Showing posts with label करुणा. Show all posts
Showing posts with label करुणा. Show all posts

Thursday, June 28, 2018

राष्ट्र का चरित्र : NATIONAL CHARACTER


मित्रो!
      कभी-कभी यह सोच कर कि हमारे राष्ट्र का चरित्र क्या है और हम जी क्या रहे हैं? दुखी हो जाता हूँ।   धर्म चाहे कोई भी क्यों न हो, हम अपने ईश्वर को करुणा का अवतार (करुणावतारम) मानकर उसकी आराधना करते हैं किन्तु जब करुणा करने की बारी आती है तब हम निर्दयी बन जाते हैं।  क्या यह हमारा दोहरा और संदिग्ध चरित्र नहीं दर्शाता है?
                Sometimes when I think about our national character and the character which we are  living, I become sad. Regardless of our religion, we all worship our God as the incarnation of compassion (Karunavataam), but when it comes to compassion, then we become merciless. Whether this does not reflect our double and dubious character?
मेरा मानना है कि --

      किसी राष्ट्र का चरित्र वह नहीं होता जिसकी अपेक्षा ग्रंथों और धर्म- ग्रंथों में की गयी होती है। किसी राष्ट्र का धर्म वह होता है जो उसमें रहने वाले लोगों के क्रिया-कलापों से परिभाषित होता है।



Friday, May 12, 2017

यह हम कहाँ आ गए हैं? Where we have reached.


 मित्रो !
         आजकल सभी क्षेत्रों में सामान्य रूप में ऐसा बहुत कुछ असामान्य घटित हो रहा है जो हमें याद दिलाता है कि यह कलियुग है। यहाँ प्यार, सत्य, करुणा, दान और धर्म जैसे तत्व कमजोर हो रहे हैं, उनकी परिभाषाएँ बदल रहीं हैं।

          यहां सत्य से उसके सत्य होने का प्रमाण माँगा जा रहा है, वासना को प्यार का नाम दे दिया गया है, बूढ़े माँ-बाप सहानुभूति के पात्र बन गए हैं, मानवीय रिस्तों का व्यापारीकरण हो गया है। भोलेपन और विश्वास को छला जा रहा है, इनको ब्लैकमेल के लिए प्रयोग किया जा रहा है। कामुक भूखे भेड़िये हर जगह घूम रहे हैं। नदियाँ प्यासीं हैं, हवा, पानी पर पहरे लगे हैं, संख्या बल बढ़ाने को धर्म का सशक्तिकरण माना जा रहा है। संतों का अकाल दिख रहा है, ईश्वर की तिजारत करने वाले बाबाओं की संख्या बढ़ रही है, स्वयं भू ईश्वर अनेक हैं। हमारी धरती जो कभी स्वर्ग तुल्य थी पर बोझ और उसका दोहन इतने बढ़ गए हैं कि वह काँप और कराह रही है। ------- हम भूल गए हैं कि हम लगातार गर्त में गिर रहे हैं।


Friday, December 16, 2016

प्रेम और करुणा हैं तो जीवन है

  • मित्रो !
    जब तक प्रेम और करुणा (Love and Compassion) इस संसार में शेष हैं, इस संसार में जीवन है। किन्तु बिडम्बना यह है कि इनमें लगातार क्षय हो रहा है जो इस बात का संकेत है कि संसार विनाश की ओर बढ़ रहा है। 
    जरा सोचिये !

Friday, November 20, 2015

वैवाहिक जीवन के कमजोर होते धागे : Weakening Marriage Relations

मित्रो !
        अनेक मामलों में जीवन भर, जनम-जनम या सात जनम तक साथ निभाने वाले वादों पर बने रिश्ते इसी जन्म में कुछ दूर चलकर ही दम तोड़ रहे हैं। यहाँ तक कि उनकी अबोध संताने भी रिश्तों के बिखराव को रोक पाने में समर्थ नहीं हो पा रहीं हैं। मानवता, दया और करुणा भी इनके लिए कोई मायने रखते नहीं दिखाए दे रहे हैं। ऐसा क्यों हो रहा है, इसके कारणों पर विश्लेषण किये जाने की आवश्यकता है।
       अभी हाल में ही एक हिंदी दैनिक समाचार पत्र में एक समाचार प्रकाशित हुआ था। समाचार के अनुसार एक जिला स्तरीय न्यायालय जो तलाक के मामले की सुनवाई कर रहा था उसके द्वारा इस आशय की टिप्पणी की गयी थी कि तलाक के मामलों की बढ़ती संख्या एक चिंता का विषय है। उनके द्वारा यह भी टिप्पणी की गयी थी कि तलाक के अधिकांश मामले प्रोफेशनल्स से सम्बंधित हैं। 

      मित्रो एवं प्रियजनों ! उपर्युक्त संदर्भित समाचार के पढ़ने से पहले भी मेरा इस ओर ध्यान गया था और इस पर मैं एक पोस्ट लाना चाहता था। किन्तु अब तक इसे नहीं ला सका। मेरा विचार है कि इस सम्बन्ध में कारणों का विश्लेषण किया जाना आवश्यक है। यह विषय गंभीर चिंतन चाहता है। मैं इस विषय पर शीघ्र ही आर्टिकल लाना चाहूँगा। तब तक चिंता ही जाहिर कर सकता हूँ , यही कह सकता हूँ कि इस पर नियंत्रण पाया जाना समाज के हित में होगा।

    अभी हाल में ही तलाक का मुक़दमा सुन रहे एक न्यायालय ने तलाक के मामलों में बृद्धि पर चिंता व्यक्त की है। इसमें अधिकांश मामले पेशेवरों (professionals) के बताये गए हैं। तलाक का सबसे बुरा प्रभाव बच्चों के भविष्य पर पड़ता है। विचारणीय यह है कि हम किस प्रकार के समाज की रचना करना चाहते हैं?



Saturday, August 22, 2015

प्यार और करुणा


मित्रो !

        प्यार और करुणा भावनायें हैं। नकारात्मक सोच रखने वाले व्यक्ति के अंतःकरण में इनका जन्म नहीं होता। प्यार और करुणा विहीन व्यक्ति किसी के प्यार और दुःख - दर्द को समझ पाने में असमर्थ रहता है। 
        यदि हम चाहते हैं कि हमारे अन्दर प्यार और करुणा की भावनायें जीवित रहे तब हमें चाहिए कि हम अपने अन्दर सकारात्मक सोच को विकसित करें और नकारात्मक सोच को त्याग दें।


Saturday, May 9, 2015

दया धर्म का मूल है : Compassion, the base of a religion

मित्रो !
किसी अन्य प्राणी को कष्ट में देखने पर उसके कष्ट दूर करने के उद्देश्य से उसकी सहायता करने की जिस इच्छा का मनुष्य के हृदय में जन्म होता है, वह दया या करुणा कहलाती है। गोस्वामी तुलसी दास जी ने राम चरित मानस में एक दोहे में धर्म के मूल के विषय में निम्नप्रकार उल्लेख किया है :

दया धर्म का मूल है पाप मूल अभिमान। 

तुलसी दया न छोड़िये जब लगि घट में प्रान ।।
विचारणीय यह है कि यदि दया धर्म का मूल है तब धर्म को स्थायित्व प्रदान करने और सशक्त बनाये जाने के लिए प्रत्येक व्यक्ति, जो धर्म में विश्वास रखता है अथवा जो धर्म की उन्नति चाहता है अथवा जो अपने को धर्म का रक्षक कहता है, को अपने अन्दर के दया भाव को जागृत कर उसका प्रयोग धर्म की जड़ों के सशक्तिकरण के लिए करना होगा। सभी प्राणियों पर दया करते हुए असहाय दलितों, वंचितों और गरीबों पर विशेष दया दृष्टि से उनका दर्द कम करना होगा। कोरे भाषण देकर धर्म की पैरबी करने, दयनीय जीवन जी रहे लोगों को अल्पकालिक लालच देकर अपने समुदाय में शामिल करने अथवा उनके इर्द-गिर्द पहरेदार (watchmen) खड़े करने से धर्म की जड़ें मजबूत नहीं होंगी।

Compassion, Religion, Base, Foundation, Basis,दया धर्म का मूल है.उपकार।