Wednesday, July 8, 2015

व्यवहारिक जीवन में उछल-कूद अनावश्यक


मित्रो !

         उछल-कूद खेलों तक तो ठीक है किन्तु व्यवहारिक जीवन में उछल-कूद के बजाय शालीनता और धैर्य के साथ प्रयास करना ही मनुष्य को शोभा देता है। इससे ऊर्जा का अपव्यय नहीं होता और प्रयासों में निरन्तरता बनी रहने से लक्ष्य आसानी से प्राप्त हो जाता है।


उछल-कूद : अध्यवसाय, आवेग, उत्सुकता, व्यग्रता आदि का अनाचक ऐसा दिखौआ प्रयत्न जो अंत में प्रायः निरर्थक सिद्ध हो।




धर्म : विस्तार और सशक्तिकरण

मित्रो!
          समय के साथ-साथ किसी भी धर्म के मानने वालों की संख्या स्वतः ही बढ़ती जाती है क्योकि लगभग सभी मामलों में नयी पीढ़ी को धर्म के संस्कार संतान के माता-पिता से प्राप्त होते हैं। अतः धर्म का विस्तार तो लगातार होता रहता है। किन्तु अशिक्षा, अज्ञानता, अन्धविश्वास, स्वार्थपरता और धर्म के अनाचरण से धार्मिक मूल्यों का पतन होता रहता है। ऐसी स्थिति में धार्मिक मूल्यों के सशक्तिकरण के निरन्तर प्रयासों की आवश्यकता होती है। 
मैं यह नहीं कहता कि किसी धर्म के अनुयायियों को अपने धर्म का प्रचार व प्रसार नहीं करना चाहिए किन्तु प्रचार का तरीका ऐसा होना चाहिए कि अन्य धर्मों के लोग नए धर्म की अच्छाइयों की बजह से उसे अपनाने का निर्णय करें, किसी को अपना धर्म किसी दूसरे पर थोपना नहीं चाहिए और न ही किसी व्यक्ति को अपना धर्म छोड़कर नया धर्म अपनाने के लिए लोभ-लालच दिया जाना चाहिए।


        सनातन धर्म अनुयायियों के धार्मिक ग्रंथों श्रीमद भगवद गीता और रामचरित मानस में ईश्वर के अवतरण का उद्देश्य धार्मिक मूल्यों की पुनर्स्थापना ही बताया गया है। 
श्रीमद भगवद गीता
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ।।
(जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है)
रामचरित मानस
जब-जब होइ धरम की हानी।
बाढ़ेँ असुर अधम अभिमानी।। 
तब-तब धरि प्रभु मनुज शरीरा।
हरहिं कृपा निधि सज्जन पीरा।।
        हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि महाभारत में धर्म के अनुसार आचरण करने वाले पांडवों की छोटी सी सेना धर्म के विपरीत आचरण करने वाले कौरवों की विशालकाय सेना पर भारी पड़ी थी। कृष्ण ने भी धर्म के अनुयायियों का ही साथ दिया था। इससे तो यही लगता है कि धर्म का अनाचरण करने वाले सौ कौरवों और धर्म का आचरण करने वाले पांच पांडवों में से धर्म का आचरण करने वाले पांच पांडव ही ईश्वर को प्रिय थे। 
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       इस पोस्ट के पीछे मेरा उद्देश्य किसी की धार्मिक भावनाओं को आहत करने का नहीं है। फिर भी यदि किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचती है तब मेरा उससे अनुरोध है कि वह मेरी अज्ञानता समझ कर मुझे क्षमा कर दे।


अपना धर्म


मित्रो !

         प्रत्येक व्यक्ति के लिए अपना धर्म अन्य सभी धर्मों की अपेक्षा बेहतर होता है किन्तु इसका अभिप्राय यह कदापि नहीं है कि कोई व्यक्ति किसी अन्य धर्म का आचरण कर रहे किसी व्यक्ति के धर्म की निन्दा करे। हमें चाहिए कि हम दूसरे के धर्म की निन्दा करने से बचें। 
         प्रत्येक व्यक्ति की उसके अपने धर्म के साथ उसकी आस्था जुडी होती है। किसी की आस्था को चोट पहुँचाना एक अमानवीय कार्य है।



खाली वक्त करें प्रभु के नाम


मित्रो !

             जिस समय में हमारे पास अपने या औरों के लिए कोई उपयोगी कार्य करने के लिए न हो वह खाली समय होता है। ईश्वर के स्मरण का कार्य ऐसा कार्य होता है जो कभी पूरा नहीं होता और जिसके करते हम थकते भी नहीं हैं। खाली समय का सदुपयोग हम ईश्वर के स्मरण कर्म में कर सकते हैं। ईश्वर के स्मरण से हमारे अन्दर सदगुणों का विकास होता है और सत्कर्मों में हमारा विश्वास बढ़ता है। 
            प्रभु के स्मरण का कार्य ऐसा है जिसे हम किसी भी समय कर सकते हैं। जब हम खाली समय को ईश आराधना में व्यतीत करते हैं तब हमारे मन में अवांछित विचार जन्म नहीं लेते (Empty mind is a devil's workshop), हमारे खाली समय का सदुपयोग हो जाता है और हम ईश्वर के स्मरण का आनंद भी पा लेते हैं। यह तो वही हुआ कि -
खाली समय करें प्रभु के नाम। 
आम के आम, गुठलियों के दाम।।
           जो लोग ईश्वर को नहीं भी मानते हैं वे भी अपने खाली समय में सदगुणों और सत्कर्मों का चिंतन करते हुए अपने अंदर इनके प्रति आत्मबल बढ़ा सकते हैं।



मृत्यु उपरान्त प्यार


मित्रो !

          यदि हम अपने छोटों से प्यार करते हैं और चाहते हैं कि हमारी मृत्यु के बाद भी हमारा प्यार और आशीर्वाद उन्हें मिलता रहे तब हमें चाहिए कि हम अपने जीवित रहते उन्हें भरपूर प्यार दें, हम अपनी जीवन शैली को अनुकरणीय बनायें और ऐसे आदर्शों को जियें जो हमारे जाने के बाद भी हमारे छोटों का पथ प्रदर्शन करते रहें।



ताकि गरीब, गरीब न रहे


मित्रो !

          यदि हम चाहते हैं कि शहरों और गाँवों में रह रहे सभी लोगों का विकास हो और गाँवों में रह-रहे गरीबों की गरीबी दूर हो तब हमें समझना होगा कि केवल गाँवों से शहरों की ओर जाने वाले रास्तों का होना ही पर्याप्त नहीं हैं, हमें समान रूप से शहरों से गाँवों की ओर जाने वाले रास्तों को भी विकसित करना होगा। गाँवों की शहरों पर निर्भरता को कम करना होगा और शहरों की गाँवों पर निर्भरता को यथासंभव बढ़ाना होगा। 

          मेरा मानना है कि मनरेगा जैसी योजनाओं की सामयिक आवश्यकता है किन्तु ऐसी योजनायें निर्भरता बढ़ाती है आत्म-निर्भरता को बढ़ाबा नहीं देती जबकि गरीबी के उन्मूलन के लिए ऐसी योजनाओं की आवश्यकता है जो गरीब और बेरोजगारों को आत्म-निर्भर बनायें। इसके लिए भूमिहीनों और कम भूमि रखने वाले किसानों के लिए अतिरिक्त संसाधन मुहैया कराने के लिए कृषि, बन, प्राकृतिक सम्पदा और पशु पालन से सम्बंधित छोटे उद्योग गाँवों में स्थापित करने होंगे। ऐसे उद्योगों की गाँवों में स्थापना को प्रोत्साहित भी करना होगा।



यह मन बड़ा जिद्दी है

मित्रो !
          यह मन बड़ा जिद्दी है। बहुत समझाया कि हथेली पर आम नहीं उगता, रोम का निर्माण एक दिन में नहीं हुआ था और सूरज पश्चिम से नहीं निकलता। पर मन का मानना है कि वह दिन लद गए जब यह सब लागू होता था, अब इंटरनेट और मीडिया का जमाना है, पलक झपकते सब कुछ हो जाता है।
          जब मैंने मन को बहुत समझाने का प्रयास किया और उसे बताया कि B. K. S. Iyengar को पद्म श्री से पद्म भूषण और फिर पद्मविभूषण की यात्रा करने में लगभग 25 वर्ष लग गए तब मेरे मन ने बगावत कर दी, कहने लगा कि फिर भी भारत रत्न से चूक गये। अगर इंटरनेट का सहारा लेते तब बहुत कम मेहनत किये ही जो कुछ मिला उससे अधिक पा लेते। मेरे मन का मानना है कि जिस दिन कोई इंटरनेट और मीडिया का सहारा लेगा उस दिन वह B.K.S. Iyengar से आगे निकल जायेगा।

बेबसी का योग


       विश्व में आबादी का एक बड़ा भाग ऐसा भी है जो कभी-कभी दो जून की रोटी भी नहीं जुटा पाता है, जिसका भूख के मारे पेट और पीठ दोनों मिल जाने से पेट-पीठ जोड़ लेने का अनचाहा योग हो जाता है। सर्दियों में वस्त्रों के अभाव में जिसके घुटने सीने से और सिर घुटनों पर बेबसी में लग जाने से योग हो जाता है। काश उन्हें कोई बेबसी के योग से छुटकारा दिलाने की भी बात करता।

अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस


मित्रो !

           मेरे विचार से आज विश्व को हम जो कुछ योग के नाम से बता रहे हैं वह निरोगी एवं आकर्षक काया रखने के सम्बन्ध में है। आहार-विहार और आदतों की जानकारी के बिना यह ज्ञान भी अपूर्ण है। योग पथ पर यात्रा तो निरोगी काया और मन की स्थिरता प्राप्त कर लेने के बाद शुरू होती है।

योग के लिए आदतों में संतुलन जरूरी : Balance in habits, a need for Yoga

मित्रो !

          श्रीमद भगवद गीता (GITA) मात्र एक धार्मिक ग्रन्थ ही नहीं है। इसमें व्यवहारिक जीवन किस तरह जिया जाय से सम्बंधित ज्ञान भी दिया गया है। इस कारण यह (श्रीमद भगवद गीता) केवल हिंदुओं के लिए ही उपयोगी नहीं बल्कि समस्त  मानव जाति के लिए कल्याणकारी है।  इसके अध्याय 6 के श्लोक 17 में भगवान श्री कृष्ण द्वारा  अर्जुन को संबोधित करते हुए कहा गया है -
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा।।

        जो (व्यक्ति) खाने, सोने, आमोद-प्रमोद तथा काम करने की आदतों में नियमित रहता है, वह योगाभ्यास द्वारा समस्त भौतिक क्लेशों को नष्ट कर सकता है।


योग : YOGA


मित्रो !
श्रीमद भगवद गीता अध्याय ६ का श्लोक १६ निम्नप्रकार है :
नात्यश्नतस्तु योगोअस्ति न चैकान्तमनश्रत:। 
न चातिस्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन।।
हे अर्जुन ! जो अधिक खाता है या बहुत कम खाता है, जो अधिक सोता है या जो पर्याप्त नहीं सोता उसके योगी बनने की कोई संभावना नहीं है। 
आगे श्लोक १७ में निम्नप्रकार कहा गया है :
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु। 
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा।।
जो खाने, सोने, आमोद-प्रमोद तथा काम करने की आदतों में नियमित रहता है, वह योगाभ्यास द्वारा समस्त भौतिक क्लेशों को नष्ट कर सकता है।

मित्रता


मित्रो !

       मित्रता में वैयक्तिक हितों का कोई स्थान नहीं होता। मित्रता फूले-फले, इसके लिए आवश्यक होता है कि वैयक्तिक हितों के मुद्दों को दरकिनार कर दिया जाय। मित्र के सामने अपने को श्रेष्ठ साबित करने या अपने निर्णय को मित्र पर थोपने का प्रयास मित्रता के लिये घातक होता है।


ऊपर वाला तू ऊपर ही ठीक


मित्रो !
        ऊपर वाले का ऊपर रहना ही ठीक है। उसके ऊपर रहते नीचे वाले बिना किसी रोक-टोक अपनी फ़रियाद, जब जी चाहा, उससे कर लेते हैं बरना नीचे वालों ने तो उसके विश्राम के समय का सहारा लेकर मंदिरों के कपाट खुलने और बन्द होने का समय तो निश्चित किया ही, साथ ही यह फरमान भी सुना दिया है कि हर कोई दर्शन नहीं कर सकता।

        वह ईश्वर है जो अपनी संतानों में किसी प्रकार का भेद-भाव किये बिना उनकी पुकार, चाहे दिन हो रात, हर समय सुनता है और उनकी मदद भी करता है। किन्तु मनुष्य ने ईश्वर के विश्राम के समय का सहारा लेकर निश्चित समय में दर्शन पर पाबंदी लगा रखी है। कुछ वर्गों या व्यक्तियों के पूजा गृहों में जाने को भी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में प्रतिबंधित कर रखा है। यह कहाँ तक उचित है?


यशस्वी वर्तमान


मित्रो !

         हर गुजरा हुआ कल एक दिन आज था, हर आने वाला कल एक दिन आज होगा। यदि हम चाहते हैं कि हमारा भूत और भविष्य दोनों स्वर्णिम हों तब हमें अपने वर्तमान को स्वर्णिम बनाना होगा । हमें यह ध्यान रखना होगा कि वर्तमान हमारे लिए न तो प्रतीक्षा करता है और न ही प्रतीक्षा करने देता है।

मृत्यु क्या है : What is Death?

मित्रो !
       पांच तत्वों से बना पांच कर्मेन्दिर्यों, पांच ज्ञानेन्द्रियों, मन, बुद्धि और अहंकार वाला यह शरीर जीवात्मा के इसमें प्रवेश करने पर क्रियाशील होता है और जब तक जीवात्मा शरीर में रहता है, शरीर में चेतना रहती है। जीवात्मा द्वारा शरीर का त्याग कर देना ही मृत्यु है।

      मृत्यु के उपरान्त शरीर क्रियाविहीन हो जाता है। जीवात्मा के शरीर को छोड़ देने पर जीवात्मा शरीर और इस संसार की अनेक जड़ तथा चेतन वस्तुओं से बनाये गये मोह बन्धनों से मुक्त हो जाती है।

बुढ़ापे की चिंता बुढ़ापे में अनुचित


मित्रो !

मेरे विचार से बुढ़ापा कष्टदायी होने के कुछ कारण हमारे स्थूल शरीर से सम्बंधित होते हैं तथा कुछ कारण हमारी सोच और अनुभूति से सम्बंधित होते हैं। मेरा मानना है कि प्रारम्भ से नियमित जीवन जीते हुए उचित ज्ञान के द्वारा बुढ़ापे में होने वाले कष्टों को बहुत बड़ी सीमा तक कम किया जा सकता है। 
हमें बुढ़ापे की प्रतीक्षा किये बिना किशोरावस्था से ही नियमित जीवन जीना चाहिए और ज्ञानार्जन कर आत्मबल बढ़ाना चाहिए। बुढ़ापा आने से पूर्व हमें इसके स्वागत के लिए तैयार रहना चाहिए।