राज्यीय सप्लाई नहीं करता;
(ii) भारत के अंदर आयात के दौरान माल और / सेवा की सप्लाई नहीं करता;
(iii) भारत के बाहर निर्यात के दौरान माल और / सेवा सप्लाई नहीं करता; और
(iv) किसी ई-कॉमर्स ऑपरेटर के माध्यम से माल या सेवा की सप्लाई नहीं करता,
     तब उसे माल और सेवा कर नहीं देना होगा। 
(ब) यदि ऐसा कारोबारी किसी पूर्वोत्तर राज्य या विशेष दर्जा प्राप्त राज्य से भिन्न किसी अन्य राज्य में स्थित है, उसका वर्ष भर का सभी राज्यों के टर्नओवर का कुल योग बीस लाख रूपया तक है तथा वह
(i) माल और / सेवा की अंतर्राज्यीय सप्लाई नहीं करता;
(ii) भारत के अंदर आयात के दौरान माल और / सेवा की सप्लाई नहीं करता;
(iii) भारत के बाहर निर्यात के दौरान माल और / सेवा सप्लाई नहीं करता; और
(iv) किसी ई-कॉमर्स ऑपरेटर के माध्यम से माल या सेवा की सप्लाई नहीं करता,
     तब उसे माल और सेवा कर नहीं देना होगा। 
(2) ऐसा कैजुअल सप्लायर (कैजुअल सप्लायर से तात्पर्य ऐसे सप्लायर से है जो वर्ष में यदा - कदा (occasionally) माल और / या सेवा सप्लाई के संव्यवहार करता है और जिसका स्थिर (fixed) व्यापार स्थल नहीं है।) को अपनी माल और / या सेवाओं की सप्लाई के सभी टर्नओवर (उसका वार्षिक टर्नओवर कितना कम क्यों न हो) उसे सभी टर्नओवर पर कर देना होगा।
          इस प्रकार हम देखते हैं की करदेयता के लिए न्यूनतम टर्नओवर की सीमा (दस या बीस लाख रूपया) उन कारोबारियों के मामले में लागू है जो केवल अपने राज्य के अंदर माल और / या सेवा सप्लाई करें और  ई-कॉमर्स ऑपरेटर के माध्यम से कोई सप्लाई न करें।
            मेरे विचार से कैजुअल सप्लायर में ऐसे छोटे लोग भी आएंगे जो स्थानीय बाजारों से  कुछ माल खरीद कर  समय - समय पर भिन्न-भिन्न स्थानों पर लगने वाले मेलों (fete) और त्योहारों (festivals) पर माल बेच लेते हैं। दीवाली पर मिठाइयां, दिए, दिवालियां, खील-खिलौने और होली पर रंग, गुलाल, पिचकारी आदि की बिक्री से सभी परिचित हैं। गरीब की हजार - पांच सौ की कमाई ही बहुत होती है। ऐसे लोगों को भी जी एस टी में रजिस्ट्रेशन लेना होगा और टैक्स देना होगा।
           VAT में करदेयता के लिए टर्नओवर की न्यूनतम सीमा (Threshold) रूपया 5,00,000. रखी गयी थी। प्रस्तावित जी एस टी  में कम्प्लाइंस कोस्ट और जटिलताओं तथा छोटे कारोबारियों की  कठिनाइयों को देखते हुए इसे पूर्वोत्तर राज्यों के लिए रूपया 10,00,000 ( दस लाख )  तथा शेष राज्यों के लिए रूपया 20,00,000 (बीस लाख) रखने का निर्णय लिया गया है। अपवाद स्वरुप कुछ कारोबारियों को इसका लाभ नहीं दिया गया है, उनकी Threshold शून्य राखी गयी है। इससे कुछ छोटे कारोबारियों की कठिनाइयां बढ़ जाएंगी।
          यह विचारणीय है कि करदेयता की न्यूनतम टर्नओवर सीमा के पीछे ऐसे कारोबारियों से मिल सकने वाला राजस्व नहीं अपितु कर प्राविधानों के क्रियान्वन में आने वाली कठिनाइयां (जिसमें समय और क्रियान्वन में आने वाली लागत भी होते है) देखीं जातीं हैं।  ऐसा प्रतीत होता है Threshold निर्धारित करने के लिए कोई सर्वेक्षण या अध्ययन न होकर बिना किसी आधार के विशिष्ट आंकड़ों पर सहमति बनाकर निर्णय ले लिया गया है। जहां तक मुझे याद पड़ता है माननीय वित्त मंत्री भारत सरकार का कहना था वे करदेयता की न्यूनतम सीमा रूपया 25,00,000 (रूपया पच्चीस लाख) चाहते थे किन्तु राज्य बीस लाख रखने पर सहमत थे।
         मैं भारत सरकार या राज्यों की सरकारों के संविधान में प्राप्त अधिकारों में दखल की बात नहीं कर रहा हूँ। लेकिन कानून बनाते समय देश, काल और परिस्थिति का ध्यान भी रखा जाना चाहिए। आजकल इनफार्मेशन टेक्नोलॉजी का जमाना है। देश डिजिटल इण्डिया की बात कर रहा है। विचारणीय यह है कि माल या सेवाओं की सप्लाई पर कर लगाने के लिए Threshold (कर लगाने के लिए टर्नओवर की न्यूनतम सीमा) निर्धारित करने की आवश्यकता क्यों होती है?  संविधान में ऐसी कोई अनिवार्यता नहीं है, फिर भी हम इस पर विचार करते हैं, कुछ वस्तुओं या सेवाओं को कर से मुक्त भी रखते हैं। मेरा तो मानना है कि इसकी मुख्य बजह कर के प्राविधानों  की कम्प्लाइंस में आने वाली कठिनाइयों और सामाजिक - आर्थिक जटिलताएं (Socio-economic complexities) ही  इसकी मुख्य बजहें है।
                 देश के अनेक ऐसे बेरोजगार युवाओं जो ई-कामर्स आपरेटरों द्वारा उपलब्ध कराये गए मार्किट प्लेस का उपयोग कर हस्त-शिल्प, रेडीमेड गारमेंट्स या अन्य वस्तुएं, क्षेत्र विशेष में उपलब्ध विशिष्ट वस्तुएं, आदि की दो-चार लाख रूपया की बिक्री कर लेते हैं   ऐसी सप्लाई राज्यीय, अंतरराज्यीय या अंतरराष्ट्रीय (Export) किसी भी प्रकार की हो सकती है। इसका भुगतान ऑनलाइन पेमेंट गेटवे सर्विस प्रोवाइडर्स (OPGSPs) के माध्यम से सप्लायर के खाते में क्रेडिट हो जाता है। विक्रेता - कूरियर सेवा से प्राप्तकर्त्ता को माल प्रेषित कर देते हैं। भारत के बाहर माल एक्सपोर्ट करने के मामले में छोटे निर्यातकों को भारतीय रिजर्व बैंक ने एक्सपोर्ट डिक्लेरेशन की भी छूट दे रखी है। एक बार में 25,000 रूपया मूल्य तक का माल बिना एक्सपोर्ट डिक्लेरेशन के भेज जा सकता है।
      यह विचारणीय है कि जब हम VAT या GST में बिक्री या सप्लाई पर टैक्स नहीं बसूलते तब भी हमें बिक्रेता / सप्लायर द्वारा इनपुट्स पर दिया गया कर मिल जाता है। अगर छोटे कारोबारियों के मामले में राज्य के अंदर वैल्यू एडिसन पर मिलने वाला कर छोड़ सकते हैं तब एक्सपोर्ट और अंतरराज्यीय बिक्री के छोटे कारोबारियों के मामलों में हम ऐसा क्यों नहीं कर सकते।
 माल की एक्सपोर्ट  बिक्री पर कर नहीं लगता रहा है, जी एस टी में भी छूट जारी रखने का उद्देश्य है। लेकिन पहले टैक्स जमा करना है फिर एक्सपोर्ट के पुख्ता सबूत देकर जमा की गयी धनराशि का रिफंड लेना है। एक मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के अनुसार ऐसी व्यवस्था असंवैधानिक है। केंद्रीय सरकार का एक्सपोर्ट रिगुलट करने वाला विभाग और रिजर्व बैंक छोटे एक्सपोर्टरों को प्रोहित्साहित करने के लिए 25,000 रूपया मूल्य तक के माल के लिए एक्सपोर्ट डिक्लेरेशन की अनिवार्यता समाप्त करता है और ऑनलाइन पेमेंट गेटवे सर्विस प्रोवाइडर्स (OPGSP) को मान्यता देता है वहीं उसी सरकार का दूसरा विभाग एक्सपोर्ट पर कर न लगाने के उद्देश्य के बावजूद ऐसी जटिल व्यवस्था बनाता है जिसके अनुपालन न कर पाने की स्थिति में छोटे एक्सपोर्टर्स अपना व्यापार बंद कर दें। अगर इनके मामले में भी दस या बीस लाख (जैसी भी स्थिति हो) तक टर्नओवर होने पर रजिस्ट्रेशन न कराने की छूट दे दी जाय तब सरकार को हानि न होकर फायदा ही होगा क्योंकि सरकार को उन्हें इनपुट टैक्स का क्रेडिट नहीं देना होगा। उसके बाद भी अगर कोई इनपुट टैक्स क्रेडिट चाहता है तब वह स्वेच्छा से रजिस्ट्रेशन लेकर जी एस टी प्राविधानों का अनुपालन कर रिफंड ले सकेगा।
           मेरे विचार से कम टर्नओवर वाले सप्लायर के मामले में अंतर्राज्यीय बिक्री (inter-state) / सप्लाई के मामलो में भी थ्रेसहोल्ड (Threshold) लागू किये जाने में कोई हर्ज़ नहीं है। अंतर्राज्यीय बिक्री के मामलों में अब तक उस राज्य को कर मिलता है जहां से माल चलता है। जी एस टी लागू होने पर कर उस राज्य को मिलेगा जहां माल कंज्यूम होगा। देश एक है तब इतने माइक्रो मैनेजमेंट की आवश्यकता नहीं है कि इसकी कॉम्पलाइंस के आभाव में छोटे कारोबारियों का रोजगार ही छीन लिया जाय। इनपुट्स पर दिया गया कर तो फिर भी उस राज्य में मिल जायेगा जहाँ से माल की अंतरराज्यीय बिक्री की जाएगी।
            कैजुअल सप्लायर के मामलों में कुछ ऐसी व्यवस्था किये जाने की आवश्यकता है कि छोटे (कम टर्नओवर वाले) कारोबारियों की रोजी-रोटी बनी रहे। उन्हें कैजुअल सप्लायर की परिभाषा से निकल दिया जाय।
           ई-कॉमर्स ऑपरेटर से कर कटौती की अपेक्षा पंजीकृत कारोबारियों के मामलों में ही की जाय। ऐसा न किया जाय कि छोटे कारोबारियों को फंसाने के लिए उसका उपयोग किया जाय।
           इसी सन्दर्भ में एक बात और कहना चाहूँगा की प्रस्तावित आई जी एस टी लॉ ड्राफ्ट (Model IGST Law Draft) में संविधान के आर्टिकल 286 के अनुपालन में प्राविधान प्रस्तावित नहीं किये गए हैं जिनका किया जाना आवश्यक है।
मधुदोहं दुहेद् राष्ट्रं भ्रमरा इव पादपम्  
राष्ट्र को पीड़ा न हो ऐसे कर लो जैसे जैसे फूल से मधुमक्खी लेती है।
प्रजा से कर लेने तथा कोश-संग्रह करने का प्रकार
युधिष्ठिर ने पुछा- परम बुद्धिमान पितामह! जब राजा पूर्णतः समर्थ हो-उस पर कोई संकट न आया हो,तो भी यदि वह अपना कोश बढ़ना चाहे तो उसे किसी तरह का उपाय काम में लाना चाहिये, यह मुझे बताइये। भीष्म जी ने कहा-राजन्! धर्मकी इच्छा रखने वाले राजा को देश और काल की परिस्थिति का ध्यान रखते हुए अपनी बुद्धि और बल के अनुसार प्रजा के हित साधन में संलग्र रहकर उसे अपने अनुशासन में रखना चाहिये। जिस प्रकार से काम करने पर प्रजाओं की तथा अपनी भी भलाई समझे में आवे, वैसे ही समस्त कार्यों का राजा अपने राष्ट्र में प्रचार करे। जैसे भौंरा धीरे-धीरे फूल एवं वृक्ष का रस लेता है,वृक्ष को काटता नहीं है, जैसे मनुष्य बछड़े को कष्ट न देकर धीरे-धीरे गाय को दुहता है, उसके थनों को कुचल नहीं डालता है,उसी प्रकार राजा कोमलता के साथ ही राष्ट्र रूपी गौका दोहन करे, उसे कुचले नहीं। जैसे जोंक धीरे-धीरे शरीर का रक्त चूसती है, उसी प्रकार राजा भी कोमलता के साथ ही राष्ट्र से कर वसूल करे। जैसे बाघिन अपने बच्चे को दाँतो से पकड़ कर इधर-उधर ले जाती है; परंतु न तो उसे काटती है और न उसके शरीर में पीड़ा ही चहुँचने देती है,उसी तरह राजा कोमल उपायों से ही राष्ट्र का दोहन करे।
(महाभारत शान्ति   पर्व, अध्याय 88)
“If a person is not liable for payment of tax at all, at any time, the collection of a tax from him with a possible contingency of refund at a later stage will not make the original levy valid.”
(Hon’ble Supreme Court in M/s Bhawani Cotton Mills Ltd. Vs. State Of Punjab & Anr. Date of Judgment: 10/04/1967)

क्या जी0 एस0 टी0 में इंटरनेट का उपयोग करने वाले छोटे कारोबारियों को अपना व्यापार बंद करना पड़ेगा ?



क्या जी0 एस0 टी0 (GST) में
इंटरनेट का उपयोग करने वाले
छोटे कारोबारियों को अपना
व्यापार बंद करना पड़ेगा ?

keshav dayal
Post a Comment